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31 दिसंबर 2010

बुन्देली कहानी ---- बिरादरी की पूँच

बुन्देली कहानी ---- बिरादरी की पूँच
डॉ0 लखन लाल पाल
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गाँव में पंचातें ऊसई खतम हो गई जैसे काबर माटी को कठिया गोंहूँ। गोंहूँ की किसमन ने कठिया खें अपनेई घर में पराओ बना डारो। रो रओ बिचारौ खेतन के कोने में। का करे तेजी से बदलो जमानौ, कठिया गोंहूँ जमाने के हिसाब सें न बदल सको। ई धरती में तो ओई ठहर पाउत जेमें जितती सक्ति होत। बिना सक्ति बालौ हिरा जात, कुदरत को जेइ नियम है। नये कानून ने जैसें जमीदारी प्रथा खें खतम कर दओ, ओइ के संग में पंचाटें बह गईं। आदमी सूधौ पुलिस अदालत करत। वहाँ मूँ देखौ ब्यौहार नहियाँ। केस फँस गओ तौ सजई को डौल है। फिर नई-जई बूढ़न की मानत कहाँ है। सबखें हुड्डन लगे। कछू नेतागीरी में रम गए। कुल मिला खें पंचाट घर अपने बिगत जीवन की सुरत में टसुआ बहाउत।
गाँव कौ कछू समाज पुरखन की ई पिरथा खें अभऊँ चला रओ। रघुआ ने ई पंचाट में कछू जान डार दई। गाँव भर में एकई सोर है। रघुआ लुगाई कर ल्याओ। कहाँ की आय, कोऊ नईं जानत। स्यात पन्दरा हजार में खरीदी। पाँच हजार रुपइया की छिरियाँ बेंची ती और दस हजार रुपइया पाँच रुपइया सैंकड़ा ब्याज पै उठा खें लै गओ तो और बहू खरीद ल्याओ। बिरादरी बहू की जाति की टोह में है। दुल्हनियाँ कौन जाति की है। कोऊ कहात धोबिन है, कोऊ कहात भंगिन है। रघुआ के सपोटर कहात बभनिया है, रघुआ कहात जाति बिरादरी की है। चहाँ जौन जाति की होबे, बहू साजी है। इकदम ऊँची-पूरी, गोरी नारी। बड़ी-बड़ी कजरारी आँखी झिन्नू सारी में बहुतई अच्छी लगत। गाँव भर की बइरें बहू खें दिखन आउत। पाँच रुपइया, दस रुपइया, मीना बिछिया दैखें मुँ दिखत। रघुआ की बाई बरोबर संग में लगी रहात। खरीदी बहू कोऊ कछू कान में फूँक दे तो पन्दरा हजार तौ गए, बहू अलग से चली जैहै। एक दिना रघुआ की बाई ने बिरादरी की बइरिन खें बुलउआ दिबा खें बुलवा लओ। बहू कौ नाव धराबे खें। गोरी नारी दिखखें बइरिन ने बहू कौ नाव उजयारी धर दओ। रघुआ की बाई ने ई खुसी में सबखें मुठी भर-भर खें बतासा बाँटे। रघुआ कौ बाप चतरा बिरादरी की टोह में लगो रहात, कोऊ का बतात ? हवा कौ रुख कहाँ खें है ? तिवारौ ऊसई लगाएँ खें फिर रओ। पै बिरादरी के घुटे मानुष ऐसें कैसें भेद दैं दैहैं। बिरादरी चुकरिया में गुड़ फोर रई ती। बिरादरी रोटी कैंसे लैहैं, का डाँड़ लगाहै, यौ कोऊ नईं जानत, सिवाय ऊपर वाले के। बिरादरी बालिन ने रघुआ के बाप खें साफ-साफ कह दओ तो कि जबलौ बिरादरी खें रोटी न दै दैहित तब लौ तैं कुजात रैहै, न तोरे घर में कोऊ पानी पी है, न तोखें कोऊ पानी दैहै। चतरा गुस्सा में लाल हो जात्तो पै गुस्सा खें पीबो ओखी मजबूरी हती। पाँव फँसों है, पोले दइयाँ ओखें निकारनै है। खैर कछू होय, रघुआ के दिना आनन्द से गुजरन लगे। दिन भर बिरादरी के आदमी का धौंस देत, रात में सब भूल जात्तो।
चतरा आस-पास के गाँवन में अपनी बिरादरी से मिलो। ओखे मन कौ उत्तर काऊनै न दओ, फिरऊ फुसला पोठ खें अपने कोद खें मिलावे की कोसिस करी। सबनै एकई बात कही कि एक दिना को टिया धर लेव चतरा भइया। अपनी सबई बिरादरी खें जोर लेव। पंच जो निरनै करै ऊ तो माननै परिहै। कथा, भागौत, गंगा अस्नान जो कछू बिरादरी बतावै सो ऊ कर लइए। बिरादरी खैं कच्ची-पक्की रोटी दै दइए, तोरौ उद्धार हो जैहै। जाति गंगा हम सबई खैं पवित्तर कर देत। कोऊ चतरा से कहात-‘सुनो है, बहू साजी है, कहाँ सें फटकार दई।’ बहू की बड़वाई सुन खें चतरा की छाती दो गज फूल जात्ती। तुरत हँस खें बताउत- ‘भइया तुम्हारई चरनन की किरपा है। का करेंन फाल बिगर गओ तो, बिरादरी कौ कोऊ आदमी मोरे लरका के दाँत नईं दिखत तो, बंस तौ चलानै हतो, मैंने कही भइया पइसा लगहै ता लग जाबै, बहू तौ आ जैहै।’ ‘ठीक रहो दादी, बस बिरादरी खें और संभार लै, तोरौ बारे कैसो ब्याव बन जैहै।’
आज बिरादरी की पंचाट हती। बड़े-बड़े पंच आस-पास के गाँवन सें बुलाए गए। इतनौ-कर्रौ मामलौ गाँव कौ समाज अपने मूँड़ पै कैसे लै लेतो। आस-पास के पंचन कौ जमावड़ौ दिखे सें ऐसौ लगत तो जैसे कोऊ पिरतिस्ठित आदमी ई दुनिया से बिदा हो गओ होय और ओखी तेरहईं में लोग इकट्ठे भए हो।
मानुष धरती के सभई पिरानियन सें ईसें सिरेस्ट है कि ओखे पास दिमाग है, सोचे समझे की ताकत है। बिचार कर सकत। सभई पहलुअन खें समझ खें नतीजे पै पहुँच सकत। दो चार आदमी यहाँ बैठे तौ दो चार आदमी वहाँ। बूढ़न कौ सुरौधौ अलग लगो। कोऊ बिड़ी सुरक रओ तौ कोऊ तमाखू की पीक थूक रओ। सिकरिट तौ ऐसे चौखें जात जैसे भदुआ (गन्ना) बात कौ केन्द्र रघुआ और रघुआ की लुगाई हती। जुन रडुआ लरका हते उनै रघुआ से ईरखा होन लगी। जुन की रघुआ के बाप सें तनकई तन्ना-फुसकी हती वे ई घात में हते कि डाँड़ कररौ लगै तौ उनके करेजौ कौ दाह बुझा जावैं। कोऊ पंचाट में जाबे खें तौ तइयार हतो पै रोटी लैबे खें ठनगन करत। बिरादरी की मेहरियन ने खसमन खें जाती-जाती बेरा लौ खूब समझाओं। पुन्ना की बाई नै अपने आदमी सें कही- ‘भलू पुन्ना के नन्ना पाँत में नई जानै, बिरादरी खें साफ बता दइये। खसम ने कान पै नईं धरी तौ वा सन्ना खें बोली - ‘तै भलईं चलो जइये पाँत में, लडुअन कौ भूकौ होत ता, पै मैं जान बाली नहियाँ, ध्यान कर लैत।’
पुन्ना कौ नन्ना बिचारौ बेमौत मरो जा रओ तो। बिड़ी पीवे में ओखौ मन नईं लगत हतो। पंचन की ठसक सहाय कि लुगाई की। अब तौ रामभरोसे है, जो कछू होहै सो भुगती जैहै। पुन्ना कौ नन्ना पुरखन खैं कोस रओ तो कि लुगाइअन खें पंचाट सें बाहर काए राखो। लुगाई जात होतीं ता मैं कभऊँ न आतो, पुन्ना की बाई खें पठै देतो। सबरौ टंटा दूर हो जातो। ईनें सासकेरी नै मोई कुआ बहर कैसी हालत कर दई।
चार आदमी आपस में बता रए ते। एक बोलो- ‘सुनो है स्वसर रघुआ की लुगाई साजी है।’
-‘‘कक्का सिरी देबी सी लगत।’
-‘‘हैं !’’ दूसरे ने मुस्क्या खें आँखीं सिकोरी।
-‘‘सुनो है, धोबिन है।’’ पहलौ वालौ बोलो।
-‘‘ससुरा खें बिरादरी नईं मिली। बिरादरी की बइरें तू गयीं ती का ?’’
-‘‘जाति में आ गई कक्का, पंच धोबिन खें बिरादरी की न बना पाहैं का ?’’
--‘‘जाति गंगा में कूरा-करकट सब कछू मिल जात रे ! अब तौ यौ सब पंचन के हाँतन में है।’’
-‘‘अब का करो जाय कक्का, सुसरा रघुआ लुगायसौ हतो, अक्क लगी न धक्क, साजी दिखखें खरीद ल्याओ। कहात नहियाँ -‘प्यास न देखै धोबी घाट, इसक न देखै जाति कुजात।’ उन्हई में से तीसरौ बोलो।
तीसरे की बात सुन खें दो हँस परे, चौथौ न हँस पाओ। ऊ सोच में पर गओ। ऊ समुझाउत भओ बोलो -‘‘कक्का ई बारे मे सबूत नहियाँ, हम फँस जैहैं।’’ चौथे वाले की बातें सुनखें तीनों के मुँ लटक गए।
अब दूसरी कोद की जमात। खुसर-पुसर मची। इत्ते धीरे सें बोलत कि बात सूधी कान में पहुँचत, यहाँ-वहाँ बरबाद नईं होत।
-‘‘गर्रा गओ है चतरा, अच्छौ पइसा है, मुखिया डाँड़ हिसाब सें लगाइए।’’
-‘‘कित्ती पोपरटी होहै ?’’ मुखिया ने एक आँखी दबाई।
-‘‘अभै नगद पचासक हजार तौ धरे होहै। रघुआ, छिरियाँ राखें, पाँच-छै छिरियाँ अभई बेची ती। पन्दरा सोरा छिरियाँ अभै मौका पैहैं।’’
-‘‘चिन्ता न कर दादी, जैसौ तै चाहहित ऊसई होहै, कौन एक पंचाट निपटाई, हजार निपटा खें फैंक दई। कोऊ नै उँगरिया नईं उठा पाई।’’ मुखिया नै अपनी मूँछन पै हाथ फेरो।
ई जमात के आदमी मुखिया की बात के कायल हो गए। मुखिया नै अपनौ भभका बना लओ। मुखिया नै अभई अच्छे पंच कौ सरटीफिकट दै दओ तो। ऊनै गरब से गरदन हिलाई।
-‘‘दाऊ सेंकें मैकें न सट्टे करे।’’ ओई जमात में एक ठइया बोलो, ऊ कछू साँची बात जानत हतो। ऊसें न रहो गओ, ऊनै कह दओ- ‘‘बहू खरीदें खें दस हजार करजा उठाखें लै गओ तो। कहाँ सें आए पचास हजार कि साठ हजार।’’
दाऊ की बात कटतई दाऊ तिलमिलानों, पै घाघ किसम कौ आदमी बात संभारत भओ बोलो-‘‘अरे तै सिटया गओ का, दस हजार तौ चतरा नै ईसें करजा लए कि सब कोऊ जान जाय फिर भइया बिरादरी डॉड़ मजे को लगावै।’’
-‘‘चतरा की या बदमासी हमाई समझ तरें नई आई। ऐसई हो सकत।’’ ऊ अपनी बात खें वापस लेत भओ बोलो।
अब बिरादरी के लानै पंच बुलउआ भओ। पंचन की बात कौन टार सकत। घर सें तौ पहलईं निकर आये ते। जहाँ-तहाँ बैठ खें रैसल करत हते, अब उठ-उठ खें सब नीम के पेड़ें तरें इकट्ठे हो गए। मैंदान बड़ौ हतो, चारऊ कोद कच्ची माटी की भितिया उठी हती। चतरा नै गाँव भर की जेजमें माँगखें इकट्ठी कर लईं ती, ओई बिछा दई।
ओई मैदान में एक कोद चौतरा बनो हतो। पाँच पंच ओई में जा बैठे। ये पाँचऊ पंच अलग-अलग गाँवन के हते। बिरादरी में खूब नाम कमाओ तो, ओई कौ फायदा उन्हें मिलो कि वे आज पंच बन खें बैठ गये। बोले में चतुर। मूँड़ पै बड़े-बड़े साफा बाँधें, हाथ में तेल लगी हल्की सी लठिया। धोती कुरता के ऊपर सदरी पहरें लगत कि ये पंच है। मुँ पै गंभीरता, हर कोऊ उनके सामूँ बात करै सें दंदकत। पाँचऊ आराम सें चौतरा पै बिछी दरी पै बैठ गए। या दरी पंचन खें इस्पेसल हती। बचे आदमी खाले की जेजमन पै बैठ गए। वे पंच जुन-जुन के कौन्हऊ रिस्ता सें कछू लगत हते, उनके भाव बढ़ गये। एक पंच कुन्टा कौ मामा लगत तो, ओखे पांव अब धरती पै नई रुपत ते। अक्कल सें कछू कच्चौ हतो सो गाँव वाले धत तोरे की कह खें भगा देत ते। आज उन्हईं खें दिखखें ऐसे मुस्क्यात तो जैसें ....................।
पंचन नै आपस में हँरा से कछू बातें करीं। आदमिन के कान ठाड़े भए, पै वा आवाज उनके कान न सुन पाए। एक पंच गम्भीर बानी में बोलो-‘‘चतरा पंच काहे खें बुलाए ?’’ चतरा हाँत जोर खें ठाड़ो हो गओ और बुकरिया सौ मिमयानो- ‘‘मुखिया साब, तुम तौ सब जानत हौ।’’
-‘‘जानत तौ सब कछू है, तैं अपने मुँ सें तौ बता। चार आदमी सुन लैहै।’’ दूसरौ पंच हँसत भओ बोलो।
-‘‘पंचौ, मो लरका रघुआ बहू कर ल्याओ। सामूँ आँखिन कौ लरका है, गल्ती तौ ऊनै करई लई। मैं चाहत हौं कि बिरादरी मोखें सनात कर देबै तौ मैं तर जाऊँ।’’
बिरादरी के सब आदमी सांत बैठे ते। अभै कोऊ नईं बोल रओ तो। पंचन नै बिरादरी कोद दिखों फिर चतरा सें कही-‘‘बिरादरी जाति गंगा कहाउत, वा तौ तोखें सनात करई दैहै, पै यौ तौ बता कि बहू की जाति का है ?’’
मुखिया की बात सुनखें चतरा बंगलें झांकन लगो। ई कौ उत्तर चतरा का बनावै। सो ऊनै चिमाई साध लई।
-‘‘सुनो है धोबिन है।’’ पुन्ना को नन्ना बीच में बोलो।
-‘‘धोबिन कैसें है, बभनियां है।’’ रमोला नै फट्ट से पुन्ना के नन्ना की बात काट दई।
-‘‘पंचौ वा न धोबिन है, न बभनियां है, वा तौ भंगिन है।’’ चतरा कौ समर्थक व्यंग सें बोलो।-‘जाति-बिरादरी होत काहे खें हैं, बिरादरी ऊखें जाति में समगम कर पाहै कि नईं।’’ अब सभई बोलन लगे। इतनौ हल्ला होन लगो कि अब कोऊ काऊ कौ सढ़ौ नईं पर रओ तो ! पंचन नै बात संभारी, वे ठाड़े होखें बोले- ‘‘तुम सब जने चुप्पा हो जाव। ऐसें पंचाट नईं होत।’’ सभई चुप हो गये, पंचन की बात को टार सकत। चतरा हाँत जोड़ें अभऊँ ठाड़ो तो। पंच बोले-‘‘रघुआ खें बुलाऊ।’’ रघुआ वहीं बैटो हतो सो ठाड़ों हो गओ। एक पंच ने पूछो- ‘‘काए भइया, बहू कौन जाति की है ?’’
-‘‘साब बिरादरी की है।’’ रघुआ ने हात जोड़ खें जबाब दै दओ।
-‘‘तोखें कैसें पता कि वा बिरादरी की है ?’’ दूसरौ पंच मूँछन पै हात फेरत भओ बोलो।
-‘‘साब, ओईनै बताओ।’’ रघुआ कछू सरमियानो।
-‘‘कौन ओई नै ?’’ पंच कम नईं ते, सो बात उकेरी। रघुआ न बोलो सो बीच में एक बूढ़ौ बोल परो-‘‘बहू नै बताओ होहै।’’ रघुआ ने मुण्डी हिला दई।
अब बलू सें न रहो गओ। अठारा साल कौ लरका। दाढ़ी मूँछें जमत आउत ती। ओखौ शरीर साजौ हतों, जोसऊ खूब हतो सो खौखरया खें बोलो- ‘‘मोखौं यौ समझ में नई आउत कि पंच जाति पांत काए हुराएँ फिरत है। जाति-पाँति में उरझे रैहौ ता तुम्हारौ कभऊँ विकास नई हो पानै। दुनिया कहाँ पहुँच गई। दूसरी जातियन के आदमी हमें तुम्हें बेसऊर कैहैं। ईंसें जाति-पाँति छोड़ो, भौजाई साजी है। बिरादरी की पूँच लम्बी न बढ़ाऊ।’’
-‘‘बैठ जा रे ! सवाद-उवाद है नहियाँ। पंचाट है, मेहेरिया सें हँसी मजाक नुहै, जब चाहौ कर लेव। तौल खें बात करी जात।’’ उन्हई में सें एक बुड्ढ़ा बिगर परो।
बलु की बात नै आदमिन के करेजे चीर दए। स्यात छाती में तीर घुसे से इतनी पीरा नई होत होहै, जितनी बलु की बातन सें उन्हें पीरा भई। आदमी बिलबिला उठे। कइयक मूड़ पीटन लगे। दूसरे चिल्ला खें बोले-‘‘ अब आदमिन की तू-तू मैं मैं सुरू हो गई। दो पाल्टी बन गई। लोगन खें अब पता चल गओ कि कौन पाल्टी मे को को है। पंचन नै बात संभारी और उन्हें सांत कराउत भए बोले- ‘‘लला, समाज में हमऊँ खें रहनै है और तुम्हऊ खें। काल के दिना अपनौ कोऊ पानी न पीहै।’’
-‘‘बाभन, बनिया तुम्हारौ रोंज पानी पियन आउत का ?’’ बलु उखरई गओ।
बलु की सांची बात आदमिन खें न पची। कोऊ तरकऊ न सूझो, ईसें हँसियन ता हँसियन नईतर पिट हँसियन। कुफर बोले पै बिरादरी नै बलु पै दस सेर गुड़ कौ डाँड़ धर दओ। बलु के बाप खें बिरादरी की समझ हती ईसें ऊनै अपने लरका की भूल की माफी मांगी और रुपइया दैखें दस सेर गुड़ मंगा लओ।
बलु खें ई बात को बौहुत बुरओ लगो। ईसें बलु पाँव फैकत पंचाट से बाहर जान लगो। दाऊ ने बलु खें टेरो और समझाउत भओ बोलो- ‘‘बलु तैं काए बुराई मानत, अभई दिखो नहियाँ दो पाल्टी बनन लगी ती। पंच न रोकते ता थोरीअई देर में गड़िया चूतियां होन लगतो।’’ बलु गुस्सा में फिर खें अपने ठौर पै बैठ गओ।
गुड़ खात भए पंच बोले -‘‘खेत में मेंड़ होत, अगर मेंड़ न होबे ता खेत काहे कौ। पतई न चलै कौन खेत केखौ आय। पुरखा बेसऊर थोरे हते। हमें पुरखन की परपाटी पै तौ चलनई परहै।’’
पाँचऊ पंचन के मूँड़ एक देर फिर इकट्ठे भए। कछू देर तक उनकी आपस में मुण्डी हिली, फिर तनक देर में अलग हो गयीं। अब तीसरे पंच ने आदमिन कोद दिखों और खँखार खें बोलो- ‘अगर सबके मन सें हो जाए तौ बहू खें इतई बुला लओ जाय।’
बढ़ियल, बहुत बढ़ियल, कई आवाजें एकई साथ गूँज गई।
बहू पंचन के सामूँ आकें ठाड़ी हो गई। सबई की नजरें बहू कोद तीं। ओखी चालई से पता चलत तो कि बहू ठसकीली है। झिन्नू साड़ी में ओखौ मूँ झार-झार दिखात तो। चौथौ पंच बोलो-‘‘बहू तोरी जाति का है ?’’
-‘‘जाति बिरादरी की है।’’ बहू हँरा सें बोली। ओखी आवाज कोऊ न सुन सको। पंचाट में बैठो दाऊ जू रसिया हतो, सो ऊ बोलो- ‘‘बहू खूब तान खें बात कर। मूँ उघार लै, इतै सरम न कर। पंच परमेसर के सामूँ का सरम।’’
बहू ने एक झटका में साड़ी माथे तक सरका लई। चौकटा में गाज सी गिरी। दाँतन तरें उँगरिया दाब खें रह गओ आदमी। बड़ी-बड़ी कजरारी आँखीं, गोरौ खूबसूरत मूँ पंच दिखखें रह गए। बहू मुसकराई और लजात भई बोली-‘‘का पूँछत हौ, पँूछौ, बिरादरी-बिरादरी चिल्लात हौ, का सबई लोग एकई बिरादरी के हौ? गोहूँ की तो किसमें बदल गईं, आदमी की किसमें नई बदली का, जुन मोई जाति बिरादरी पूँछत हो।’’
समाज में खुसर पुसर मच गई। पंच समेत सबई आदमिन खें साँप सौ सूँघ गओ। चोट कर्री हती। सो कछू आपस में बताने-‘‘या तौ घाट-घाट कौ पानी पिएँ है। चारऊ कोद की हवा खाई भई है। ईसें पार न पा पैहौ, जाने का बक ठाड़ी होबै, लुगाई है ईके मूँ कौ का टटा बैड़ों ?’’ दूसरौ बोलो- ‘‘बहू जैसी ठसकीली है, ऊसई ठसकदार बातें है ओखी। मुस्क्या खें कैसौ जबाब दओ।’’
खुस-पुस के बीच में दाऊ टपके -‘‘पंचौ होन दो पंचाट। खेत साजौ है फिर चहाँ बलकट धरो होय चहाँ गहाने और चहाँ मोल खरीदो होय। खेत में बीज अपनौ बओ जै है ता फसल तौ अपनई मानी जै है। बताऊ, सब जने या बात गलत है कि सही।’’
-‘‘या तोर बात बिलकुल सही है दाऊ।’’ पंचाट कौ मुखिया बोलो।
आदमियों और बइयर के बीच बिसात बिछी हती। पुरुष तौ अपने पॉसे फैंक चुके ते। अब बारी उजयारी की हती। जोर अजमाइस होन लगी। उजयारी अकेली मैदान में डट गई। ऊनै अपनौ पॉसों फैंको- ‘‘पंचौ कभऊँ-कभऊँ खेत अपनौ होत, बीज कोऊ को बुब जात, पै फसल तौ खेत बाले की कहाउत। खेत बालौ फसल चपोला दइयाँ धर लेत, ऊ नई काऊ खें बताउत। पंचौ मैं यौ पूँछबो चाहत कि बीज महतपूरन है कि खेत।’’
-‘‘यौ मार दओ, दाऊ वे डरे चित्त। उजयारी नै दाऊ की बात काट दई। अब तौ पंचनऊ खें निकड़ नइयाँ।’’ दो नए लरका हँरा-हँरा फुसफसाए।
पंचन खें पूरी तरा सें लगन लगो कि पंचन की बात हल्की हो गई। ई लुगाई नै तो सबके मूँ बन्द कर दए। बइयर आय ईसें उरझें सार नईं दिखात। हंड़िया होय ता ओखे मूँ पै पारौ धर देबै, ई लुगाई के मूँ पै का ध देन। कुल की होती ता लाज सरम होती, मोल खरीदी। ई चड़वॉक खें रघुआ न जानै कहाँ सें खरीद ल्याओ। सब पंचन खें उजयारी की बाते ततइयाँ सी लगी। अकेलौ बलु खुस हतो। ऊ अपनौ दस सेर गुड़ कौ डाँड़ भूल गओ। उजयारी कोद बलु ने एक देर दिखो। उजयारी की जीत पै बलु मुस्क्यानों। स्यात ऊ मुस्कान को अरथ हतो- ‘‘भौजी मार लओ मैदान, थोरी और डटी रओ, सबरे पीठ दिखाखें भग धरहैं।’’ उजयारिऊ भौजी ऊ मुस्कान कौ अरथ समझी। मुस्कान कौ उत्तर मुस्कान में दओ। ऊ मुस्कान को मतलब हतो- ‘‘लला चिन्ता न करौ, मैं पीठऊ दिखाए पै न इन्हें छोड़हौं। रगेद-रगेद मारिहौं, ढूड़ै गली न मिलहै।’’ उनकौ मुस्कराबो बिरादरी बालन नै दिखो। उन्नै समझो बलु उजयारी खें बढ़ा रओ है। एखी साँस पा गई, अब वा न हट है। वे खौंखरयाने बौहत पै उनकी एकऊ चाल न चली। उन्नै सोची, पंचाट बिगर जैहै। ईसें पुन्ना को नन्ना बोलो-‘‘पंचौ, फैसला होन दो, फालतू बातन में का धरो।’’
पुन्ना के नन्ना की बात सबखें जम गई। पंच फैसला सुनाबे खें तइयार हो गए। चतरा सकपकानो। बिरादरी न जानै कैसौ फैसला सुनाहै। ओखे पेट में भटा से चुरन लगे। पूरौ समाज इकदम सांत हो गओ। चतरा के दिमाग में घंटा सौ बजन लगो। अब पंचन नै मिलखें फैसला सुनाओ- ‘‘रघुआ बहू तौ करई ल्याओ है, ठीक है। पंच रघुआ की बहू नै पूरी बात सुनी। पंचन नै स्वीकार करत है।। चतरा खें बिरादरी में सामिल होने है तौ ईखौ डाँड़ भरनै परिहै। बिरादरी में दस हजार रुपइया जमा करै और कच्ची पक्की रोटी बिरादरी खै खबाबै, ऊखौ तरन तारन हो जैहै। चतरा के डाँड़ न भरे सें ऊ कुजात बनो रैहै।’’ बोल पंच परमेसर की जै। बोलौ संकर भगवान की जै। एक साथ कइयक आवाजन से वातावरन गूँज उठो। पंच चतरा सें बोले- ‘‘पंच फैसला मंजूर है।’’ चतरा कौ सरीर जड़ हो गओ। जैसे सबरे सरीर कौ खून निचोर लओ होय/-‘‘पंचन कौ फैसला मैं नई मानत।’’ उजयारी कड़क खें बोली। ई आवाज खें सबई चौंके। उन्नै तौ बर्रौटन में नई सोचो तो कि उन्हें या आवाज सुननै परिहै। या पहली आवाज आय, ईसें पहलूँ कभऊँ ऐसी आवाज सुनी नईं गई। ओऊ ऐसे ठेठ अन्दाज में। पंचन के कान ताते हो गये। आधे से जादा तिलमिला गए। पंचाट की सरासर बेइज्जती। छाती में घमूसा सौ लगो। पंचन खें ऐसी आसा नई हती कि लुगाई इत्तौ कुफर बोल जैहै। पंचन नै आदेस करो-‘‘सब भइया अपने ठौर पै बैठ जावें।’’ पंच मुखिया बोलो-‘‘बहू तोखें पंच फैसला काए मान्न नहियाँ ?’’
उजयारी अपनी बात पै तिली भर न डिगी। वा बोली- ‘‘दस हजार रुपइया मोरौ आदमी कहाँ से ल्याहै। दस हजार रुपइया जैसें तैसें सूद पै करजा लैकैं डॉड़ भर दैबी ता कच्ची पक्की रोटी में पता है बिरादरी कितने कौ खा जैहै ? तुम मोय आदमी खें और मोसे मजूरी करवाबो चाहत। मोरौ डुकरा (ससुर) येई खटका में मर जैहै। हम कुजात बने रैहै, ऊ हमें मंजूर है। तुम्हारौ फैसला हमें मंजूर नहियाँ।’’ पंच मूँ बा गये। सबरे पंच बिरादरी एक दूसरे कोद मूँ दिखत रह गए। उजयारी झटका सें घूम गई और सूधी घर खें चली गई।


डॉ. लखन लाल पाल
नया रामनगर, अजनारी रोड
कृष्णा धाम के आगे, उरई
जिला-जालौन (उ. प्र.)
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यह कहानी लेखक की प्रथम प्रकाशित कहानी है। यह उरई जालौन से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका स्पंदन के बुन्देली विशेष अंक में प्रकाशित हुई थी।

28 अगस्त 2009

कहानी - तसल्ली

भादों का महीना, महीने का आखिरी पखवारा। आसमान एकदम साफ एवं बेदाग दिख रहा था। आकाश के तारे अमावस्या के वैभव को पुनः प्राप्त करने के इरादे से टिमटिमा रहे थे। किन्तु चन्द्रमा के तीन चैथाई भाग की चमक उनके इरादों को धूमिल कर रहा था। प्रति रात्रि उसके बढ़ते यौवन से वे अपना पुरुषार्थ खोते जा रहे थे किन्तु तारे अपने कर्म से विरत नहीं हो रहे थे। उन्हें सफलता का रहस्य मालूम है। कर्मरत रहने पर उन्हें सफलताभरी अमावस्या जरूर प्राप्त होगी। चन्द्रमा पूर्णिमा की मंजिल के करीब ही था। नदी किनारे बैठी चकोरी अपने पे्रमी के सौन्दर्य पर मुग्ध हो रही थी, साथ ही सौतन कुमुदनी से ईष्र्या भाव लिये चन्द्रमा को एकटक देख रही थी। किसानों को उसका वैभव फूटी आँख भी न सुहाता था। भाद्रपद मास का श्रृगार तो रिमझिम-रिमझिम फुहार है। बादलों के साम्राज्य के आगे चन्द्रमा की क्या बिसात? लेकिन अब तो घोड़ों के मरने से गधों का राज्य आ गया है।
सुहना अपने बाड़े में चारपाई डाले चन्द्रमा को देख रहा था। चन्द्रमा की शीतल किरणें उसे दग्ध रही थी वैसे ही, घटई-बढ़ई विरहिनि दुखदाई।’ दिन में तो बादल आकाश में छा जाते थे। लेकिन रात में न जाने कहाँ गायब हो जाते थे? दिन में बादलों को देखकर वह कितना खुश होता किन्तु रात में उनको न पाकर उसकी पीड़ा उमड़ पड़ती थी। कृष्ण जन्माष्टमी की रात कुछ रिमझिम पानी बरसा था पर अष्टमी के बाद धरती पर एक बूंद भी न गिरी। वर्षा की आस में सुहना कभी गोटें गाता तो कभी ठुमरी। अब लगता है गोटें और ठुमरी भी घायल होकर उसके हृदय में कहीं छिपकर बैठ गयी हैं।
सुहना का बाड़ा उसके रिहायसी घर से करीब एक फर्लांग दूर था। अपने हाथों बनाये हुये घर में वह करीब पांच साल से नहीं लेटा है। जब से बहू आई तब से उसने वह घर पूरी तरह से छोड़ ही दिया था। केवल सुबह शाम खाना खाने जाता था। भला अपने परिश्रम से बनाये हुये घर का मोह इतनी आसानी से कैसे छूट सकता है।
सुहना की पत्नी गोरी बाई ने बाड़े का ट्टटर खोला। ट्टटर के खुलने की आवाज से सुहना की दृष्टि उस तरफ गयी। उसने गोरी बाई को देखा। चन्द्रमा के प्रकाश में उसका चेहरा स्पष्ट नहीं दिख रहा था। सुहना ने लेटे ही लेट कहा‘ ‘कौन?’ गोरीबाई ने ट्टटर को बाँधते हुये कहा- ‘मैं हूँ।’ टट्टर को अच्छी तरह बाँध देना। छूटे हुये जानवर बाड़े में घुस आते हैं और भैंसों की सानी खा जाते हैं, भैसों को भी मारते हैं। कल भूरी भैंस खूँटा उखाड़कर भाग खड़ी हुई थी।
गोरीबाई ने गगरी को उठाया और वहीं पर हैण्डपम्प में उसे धोया। पानी भरकर गगरी सुहना की चारपाई के नीचे रख दी। लुटिया भर कर सुहना को पकड़ा दी। गगरी को ढक्कन से ढक दिया। गोरीबाई पानी देकर नीचे बैठने लगी तो सुहना उसे डपटते हुये बोला- ‘नीचे न बैठ, कीड़ा मकोड़ा काट लेगा तो आफत हो जायेगी।’
‘ऐसे नहीं काटते हैं।’ इतना कहते हुये वह वहीं पड़ी हुई ईट पर बैठ गयी।
हाँ, तुझे बताकर आयेगा कि मैं तुझे काटता हूँ। चारपाई पर बैठने में शर्म लगती है क्या?’
‘बादल तो दिखते नही हैं?’ गोरीबाई अनसुनी करके बोली।
‘तेरी ये बहुत बुरी आदत है, किसी की बात ही नहीं मानती है। कोई कुछ कह रहा है’?
बरबस गोरीबाई को चारपाई पर बैठना पड़ा। सुहना चारपाई के एक तरफ खिसक गया।
‘ज्वार की पत्तियां सूखकर बत्ती बनती जा रही हैं, अब तो खेतों की तरफ देखा नही जाता है।’ गोरीबाई ने एक गहरी सांस ली।
क्या किया जाये? अपने बस की तो बात है नहीं।’ सुहना के मुख से पके फोड़े जैसी कराह निकली।
‘ढिल्लन सुबह कह रहा था किसी प्रदेश में फसलें नष्ट हो जाने से किसानों ने आत्म हत्या कर ली है। कहता था ये बातें अखबार में छपी हैं।’ गोरीबाई ने अपने पुत्र द्वारा दी जानकारी सुहना को बताई।
‘खूब मर जायें, मैं क्या कर दूँ। साल हारी, जनम नहीं हारा। इस वर्ष न सही अगली साल फसल अच्छी होगी।’ सुहना तल्ख स्वर में बोला।
‘जिन्दगी संग्राम है, लड़ना तो पड़ेगा ही। आत्महत्या का क्या औचित्य है?’
‘तू क्या चाहती है, मैं भी आत्म हत्या कर लूँ?’ सुहना उबल पड़ा।
‘मुंह से कभी सीधी बात नहीं निकलती है। जिन्दगी गुजर गयी ऐसे ही उल्टी बाते सुनते-सुनते।’ गोरीबाई खीझ गयी।
‘तुझे कहने के लिये और बातें नहीं आती है क्या? सुहना बिगड़कर बोला- ‘मुझे दिखाई नहीं देता है क्या कि बादलों का नामोनिशान नहीं है। पानी कहाँ से बरसेगा।’
‘समुन्दर सूख गया क्या? कहते हैं समुन्दर का पानी ही बादल बनकर आता है।’
गोरीबाई ने नरमी के साथ अपने थोड़े बहुत ज्ञान का परिचय दिया।
‘हाँ समुन्दर सूख गये हैं। पकी फसल जब खड़ी होती है तब समुन्दर उमड़ाने लगता है- खूब वारिश होती है। पिछले वर्ष नहीं देखा था?
गोरीबाई सोच रही थी कि ईश्वर ने सारी मर्द जाति को उल्टा बनाया है क्या? इनसे सीधे बात करो तो उल्टे बोलेगें, बादलों की बात करें तो वह भी उल्टा है- बेमौसम बरसात कर देता है, किसानों को मारे डालता है।
‘कुँवर ब्लाक से लौट आये या नहीं’। सुहना के स्वर में व्यंग्य के साथ तल्खी भी थी।
‘आ जायेगा, अभी रात के नौ ही तो बजे हैं।’ गोरीबाई ने लापरवाही से बताया।
‘मैने सौ बार रोक दिया है कि पानी बरस नहीं रहा है, खाद बीज लेकर क्या करेगा? लेकिन वह सुनता ही कहाँ है? दोस्तो के साथ गया होगा तो पीकर भी आयेगा। उसकी कोई दर नहीं है।
‘वो पीता कहाँ है? आप तो लड़के को लगाये रहते हो।’ गोरीबाई ने झूठा गुस्सा प्रकट किया।
‘तू मुझे बौरया मत, मैं सब जानता हूँ।’ सुहना चेतावनी भरे लहजे में बोला- ‘तू छिपाती रह, एक दिन यह लड़का पुरखों की जायदाद दारु में उड़ा देगा।’
‘उसे दिखाई नहीं देता है क्या, वह भी अपना अच्छा बुरा समझता है।’ गोरीबाई हार नहीं मान रही थी।
उसे दिखाई देता है या नहीं किन्तु तुझे बिल्कुल दिखाई नहीं देता।’ सुहना चारपाई से उठ बैठा- ‘उसे समझा देना, मुझे पिये हुये मिल गया तो एक लट्ठ में सीधा कर दूँगा। अगर तू बीच में आई तो तुझे भी नहीं छोड़ूँगा।
गोरीबाई चुप हो गयी। वह कैसे समझाये कि लड़का बराबरी का है। कुछ कर बैठे तो हम कहाँ जायेगें। इसे कुछ समझ में ही नहीं आता है।
गोरीबाई ने सुहना को पीने को पानी दिया। उसने पानी पीकर लुटिया गोरीबाई को थमा दी और कहा- ‘घर जा, बहू अकेली है।’
गोरीबाई खड़ी हो गयी और जहाँ भैंसे बंधी थी, वहाँ पहुँच गयी। नांदों की सानी को उल्टा पल्टा कर भैसों की पीठ पर हाथ फिराकर पुचकारने लगी। भैंसें भी आत्मीयता पाकर उसे सूँघने लगीं। भूरी भैंस ने सिर उठाया और गोरीबाई के शरीर से रगड़ने लगी। उसने भैंस की गर्दन पर हाथ फिराया और घर को लौट गयी। सुहना ट्टटर तक उसके साथ आया। गोरीबाई के निकल जाने पर उसने ट्टटर अच्छी तरह से बाँध दिया।
मुरगा ने बाँग देकर सुबह चार बजे का ऐलान किया। गोरीबाई ने बिस्तर छोड़ दिया। हाथ मुँह धोया और दूध दुहने वाले बर्तन उठाकर बाड़े में पहुँच गयी। सुहना ने जागकर टट्टर खोल दिया था। गोरीबाई ने अट्टालिका से भूसा निकाला और जानवरों के लिये भूसे की सानी बनाई। सुहना ने जानवरों की नादों में सानी डाल दी। भैसे उठकर सानी खाने लगी। गोरीबाई ने भैंसों का गोबर उठाकर एक तरफ इकट्ठा डालकर उस स्थान की सफाई कर दी। सुहना भैसें, दुहने लगा। अब सुबह के छैः बज चुके थे। ढिल्लन भी बाड़े में आ गया था।
ढ़िल्लन, सुहना एवं गोरीबाई का इकलौता पुत्र हैं उसकी शिक्षा इण्टरमीडिएट तक है। वह आधुनिक तरीके से खेती करने में अपने पिता के साथ हाथ बँटाता है। कृषि यंत्र भी उसके आधुनिक है फिर भी प्राकृतिक प्रकोप तथा पानी का उचित प्रबन्ध न होने के कारण पैदावार उतनी नहीं हो पाती है, जितनी होनी चाहिये। यद्यपि गाँव में टी0वी0, रेडियो, सी0डी0 प्लेयर आदि मनोरंजन एवं ज्ञान बढ़ाने वाले साधन हैं। किन्तु बिजली कम आने से टी0वी0 का कार्यक्रम लोग कम देख पाते हैं। ये लोग फिल्मों के हीरो-हीरोइन, क्रिकेट खिलाड़ी एवं टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा के बारे में अच्छी जानकारी रखते हैं। कोई न कोई खिलाड़ी उनका आदर्श भी है। प्रत्येक मुहल्ले की अपनी अलग-अलग क्रिकेट टीम है। ढ़िल्लन अपनी क्रिकेट टीम का कप्तान है। उसकी बैटिंग एवं बालिंग दोनों अच्छी है। इसके साथ ही वे अपनी ग्राम संस्कृति को अपनाये हुये हैं। पाप सिंगरों को भी ये विशेष महत्व देते हैं।
सुहना ने ढ़िल्लन को देख लिया था। उसने पूछा- ‘खाद, बीज ब्लाक में आ गये या नहीं।’
‘अभी नहीं आये हैं, शायद अगले हफ्ते तक आ जायेगें।’ ढिल्लन ने संक्षिप्त एवं धीमे स्वर में जवाब दिया।
बाड़े के गेट से बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। सुहना ने बच्चे को देखा और दौड़कर उसके पास पहुंच गया। वह तीन वर्षीय सुहना का पोता छोटू था। उसके पैर में काँटा चुभा हुआ था। सुहना ने उसके पैर का काँटा निकाला और गोद में उठा लिया। छोटू की नाक बह आई थी, सुहना ने अपने सिर के अंगोछे से नाक पौंछी और बाड़े में बिछी हुई चारपाई पर खड़ा कर दिया। सुहना गोरीबाई की तरफ मुँह करके बोला- ‘बहू लाहर कमा रही है क्या, छोटू को ऐसे ही छोड़ दिया?
‘वो काम कर रही होगी, तभी यह निकल आया होगा।’ गोरीबाई ने उपले पाथते हुये कहा।
सुहना छोटू से बहुत प्यार करता था। वह उसे कंधे पर बिठाये पूरे गाँव में घुमाता था। किन्तु बहू और बेटे से कभी सीधे मुँह बात नहीं करता था। यह बात नहीं थी कि वह उन्हें प्यार नहीं करता था। सामने प्यार जताने पर लड़का बिगड़ सकता है। शायद यह उसका दर्शन था।
अब तक जानवर सानी खा चुके थे। सुहना ने जानवरों को प्यासा जानकर ढिल्लन से अपने स्वभानुरूप कहा- चल रे! हैण्डपम्प चला दे, मैं भैसों को पानी पिला दूँ।
ढिल्लन तो अपने पिता के स्वभाव से पूर्ण परिचित था ही। उसके मित्रों ने उससे कई बार कहा- ‘यार तुम्हारा नन्ना तुमसे हमेशा खुन्नश क्यों खाये रहता है?’’ इस पर ढिल्लन कहता यदि नन्ना इतने कड़क न हों तो मैं और बिगड़ जाऊँ। मित्रों को भी यह बात अब समझ में आने लगी थी।
ढिल्लन हैण्डपम्प चलाने लगा। सुहना एक-एक बाल्टी उठाकर जानवरों के आगे रख देता। एक घण्टे के कठिन परिश्रम से भैंसें पानी पीकर तृप्त हो गयीं। बचा हुआ पानी सुहना ने भैंसों की पीठ पर डाल दिया।
ढिल्लन भी अब नहा लेना चाहता था। वह पानी की बाल्टी भरकर बाथरूम में ले गया। उसने कपड़े उतार कर वहीं चारपाई पर रख दिये। नहाकर वह घर चला गया।
दस पन्द्रह लड़के सुहना के बाड़े में आये। सभी ने सुहना से राम-राम की। सुहना ने कड़क कर पूछा- ‘‘कैसे?’’
‘नन्ना हम सबने विचार किया है कि देवताओं के स्थान पर कीर्तन बैठा दी जाये तो पानी जरूर बरसेगा।’ उनमें से एक लड़के ने अपनी कार्य योजना सुनाई।
‘हां-हां, तेरा बाप भी भूत-भुतनियों को अण्डा मुर्गा देते -देते पचासा पार नहीं कर पाया और मर गया। अब उसकी जिम्मेदारी तू निभाने लगा है।’ सुहना ने व्यंग्य किया।
लड़कों को इन बातों का बुरा नहीं लगा। क्योंकि वे सुहना के विचारों से परिचित थे। वे तो यह सोचकर ही आये थे कि सुहना नन्ना के पास जायेगें तो भोग तो सुनने पड़ेगे। किन्तु दान देने में पीछे नहीं हटेंगें।
‘नन्ना देवता सच्चे हैं हमारी प्रार्थना जरूर सुनेगें।’ उनमें से दूसरा बोला।
‘काहे को चक्कर में पड़े हो रे! पथरा पूजने से कही पानी बरसता है। इतना दमखम हैं तो सरकार से कहो कि यहाँ की जर्जर नहर लाइनों को ठीक करवायें और टेल तक पानी पहुंचायें, तभी कल्याण होगा बरना पुरखा मर गये पत्थर पूजते-पूजते तुम भी मर जाओगे।’
‘आज तो नहर का जीर्णोद्वार हो नहीं पायेगा नन्ना! इसलिये आप हमें चन्दा दे दो, हम देवताओं की पूजा एवं कन्या भोज करके पानी बरसायेगें।
‘सुन’ सुहना अपनी पत्नी गोरीबाई की तरफ मुखातिब होते हुये बोला‘ ‘इन्हें चन्दा दे देना। ये ससुरा कन्या भोज करें या मुरगा दारू?’
‘भैया, थोड़ी देर बाद घर आ जाना तब तक मैं पहुंच रही हूँ।’
लड़के चले गये।
सुहना जितना कड़क था, गोरीबाई उतनी ही दयालु। गरीबों की लड़कियों की शादी में प्रत्येक साल गल्ला और पैसों से उनकी सहायता करती थी। दो गरीब लड़कियों के पुण्य विवाह भी उसने किये थे। सुहना गोरीबाई के इन कामों का विरोध नहीं करता था। हां मुंह से तो कुछ न कुछ बकता रहता था।
लड़कों के चले जाने पर गोरीबाई सुहना से बोली- ‘तुम, किसी से सीधे मुंह बात क्यों नहीं करते हो?’
‘तू क्या जाने?’ सुहना उसे समझाते हुये बोला- ‘इतना कड़क न होता तो ये तेरी सौ बीघा जमीन है न, जाने कौन छीन लेता। देखा नहीं लेागों ने कितने प्रयत्न किये। खेत किसान का सर्वस्व होता है। खेत नहीं है तो किसान काहे का, वह तो मजदूर है मजदूर। खेतों में क्या पैदा होता है, क्या नहीं, किसान को इसका कोई मलाल नहीं है, उसे तो उन खेतों की मिट्टी से प्यार हैं वह तो उसकी खुशबू सूँघने का आदी है।’
‘ये बात तो तुम्हारी ठीक है पर तुम देवी-देवताओं को भी नहीं छोड़ते हो। अगला जन्म सुधर जायेगा इसलिये तो देवताओं की प्रार्थना की जाती है।’ गोरीबाई पूर्ण आस्था से सुहना को समझाने लगी।
अगला जन्म होता है या पिछला जन्म होता है। इसका मुझे ज्ञान नहीं है। मैं तो इसी मिट्टी में जीना चाहता हूँ और इसी में मरना चाहता हूँ। तू अगला जन्म सुधार ले, मैं तुझे रोकता नहीं हूँ, और न कभी रोका है।’ सुहना अब अच्छे मूड में दिख रहा था। वह गोरीबाई के नजदीक आता हुआ बोला- ‘मेरे सामने लोग बातें नहीं करते हैं क्योंकि वे हवा में उड़ते हैं और मैं जमीन में चलता हूँ। हवा में उड़ना सबको अच्छा लगता है। किन्तु खुरदरी जमीन में चलना हर एक के वश की बात नहीं है।’
गोरीबाई हँस पड़ी। उसने आखिरी उपला बनाकर एक तरफ रखा और बोली- ‘‘आप नहीं सुधरेगें।’
‘‘हमारे बाप मर गये हमें सुधारते-सुधारते, हम नहीं सुधरे। अब मुझे कौन सुधारेगा।’’ इतना कहकर सुहना हँस पड़ा।
गोरीबाई ने हैण्डपम्प चलाया हाथ धोये और घर की तरफ चल पड़ी।
भादों का महीना गुजर चुका था, क्वार के महीने ने अपने तीन कदम आगे बढ़ा लिये थे। कीर्तन भण्डारा एक देवता के स्थान पर पूर्ण होता- दूसरे स्थान पर शुरू हो जाता- फिर तीसरे स्थान पर लोग निराश होते जा रहे थे। यह निराशा उनके चेहरे पर स्पष्ट झलक रही थी।
किसानों की यह निराशा बादलों को सहन न हो सकी। मुई खाल की श्वांस से सार को भस्म करने वाली आह से आकाश में घने काले बादल छाने लगे। भयानक गर्जना और बिजली की कड़क से किसानों के हृदय आनन्द से भर गये। पहले बूँदा-बाँदी हुई फिर झर-झर कर झड़ी लग गयी। खूब बरसा हुई। खेत तालाब बन गये। पूरे गाँव में रौनक लौट आई। लोगों के होठों से अनायस गीत निकलने लगे। सुहना की घायल गोटें और ठुमरी अंगड़ाई लेकर मचल-मचल कर होठों पर थिरक उठी।
पन्द्रह दिन बाद खेत जुताई के योग्य हो गये। ट्रैक्टर, हल बैल जुताई के लिये खेतों पर पहुँचने लगे। ढिल्लन भी अपना ट्रैक्टर लेकर खेत पर पहुँच गया। उसने तीन दिन में अपने सारे खेत जोत डाले। जो हल से जोत रहे थे उनके खेत अभी जुताई के लिये रह गये थे।
लोग ब्लाक जाकर खाद बीज खरीद रहे थे। दो दिन बाद बुबाई जो करनी थी।
विजयादशमी के तीन दिन बाद तक सभी के खेतों की बुबाई हो गयी थी। केवल गेहूँ बोने वाले ही कुछ खेत रह गये थे। गेहूँ की बुबाई का समय अभी आया नहीं था।
क्वार मास की पूर्णिमा उन लोगों के लिये विशेष महत्वपूर्ण थी। इस दिन झिंझिया और टेसू के विवाह का कार्यक्रम होता है। जनश्रुति के अनुसार झिंझिया (नायिका) और टेसू (नायक) का विवाह इसी पूर्णिमा के दिन होना था किन्तु किसी कारणवश उनका विवाह नहीं हो सका। जनपद हमीरपुर में झिंझिया का खेल एवं जनपद जालौन में टेसू का खेल खेला जाता है। जनपद जालौन में छोटे-छोटे बच्चे टेसू का पुतला बनाकर द्वार-द्वार टेसू के गीत गा-गाकर पैसे एवं अनाज मांगते हैं। जबकि हमीरपुर में पूर्णिमा के चार दिन पहले से स्वांगों की रिहर्सल होती है। लोग प्रसन्नता से चन्दा देते हैं। जनरेटरों की व्यवस्था की जाती है। गाँव की अधिकांश गलियों में रोशनी की व्यवस्था जनरेटर चलाकर राडों से की जाती है। स्त्री-पुरुष और बच्चे अपने घर के दरवाजे के पास बने हुये चबूतरों में बैठ जाते हैं। और स्वांगों का आनन्द लेते हैं। स्वांग करने वाले सभी पुरुष गाँव के ही होते हैं। स्त्रियों की उसमें भागीदारी नहीं होती है। इस दिन वे अपनी कला की पराकाष्ठा पर पहुँच जाते हैं।
क्वार की पूर्णिमा, उजला-उजला चन्द्रमा आज लोगों को बहुत मोहक लग रहा है। लोग खीर पूड़ी का आनन्द ले रहे थे। यद्यपि गांव में बिजली की व्यवस्था थी किन्तु बिजली कब आये और कब चली जाये कुछ कहा नहीं जा सकता। इसलिये दो जनरेटर चल रहे थें जगह-जगह लकड़ी के खम्भों में लगाये गये राड दूधिया रोशनी से वातावरण को जगमगा रहे थे। रात्रि भोजन के उपरान्त गाँव के सभी लोग अपने-अपने स्थान लेकर बैठ गये थे। बच्चे अपना स्वांग निकाल रहे थे। बच्चों के स्वांगों से लोग हँस रहे थे। कुछ पुरुष महिलाओं वाली साड़ी पहनकर महिलाओं का किरदार निभा रहे थे। कोई गाँव के चार-पाँच आवारा कुत्तों को एक रस्सी से बांधकर खाना बदोस लोगों की असल भूमिका निभा रहे थे। पछइया लुहार की भूमिका तो हू ब हू राजस्थानी बोली बोलकर निभा रहे थे। राम लक्ष्मण की झांकी एवं कृष्ण-गोपिकाओं के संवाद बोलकर लोगों को आध्यात्मिक आनन्द प्रदान करा रहे थे। ये लोग नुक्कड़-नुक्कड़ जाकर अपने रटे-रटाये डायलाग बोलते थे। कुछ लोग हटकर भी बोल देते थे जिसका उत्तर उन्हें अपनी प्रत्युत्पन्नमति से ही देना पड़ता था।
एक स्वांग के पीछे बच्चों की भीड़ थी। बच्चे बहुत शोर कर रहे थे। पहले ही नुक्कड़ पर वह स्वांग शुरू हुआ। वहाँ काफी बड़ा आँगन था। आमने सामने मकान बने हुये थे। द्वार-द्वार पर चबूतरे थे। इस मैदान को सेठ वाला मैदान कहा जाता है। रतन सेठ का घर उसी आँगन के कोने में था। सेठ बहुत ही मृदुभाषी था। उसकी दुकान खूब चलती थी। कभी-कभी उसका मधुर संभाषण अतिक्रमण भी करने लगता था। इसी सम्भाषण की दम पर अपना वह माल दुगुना करता रहता था। इस स्वांग का टाइटिल था ‘घुल्ला की बैठक’। इस स्वांग में ढिल्लन व उसके साथी अभिनय कर रहे थे। कुछ जनाना धोती तो कुछ मरदाना धोती पहने हुये थे।
ढिल्लन इस स्वांग का मुख्य पात्र था। उसने पुरुष वाली धोती कमर में लपेट ली थी। शेष पूरा शरीर नंगा था। धोती को कमर के चारों तरफ से खोंसे हुये था। वह घुल्ला का अभिनय कर रहा था। देवता उसके सिर से बोल रहा था। पंडा बना हुआ लड़का हाथ में गोबर का सूखा कंडा लिये हुये था। एक स्थान पर बैठकर पंडा ने कंडे में कैरोसिन आयल डाल दिया और माचिस की जलती हुई तीली से कंडे में आग लगा दी। तेल लौ के साथ जलने लगा। युवाओं ने भजन गाने शुरू कर दिये।
ढिल्लन अब अंगड़ाई लेने लगा। वह मुँह से पुच्च पुच्च की आवाज निकालने लगा। बीच-बीच में हू-हू भी करता जा रहा था।
कंडा में कैरोसिन आयल का पुनः छिड़काव कर दिया। कंडा लौ के साथ तेजी से जलने लगा। इस बार ढिल्लन बड़ी जोर से उछला, कूदा। मंह से दिल दहला देने वाली आवाज निकाली। पंडा ने घुल्ला को शांत करने के उद्देश्य से उसके सिर पर अंगौछा बाँध दिया।
-‘‘महाराज! कौन हो आप?’ पंडा ने पुनः तेल की आहुति देते हुये पूछा।
-‘ढिल्लन।’
शांत वातावरण अचानक ठहाकों से गूँज उठा। पंडा ने धीरे से उसे कुहनी मारी- ‘‘महाराज’’ ढिल्लन तो घुल्ला का नाम है। आप देव हैं, दानव हैं, भूत है या ..........?
ढिल्लन बड़ी जोर से उछला और मुँह से भयानक आवाज निकाली- ‘‘गोटीराम मैं हुकरादेव हूँ, जो कूछ पूछना हो जल्दी पूछो, घुल्ला कमजोर है, ज्यादा सवारी सहन नहीं कर सकता है।’’
-‘‘महाराज घुल्ला की चिन्ता न करो, खूब भैंस का दूध पीता है। पूरा पट्ठा है।’’ पंडा ने नीबू काटते हुये कहा।
-‘‘गोटीराम! मैं सब जानता हूँ। देवता से कुछ छिपा नहीं है। यह जितना दूध पीता है उतनी ही दारू पीता हैं। शरीर खोखला करता जा रहा है।’’ इतना कहकर घुल्ला ने बड़ी तेजी से हुर...र..र... र... करते हुये सिर हिलाया।
-‘महाराज फरियादी खड़े हैं, अभी चले नहीं जाना।’ पंडा ने ढिल्लन के चेहरे को देखा और उसके हाथ में दो फुट लम्बी लोहे की जंजीर पकड़ा दी।
उन्हीं में से एक लड़का हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और अर्ज करता हुआ बोला-
-‘‘महाराज! मैं रतन सेठ हूँ। कई वर्षों से लड़का ढूँढ़ रहा हूँ। मुझे बेटी के लिये लड़का नहीं मिल पा रहा है।
-‘‘सेठ! तेरी बेटी कितने साल की है। घुल्ला ने जोश में आकर आग की लौ को मुँह में भरते हुये पूछा।
-‘महाराज’ मेरी बेटी अट्ठाइस साल की हो गयी है।’ सेठ बना लड़का विनम्रता से बोला।
-हूँ- ऽऽऽ..।’ घुल्ला ने दहाड़ मारी- ‘‘सेठ तेरी लड़की को तीस साल का वर चाहिये। अब तीस साल का वर मिलना तो मुश्किल है।’’ घुल्ला ने बड़ी तेजी से जंजीर अपनी पीठ पर दे मारी और आकाश की तरफ सिर करके बोला- ‘‘गोटीराम, तू तीस साल के वर के चक्कर में मत पड़। अपनी लड़की के लिये पन्द्रह-पन्द्रह साल के दो लड़के ढूढ ले।’’ समझ ले, देवता कभी झूठ नहीं बोला है।’’
‘बोलो हुकरा देव की जय।’ पंडा ने नारा लगाया। पूरा वातावरण हुकरादेव की जय से गूँज उठा। सभी दर्शक प्रसन्नता से झूम उठें। वह लड़का एक तरफ हट गया। और किसी की फरियाद हो तो थान पर जल्दी आ जाये। हमारे हुकरा देव पूरी कर देगें। पंडा ने हाँक लगाई।
महिला भेष में एक लड़का ढिल्लन के सामने आया। वह ढिल्लन का मित्र ही था। सामने आकर बोला- ‘‘महाराज आप तो अन्तर्यामी हो, सब जानते हों, आजकल पानी मुश्किल से बरस रहा है। घोर कलयुग आ गया है। गाँव में बहुत पाप बढ़ता जा रहा है।’
घुल्ला ने अंगड़ाइ ली। जंजीर पर हाथ फिराते हुये वह बोला- ‘‘जब तक तेरे जैसी छिनार गाँव में रहेगी तब तक पाप नहीं बढ़ेगा तो क्या पुण्य बढ़ेगा।’’ घुल्ला की इस बात पर पूरा दरबार ठहाकों से गूंज उठा।
-‘‘महाराज! उपाय बता दो?’’ वह लड़का बड़े स्टाइल में घूँघट काढ़ कर बोला।
‘सुन! तुझे एक बकरा, एक बोतल शुद्ध महुआ की दारु देनी पड़ेगी। इसके पश्चात चार रातें घुल्ला के यहाँ बितानी होगी तभी तेरा व गाँव का पाप दूर होगा।’ घुल्ला जोर से जंजीर लहराते हुये बोला- ‘बोल मंजूर है।’
-‘‘महाराज मंजूर है। आप बहुत सच्चे हो। आपने मेरे मन की मुराद पूरी कर दी।’’ उसकी बातों को सुनकर सभी हँस रहे थे साथ ही स्वांग की तारीफ करते जा रहे थे।
साड़ी पहने वह लड़का हट गया।
अब तीसरा लड़का घुल्ला के सामने आया। वह भी साड़ी पहने हुये था। वह कभी मुँह खोल लेता था, कभी घूंघट काढ़ लेता था। वह अन्दर ही अन्दर शरमा भी रहा था। वह घुल्ला के पैर पकड़ते हुये बोला- ‘‘महाराज मैं ढिल्लन के घर से हूँ।’’ मैदान में बैठी हुई महिलाएँ खिलखिलाकर हँस पड़ी।
-‘‘ये तो घर की बात थी। घर पर चाहे जब पूछ लेती।’’ इस बार घुल्ला शांत नजर आ रहा था। वह मन ही मन सोचने लगा कि न जाने अब ये क्या पूछेंगे?
-‘‘महाराज घर में फरियाद पूरी हो जाती तो मैं यहां क्यों आती।’’ ढिल्लन की पत्नी बना वह लड़का बड़ी मायूसी से बोल रहा था।
-‘‘महाराज मेरा पति मुझसे प्यार नहीं करता है। इधर उधर ज्यादा मुँह मारता है। आप तो अन्तर्यामी हैं। ऐसी ताबीज बना दो कि ये किसी की तरफ देखें तक न।’’ ठहाकों से पुनः वातावरण गूँज उठा।
-‘‘ठीक है, मैं ताबीज बनाये दे रहा हूँ, तू उसकी कमर से बाँध देना। एक छोर तू पकड़े रहना, वह कहीं नहीं भाग पायेगा।’ इतना कहकर एक ताबीज राख में लपेटकर उसके हाथ में रख दी।
अब घुल्ला ने चारों तरफ देखा और हुर-र र करते हुये कहा -‘देव प्रस्थान करना चाहता है। अब घुल्ला पस्त हो गया है।’
‘नहीं महाराज! एक फरियाद गाँव की तरफ से है।’ पंडा बना युवक सामने आ गया। हाथ जोड़कर बोला- ‘महाराज! हमारे यहाँ पानी का कोई साधन नहीं है। अगर पानी की व्यवस्था हो जाये तो अच्छा रहेगा।’
अबकी बार घुल्ला ने अपनी पीठ पर कसकर जंजीर दे मारी। घुल्ला के मुख से पीड़ा भरी कराह निकली, किन्तु वह उस पीड़ा को जब्त कर गया। जंजीर लहराते हुये वह बोला- ‘‘यह फरियाद तो बहुत कर्री है। फिर भी मैं सुझाव देता हूं कि सब गाँव वालों को मिलकर नालों में, खेतों में, डैम बनाने होगें। जैसे रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेन्द्र सिंह ने नदी की संसद बनाई थी। बरसात का पानी इकट्ठा कर लो, उसे बरबाद मत होने दो। जहाँ सरकारी डैम बन रहे हों, वहाँ सरकार के कार्यां में मदद करो। निश्चित रूप से पानी की समस्या दूर हो जायेगी। युवाओं को आगे आना होगा। घुल्ला ने पुनः एक जोरदार चीख अपने मुँह से निकाली- ‘‘बोलो, अगर सभी गाँव वाले तैयार हों तो हुकरा देव भी पीछे नहीं रहेगा।’’
हुकरा देव की इस बात पर पूरे वातावरण में एक स्वर गूँज उठा- ‘‘हम सब तैयार हैं।’’
इतना सुनकर घुल्ला उछला और पीछे जाकर धच्च से धरती पर जा गिरा। पंडा ने उसके शरीर पर राख मल दी।
पुनः गगन भेदी नारा गूँजा ‘हुकरा देव की जय।’
घुल्ला वाला स्वांग अगले नुक्कड़ की तरफ बढ़ गया।
गाँव के इस कार्यक्रम का संचालन चैधरी रामधन जी कर रहे थे। एक स्वांग के निकल जाने के बाद तैयार खड़े दूसरे स्वांग को वह इजाजत दे देता था ताकि नुक्कड़ों पर ज्यादा भीड़ न हो और एक-एक कार्यक्रम गाँव वाले आराम से देख सकें।
घुल्ला के स्वांग के बाद दूसरा स्वांग था शिक्षा का। यह भी अजीब नजारा। करीब सत्तर वर्ष के सात बुड्ढे स्टूडेन्ट वाली यूनिफार्म पहने हुये थे। उनका टीचर सोलह साल का एक लड़का था। वह अपने साथ एक छड़ी, रजिस्टर तथा पेन लिये हुये था। सभी बूढ़े अपने-अपने चश्मे पहने हुये थे। ये चश्मे उन्हें आँखों के आप्रेशन के बाद सरकार से मुफ्त मिले थे। अपने जमाने के ये झिंझिया के अच्छे कलाकार रहे थे। वे सभी पाटी और खड़िया लिये हुये थे।
वह लड़का जो टीचर का स्वांग कर रहा था। साथ में लाई हुई कुर्सी पर बैठ गया। उसने अपना रजिस्टर खोला और हाजिरी लेने लगा। बुद्धा-यस सर.... लटोरा-यश सर... कढ़ोरा- यस सर.... घसीटा-यस सर। सभी बुड्ढे उछल-उछल कर यश सर कहते और बैठ जाते। सभी दर्शक उन बुड्ढ़ों के स्वांग पर हँस रहे थे। उनके वे नाम वास्तविक नहीं थे।
टीचर अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। और छड़ी लहराते हुये बोला
-‘बुद्धा तू कल क्यों नहीं आया?’ बुद्धा खड़ा हो गया और बड़ी मासूमियत से बोला-‘साब कल मम्मी को लड़का हुआ था इसलिये मैं स्कूल नहीं आ पाया।’’
-हू।’ टीचर ने हुंकार भरी और बैठने का संकेत किया।
‘मास्टर साब।’
‘क्या है? टीचर उखड़ पड़ा- ‘तू बैठा नहीं।’
‘साब हम पाँच भाई हो गये।’ बुद्धा लजाते हुये बोला।
‘क्यों तेरे मम्मी पापा ने परिवार नियोजन नहीं अपनाया। ‘टीचर ने बुद्धा को बड़े प्यार से कहा।
पूरा माहौल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।
‘साब मम्मी से कह दूँगा कि हमारे मास्टर साब कह रहे थे कि परिवार नियोजन अपना लो।‘ अब बुद्धा अपने स्थान पर बैठ गया।
बूढ़े की ऐसी बातों पर वृद्ध महिलाएं फुसफुसाई- ‘देखो बुढ़रा को शरम भी नहीं आ रही है।’’
टीचर क्लास में घूमता हुआ घसीटा के पास पहुँचा उसकी पीठ पर जोर से छड़ी मार दी और कड़क स्वर में पूछने लगा- घसीटे तू कहाँ जाता है, आये दिन अपसेन्ट बना रहता है।’
-‘मास्टर साब, मैं सरकारी अस्पताल में चैक करवाने गया था।’
-‘क्या बीमारी है तुझे?’ टीचर ने डपटा।
-‘साब खून की जाँच करवाने गया था कि कहीं मुझे एड्स तो नहीं है।’ घसीटा शरमाते हुये हिल रहा था।
मैदान में ठहाके गूँज रहे थे।
टीचर ने अपने हैट को ठीक किया और बोला- ‘क्या बताया डा0 ने?
‘साब मेरी रिपोर्ट ठीक है’।
‘बहुत अच्छा, बैठ जा।’ टीचर ने घसीटा को बैठने का हुक्म दिया।
टीचर इधर-उधर देखने लगा। उसकी नजर कढ़ोरा पर केन्द्रित हो गयी।
‘कढ़ोरे?’ टीचर ने दहाड़ लगाई- ‘एड्स काहे से फैलता है।’?
कढ़ोरा खड़ा हो गया और उंगलियों से गिनता हुआ बोला- ‘साब डा0 की संक्रमित सुई से और ..... और संक्रमित माँ से उसके होने वाले बच्चे को ............... और .............. और..............?
-‘अरे बोल, चुप क्यों हो गया? मास्टर ने फटकार लगाई।
-‘साब बाकी लटोरा से पूछ लो, मुझे शरम आती है।’ कढ़ोरा बच्चों की तरह हँस पड़ा।
‘तू ही बता, शरमा मत।’ टीचर उसके नजदीक आकर बोला।
‘साब असुरक्षित यौन सम्बन्ध से भी एड्स फैलता है।’
‘वैरी गुड कढ़ोरा।’ टीचर ने शाबासी दी।
अब लटोरा खड़ा हो गया। टीचर का ध्यान उसकी तरफ हो गया।
मास्टर साब, घसीटा को एड्स हो जायेगा।’
‘-क्यों?’ टीचर की आँखें सिकुड़ी।
‘इसे साब कुछ ज्ञान नहीं है।’
लटोरा की बात सुनकर घसीटा खड़ा हो गया। वह तपाक से बोला- ‘साब इसे ही फैलेगा, मुझे नहीं, देखो मेरी जेब में कण्डोम है।’ इतना कहकर बहुत सारे कण्डोम दर्शक दीर्घा की तरफ उछाल दिये।
स्त्रियां थोड़ा शरमा रही थी। फिर भी हँस रही थी।’
इसी तरह अनेक स्वांग निकलते गये। सुबह चार बजे इन स्वांगों का कार्यक्रम समाप्त हुआ। लोग अपने-अपने घरों में सोने चले गये।
सुबह स्वांगों की खूब चर्चा हो रही थी। लोग एक दूसरे को स्वांग बता रहे थे कि किस तरह से किसने अभिनय किया है। लोग कह रहे थे स्वांगों की ज्यादा रिहर्सल भी न हो पायी थी फिर भी अच्छे जम गये थे।
एक माह के अन्तराल में खेत हरे-भरे दिखने लगे थे। किसान खेतों को देख आनन्द से झूम उठते थे। लहलहाती फसल ने उनके सारे दुख-दर्द दूर कर दिये थे। कुछ आवारा किस्म के लोगों को इस झूमती-इठलाती फसलों में कोई आकर्षण नहीं दिखाई दे रहा था। उनका आकर्षण दारु थी जिसे पीकर गाँव में उपद्रव कर देते थे। अधिकतर लोग इन दारुबाजों से त्रस्त थे।
जब मनुष्य को आनन्द प्राप्त होता है तो समय कब गुजर जाता इसका पता हीं नहीं चलता है। यही हाल किसानों का था। चैत्र मास कब आ गया, यह तो उन्हें फसलों के पक जाने पर भान हुआ। लोगों ने हँसिया-खुरपी तैयार किये। खेतों की कटाई शुरु हो गयी। चैतुआ चैत्र मास के गीत मधुर स्वर में गाते। वे गीत बसन्त की बयार में घुलकर कानों में मधु सा उड़ेल रहे थें। लोग सुबह ही खेतों को निकल जाते और देर रात तक घर लौटते। कपड़े मैले हो गये थे किन्तु उन्हें इसकी परवाह नहीं थी।
सुहना नन्ना के पास ट्रैक्टर और थ्रेसर थे। कुछ अन्य किसानों के पास भी ये कृषि यंत्र थे। किन्तु अधिकांश किसान बैलों द्वारा खेती करते थे। ट्रैक्टर वालों का अनाज जल्दी घर आ गया।
कुछ किसानों ने भाड़ा देकर लाक की मड़ाई करवा ली थी। अन्य किसानों ने डीजल के भाव को देखकर अपने हाथ सिकोड़ लिये थे और बैलों से ही मड़ाई करने का फैसला कर लिया था। थ्रेसर वाले को पहले डीजल देना पड़ता था, बाद में मड़ाई का भाड़ा भी। ग्राम समाज की पड़ी हुई जमीन पर खलिहान बनाकर खेतों से लाक उठाकर यहाँ रख रहे थे ताकि बैलों से मड़ाई कर सकें। किसान सपरिवार खलिहानों में कार्य करने लगे।
दोपहर का समय था। पछुवा हवा लू बनकर शरीर को झुलसा रही थी। तभी लोगों ने देखा खलिहान से ध्आँ का गाढ़ा गुबार आकाश की ओर उड़ने लगा। देखते-देखते उस धुएं से आग की भयंकर लपटें उठने लगीं। लाक के साथ वहां खड़े, हुये पेड़ चट्-चट् की आवाज के साथ जलने लगे।
पूरे गाँव में हड़कम्प मच गया। लोग गगरी बाल्टी लेकर आग बुझाने पहुँचे तब तक पूरे खलिहानों को आग ने अपनी चपेट में ले लिया था। भीषण गर्मी और आग की लपटें लोगों को अपने पास फटकने भी नहीं दे रही थी। लोग बकरे की बलि दे रहे थे। महिलायें दही से भरे हुये बर्तन आग में फैंक रहे थे। उनका विश्वास था बलि और दही से देवी शांत हो जाती है। हवा और प्रचण्डता के साथ बहने लगी।
अब लपटें अपने क्षेत्र का विस्तार करते हुये खपरैल वाले घरों पर हावी होने लगी। एक से दूसरे में ......... दूसरे से ...........। लोग असहाय से हो गये। फायर बिग्रेड को फोन से सूचना दे दी गयी थी।
फिर भी लोग आग पर काबू पाने का असफल प्रयास करते रहे। तालाब सूख चुके थे। हैण्डपम्पों का सहारा लिया किन्तु सब व्यर्थ। पूरा गाँव राख में तब्दील हो चुका था। दिन में आग लगी थी अतः जानें तो नहीं गयी पर घरों में कुछ न बचा। घर के बर्तन पिघलकर बह गये थे।
फायर बिग्रेड आ चुकी थी लेकिन उसको करने को कुछ नहीं बचा था। सब जलकर खाक हो चुका था। दमकल वाले अब खाक की आग को बुझाने में लगे हुये थे।
लोग गश खाकर गिर रहे थे। महिलाएँ पछाड़े खा रही थी। साल भर की कमाई दो घण्टे में स्वाहा। लोग पागलों की तरह जमीन में पड़े चिल्ला रहे थे। शायद सचमुच ही वे पागल हो गये थे।
आस-पास के गाँव वालों ने उनकी खूब मदद की। दस-पन्द्रह दिनों के खाने का इन्तजाम भी उन्होने कर दिया था। सरकार की तरफ से कोटेदारों ने गल्ला बाँटा था।
सरकार की तरफ से अग्निपीड़ितों को सहायतार्थ धनराशि वितरण के निर्देश दिये गये। हाल ही की घटना से सबको दुख हो रहा था। जैसे-जैसे समय बीतता गया अन्य लोगों के दिल से वह पीड़ा भी धीरे-धीरे लुप्त होने लगी। जिनके घर जल गये थे अब वे ही अकेले भोगने के लिये रह गये थे।
गाँव के प्रत्येक व्यक्ति को चैकें वितरित की गयी। चैक भुनाने हेतु बैंक जाना पड़ा। कुछ दलाल उसमें शामिल हो गये। तीस प्रतिशत का सुविधा शुल्क उन्हें चढ़ाना जरुरी हो गया। अधिकांश गाँव वालों ने यह शुल्क देकर रुपये प्राप्त कर लिये थे। ढिल्लन ने भी शुल्क देने की हामी भर ली थी। बैंक का समय समाप्त हो रहा था। इसलिये उसे कल आने को कहा गया था।
सुहना ने ढिल्लन से पूछा कि कितने रुपये मिले। ढिल्लन ने बताया कि दस हजार रुपये का चैक मिला है। तीन हजार बैंक वाले माँग रहे थे।
चैक मुझे दे, कल मैं जाऊँगा बैंक। सुहना ने चैक ले लिया। सुहना और उसकी पत्नी ब्लाक पहुँचे। बैंक खुल गया था। कर्मचारी अपने कार्य में लग गये थे कुछ अपने केबिन को खोलते जा रहे थे।
सुहना ने चैक बैंक मैनेजर के सामने रख दिया। मैनेजर ने बगल में बैठे हुये दलाल की तरफ इशारा किया। दलाल उठा और सुहना को एकांत में ले गया। दलाल ने बात स्पष्ट कर दी थी।
सुहना मैनेजर के पास आया और धीरे से बोला- ‘साहब, पहले वाले मैनेजर ने तो कभी पैसे नहीं माँगे। आप ये पैसे क्यों ले रहे हैं।?’
‘मदन ने नहीं बताया।’ मैनेजर ने दलाल की तरफ इशारा किया।
बताया है, लेकिन मुझे रुपये पूरे चाहिये।’ सुहना ठोस इरादे में बोला।
‘ले लो न, कौन रोक रहा है तुम्हें?’ मैनेजर ने तल्ख स्वर में कहा।
सुहना ने चैक मैनेजर के सामने रख दिया।
मैनेजर ने चैक फैंक दिया।
सुहना ने चैक उठा लिया और विनम्र स्वर में बोला- ‘साब हमारी स्थिति पर ध्यान दीजियें हमारे पास कुछ नहीं बचा। लोग आपको दुआएं देगें ।
‘दुआओं से पेट नहीं भरता है।’ मैनेजर व्यंग्य से मुस्कराया।
सुहना को ताव आ गया और बोला- ‘‘पूरे पैसे ले ले, मैने तुझे पूरे पैसे दिये, इतनें में तेरे जवान बेटे की त्रयोदशी हो जायेगी।’’
स्थिति को भाँपकर गोरीबाई आगे आ गयी और सुहना का हाथ पकड़ते हुये बोली- ‘‘ऐसी बातें शोभा नहीं देती हैं, ईश्वर से डरो, वह सब देखता है।’
‘वह कुछ नहीं देखता है। अगर देखता होता तो इसकी करतूतों को क्यों नहीं देखता है?’ सुहना उबल रहा था- ‘‘यह खुले आम रिश्वत लेता है, ईश्वर इसका कुछ नहीं बिगाड़ेगा। रिश्वत के पैसे से यह और अधिक फूलेगा-फलेगा। आग हमारे घरों में लगती है, अपना घर यह भर लेता है। हराम का पैसा खा-खाकर कैसा मोटा हो रहा है।’
मैनेजर अपनी बेइज्जती से तिलमिला उठा। उसने पुलिस बुलाने की धमकी दे डाली फिर भी उसके हाथ काँप रहे थे। धमकी का सुहना पर कोई असर नहीं हुआ। चैक के टुकड़े करके मैनेजर के मुख पर दे मारे और बैंक से बाहर निकल आया।
बैंक में सन्नाटा छा गया, जैसे सभी को साँप सूँघ गया हो।

15 अप्रैल 2009

कृष्ण कुमार यादव की कहानी - बेटे की तमन्ना

बेटे की तमन्ना
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रात के करीब एक बजे.... चारों तरफ सन्नाटा .... कभी-कभी कुछ कुत्तों की कूं-कूं सुनाई देती या झोपड़ियों के बाहर सो रहे लोगों के खर्राटों की आवाज। गाँव की दलित बस्ती के अंतिम छोर पर स्थित झोपड़े में से लालटेन का मद्विम प्रकाश छनकर बाहर आने की कोशिश कर रहा था। झोपड़े के अन्दर जमीन के एक कोने में लेटी स्त्री अचानक प्रसव-पीड़ा से कराह उठी। उसके पूरे बदन में ऐंठन होने लगी। उसकी पीड़ा और कराह सुनकर उसकी सास माँ जो कि उसके पहले से ही जने गये चार बेटियों को लेकर सो रही थी उठकर उसके करीब आ गयी। इस बार अपनी बहू की पुत्र रत्न प्राप्ति के प्रति वह आश्वस्त थी। उसने तमाम देवी-देवताओं के दर्शन करने और मन्नत मानने से लेकर अपनी बहू को गाँव के पुरोहित और ओझा से भी बेटा होने का आशीर्वाद दिलाया था। इसके बदले में उसने पुरोहित और ओझा को पचीस-पचीस रूपये भी दिये थे। यद्यपि वह लगातार चार वर्ष से बहू की पुत्र-प्राप्ति हेतु सब जतन कर रही थी, पर अभी तक भगवान ने उसकी नहीं सुनी थी।

चारों बेटियाँ घर में किसी नये सम्भावित सदस्य के आगमन से बेखबर सो रही थीं। घर का मर्द दिन भर कड़ी मेहनत के बाद एक गिलास कच्ची दारू पीकर बेसुध खर्राटे भरी नींद ले रहा था। उसका इस बात से कोई मतलब नहीं था कि उसका एक अंश आज कहीं बाहर आने को उत्सुक हो रहा है। चार बेटियों की प्राप्ति के बाद उसने भी पुत्र प्राप्ति की आशा छोड़कर सब कुछ भगवान के भरोसे छोड़ दिया था। उसे तो शायद यह भी नहीं पता कि आने वाला नन्हा जीव, दारू के नशे में धुत बीबी के साथ किये गये किस दिन के प्यार की निशानी है। जब भी वह रात को सोता तो सपने देखता कि उसका एक बेटा है, जो उसके काम में हाथ बँटा रहा है। जब वह सिर पर मिट्टी रखकर फेरे लगाते थक जाता तो थोड़ी देर किसी पेड़ की छाया में बैठकर बीड़ी का सुट्टा लगाता कि तभी ठेकेदार की कड़क आवाज आती- श्क्या बे कामचोर! पैसे तो दिन भर के लेता है तो काम क्या तेरा बाप करेगा?श् तब उसे लगता कि काश उसका कोई बेटा होता तो कभी-कभी वह उसे अपनी जगह भेजकर घर पर आराम करता। पर यह पेट भी बहुत हरामी चीज है जो हर कुछ बर्दाश्त करने की ताकत देता है।

एक दिन उसने टेलीविजन में देखा था कि प्रधानमंत्री पूरे देश में सड़कों का जाल बिछाने की घोषणा कर रहे थे और इससे हर साल करीब एक करोड़ रोजगार पैदा होने की बात कर रहे थे। कुछ ही दिनों बाद उसने देखा कि गाँव के बाहरी छोर पर एक बड़ा सा गड्ढा खोदा जा रहा है। पूछने पर पता चला कि उसका गाँव भी प्रधानमंत्री जी की घोषणा के अन्तर्गत जल्दी ही सड़क से शहर द्वारा जुड़ जायेगा। ठेकेदार मिट्टी के पूरे पैसे तो सरकार से लेता पर गाँव वालें को आँख तरेरता कि अगर अपने खेतों से मिट्टी मुत में नहीं दोगे तो सड़क कैसे बनेगी... ये ऊँचे-नीचे गड्ढे भरने के लिए तो तुम्हें मिट्टी देनी ही पड़ेगी। गाँव वाले भी सड़क के लालच में शहर जाने की सुविधा हो जाने के चक्कर में अपने खेतों से ठेकेदार को मुत में मिट्टी लेने की अनुमति दे देते। ठेकेदार के आदमी रोज दिहाड़ी पर काम करने वालों की सूची बनाते और अपना कमीशन काटकर शाम को उनकी मजदूरी थमा देते। उसने भी ठेकेदार के आदमियों के हाथ-पाँव जोड़कर किसी तरह काम पा लिया था और उन एक करोड़ लोगों में शामिल हो गया था, जिन्हें उस साल रोजगार मिला था। वह रोज सोचता कि अगर उसका कोई बेटा होता तो ठेकेदार के आदमियों के हाथ-पाँव जोड़कर उसका भी नाम सूची में लिखवाकर काम पर लगवा देता। वैसे भी काम मिले तो नाम से क्या मतलब? वह यह जानता था कि ठेकेदार के आदमी भले ही उसे हर रोज मजदूरी का पैसा देते हैं, पर कुछ दिनों के अन्तराल पर उसकी जगह कोई दूसरा नाम लिख देते हैं। धीमे-धीमे वह भी सरकार के एक करोड़ रोजगार का राज समझने लगा था। पर इससे उसे क्या फर्क पड़ता है, उसे तो बस मजदूरी से मतलब है।

एक दिन पंचायत भवन में लगे टेलीविजन में उसने देखा कि नयी सरकार हेतु अब फिर से वोट डाले जाने वाले हैं। टेलीविजन में बड़े-बड़े विज्ञापन दिखाये जा रहे थे, जिसमें गाँव को शहरों से जोड़ने वाली चमचमाती सड़क दिखायी गयी थी। वह बहुत देर तक सोचता रहा कि अभी तो अपने गाँव वाली सड़क बनी भी नहीं, फिर इसके फोटू टेलीविजन पर कैसे आ गये। उसने शहर से कमाकर लौटे एक नौजवान लड़के से इसके बारे में पूछा तो पहले तो उसने सिगरेट का पूरा धुंआ उसके मुँह पर दे मारा और फिर हँसता हुआ बोला-गंवार कहीं के! तेरे को बार-बार समझाता हूँ कि मेरे साथ शहर कमाने चल, थोड़ा वहाँ की दुनिया का भी रंग-ढंग देख। पर तेरे को बच्चा पैदा करने से फुर्सत मिले तो न? करीब पन्द्रह मिनट शहर के बारे में अपने शेखी बघारने के बाद उसने बताया कि जैसे टेलीविजन देश-दुनिया की हर खबर को दिखाता है, वैसे ही इससे भी नई एक मशीन कम्प्यूटर होती है जो जिस चीज को जैसे चाहो, वैसे बनाकर दिखा देती है। बात उसके पल्ले पड़ी तो नहीं पर वह मानो समझ गया के लहजे में सर हिलाकर घर की तरफ चल दिया। वह तो चाहता था कि ज्यादा दिन तक सड़क बने ताकि उसेे ज्यादा दिन तक काम मिल सके।

गाँव में पहले छुटभैया नेताओं और फिर चमचमाती कारों व जीपों के काफिले में बड़े नेताओं के दौरे आरम्भ हो गये थे। हर कोई गरीबी और भुखमरी मिटाने की बात कहता। जिस पार्टी का नेता आता हर घर पर उसी के झण्डे और बैनर दिखते। शाम को नुक्कड़ वाली चाय की दुकान में दिन भर नेता जी के पीछे दौड़ने और भीड़ जुटाने के एवज में मिली सहायता राशि से पीने-पिलाने का दौर शुरू होता। इधर ठेकेदार के आदमियों ने मजदूरी में से ज्यादा कमीशन काटना आरम्भ कर दिया, यह कहकर कि चुनाव में खाने-पीने का खर्चा कौन देगा? शाम को वह काम से लौटा तो देखा पंचायत भवन में भीड़ जुटी हुयी है। एक बाहरी सा दिखने वाला आदमी लोगों को बता रहा था कि अब मशीन से वोट पड़ेगा। जब मशीन की बटन दबाओगे और पीं बोलेगा तो समझना वोट पड़ गया।

चुनाव खत्म हो चुका था। एक दिन उसने देखा कि कोई नया ठेकेदार और उसके आदमी आये हैं। वह बहुत खुश हुआ क्योंकि पुराना ठेकेदार तो बहुत जालिम था। एक मिनट भी सुस्ताने बैठो तो गालियों की बौछार कर देता था। पर वह आश्चर्यचकित भी था कि ठेकेदार का तो इतना रौब था, फिर उसे कैसे हटा दिया गया? शाम को घर लौटते समय पंचायत भवन मे लगे टेलीविजन के पास भीड़ देखकर वह भी ठिठक गया। टेलीविजन पर एक खूबसूरत महिला जिन्दाबाद के नारों के बीच बोल रही थी कि- श्जनता अब परिपक्व हो चुकी है। उससे अपना वोट पिछली सरकार के विरूद्ध देकर हमारी पार्टी को सरकार बनाने का जनादेश दिया है।श् पंचायत भवन में ही उसने सुना कि उसके इलाके से कोई नये सांसद चुने गये हैं और नया ठेकेदार उन्हीं का आदमी है।

घर लौटते समय रास्ते भर वह अपनी अंगुली पर मतदान की निशानी के रूप में लगी स्याही को ध्यान से देखता रहा। एक बार तो उसने स्याही को सूंघकर उसकी गंध को समझने की भी कोशिश की, पर उसमें वह किसी भी गंध को न पा सका। उसे ताज्जुब हो रहा था कि इसी अंगुली से बटन दबाने से सरकार भी बदल जाती है। खैर, उसे दिल्ली में बैठी सरकार से क्या लेना-देना? वह तो यही सोचकर खुश था कि उसने अंगुली से जो बटन दबाई, वह पुराने ठेकेदार को हटाने में एक महत्वपूर्ण कारण है।

झोपड़े के अंदर उस स्त्री की प्रसव-पीड़ा और भी तेज हो चली थी। उसकी सास माँ उसके पेट पर तेजी से हाथ सहलाने लगी थी और सोच रही थी कि बहू की पुत्र-रत्न प्राप्ति के बाद वह किस मन्दिर में जाकर सबसे पहले सर नवायेगी। अचानक स्त्री पूरी तरह कराह के साथ छटपटा उठी और एक नव जीवन का पृथ्वी पर आविर्भाव हुआ। सास माँ ने तेजी से लालटेन लेकर गौर से नवजात शिशु का मुआयना किया तो उसका दिल धक से रह गया। उसकी सारी मनौतियों के बावजूद उसकी बहू के गर्भ से फिर एक बेटी का जन्म हुआ था। अपनी मनौतियों का ऐसा तिरस्कार वह नहीं बर्दाश्त कर पायी और यह भूलकर कि उसकी बहू ने अभी प्रसव-वेदना से मुक्ति पायी है, उसे डायन व तमाम आरोपों से नवाजने लगी। इन सबसे बेखबर माँ ने शिशु को अपने बदन से चिपका लिया, ऐसा लगा मानो उसकी सारी पीड़ा शिशु के बदन की गर्मी पाते ही छू-मंतर हो गयी।

पति ने नींद में ही बड़बड़ाते हुए अपनी माँ को शोर न मचाने का आदेश दिया। दारू का नशा अभी भी नहीं उतरा था। अपने अंश के आविर्भाव से अपरिचित वह सपने में देख रहा था कि उसका गाँव शहर से चमचमाती सड़क द्वारा जुड़ गया है। वह एक सम्पन्न किसान बन गया है और अपने बेटे को ट्रैक्टर पर बिठाकर अनाज बेचने शहर की तरफ जा रहा है।

कृष्ण कुमार यादव
भारतीय डाक सेवा
वरिष्ठ डाक अधीक्षक,
कानपुर मण्डल,कानपुर (उ0प्र0)-208001
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जीवन-वृत्त : कृष्ण कुमार यादव
भारत सरकार की सिविल सेवा में अधिकारी होने के साथ-साथ हिंदी साहित्य में भी जबरदस्त दखलंदाजी रखने वाले बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी कृष्ण कुमार यादव का जन्म १० अगस्त १९७७ को तहबरपुर आज़मगढ़ (उ. प्र.) में हुआ. जवाहर नवोदय विद्यालय जीयनपुर-आज़मगढ़ एवं तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय से १९९९ में आप राजनीति-शास्त्र में परास्नातक उपाधि प्राप्त हैं. समकालीन हिंदी साहित्य में नया ज्ञानोदय, कादम्बिनी, सरिता, नवनीत, आजकल, वर्तमान साहित्य, उत्तर प्रदेश, अकार, लोकायत, गोलकोण्डा दर्पण, उन्नयन, दैनिक जागरण, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, आज, द सण्डे इण्डियन, इण्डिया न्यूज, अक्षर पर्व, युग तेवर इत्यादि सहित 200 से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं व सृजनगाथा, अनुभूति, अभिव्यक्ति, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, रचनाकार, लिटरेचर इंडिया, हिंदीनेस्ट, कलायन इत्यादि वेब-पत्रिकाओं में विभिन्न विधाओं में रचनाओं का प्रकाशन. अब तक एक काव्य-संकलन "अभिलाषा" सहित दो निबंध-संकलन "अभिव्यक्तियों के बहाने" तथा "अनुभूतियाँ और विमर्श" एवं एक संपादित कृति "क्रांति-यज्ञ" का प्रकाशन. बाल कविताओं एवं कहानियों के संकलन प्रकाशन हेतु प्रेस में. व्यक्तित्व-कृतित्व पर "बाल साहित्य समीक्षा" व "गुफ्तगू" पत्रिकाओं द्वारा विशेषांक जारी. शोधार्थियों हेतु आपके व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक "बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव" शीघ्र प्रकाश्य. आकाशवाणी पर कविताओं के प्रसारण के साथ दो दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित काव्य-संकलनों में कवितायेँ प्रकाशित. विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा समय-समय पर सम्मानित. अभिरुचियों में रचनात्मक लेखन-अध्ययन-चिंतन के साथ-साथ फिलाटेली, पर्यटन व नेट-सर्फिंग भी शामिल. बकौल साहित्य मर्मज्ञ एवं पद्मभूषण गोपाल दास 'नीरज'- " कृष्ण कुमार यादव यद्यपि एक उच्चपदस्थ सरकारी अधिकारी हैं, किन्तु फिर भी उनके भीतर जो एक सहज कवि है वह उन्हें एक श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में प्रस्तुत करने के लिए निरंतर बेचैन रहता है. उनमें बुद्धि और हृदय का एक अपूर्व संतुलन है. वो व्यक्तिनिष्ठ नहीं समाजनिष्ठ साहित्यकार हैं जो वर्तमान परिवेश की विद्रूपताओं, विसंगतियों, षड्यंत्रों और पाखंडों का बड़ी मार्मिकता के साथ उदघाटन करते हैं."

सम्प्रति/सम्पर्क: कृष्ण कुमार यादव, भारतीय डाक सेवा, वरिष्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर मण्डल, कानपुर-208001
ई-मेल: s
kkyadav.y@rediffmail.com
ब्लॉग:
www.kkyadav.blogspot.com

09 मार्च 2009

डा0 अलका पुरवार की कहानी - बस अब और नहीं .....

‘‘चैप्टर मस्ट बी क्लोज्ड’’, कहने के साथ ही प्रणय ने बात खत्म करनी चाही। वाक्य छोटा था पर प्रिया की आशाओं और अरमानों पर तो जैसे तुषारापात ही कर गया, फिर भी उसने हिम्मत करके कहा, क्या आज की शाम तुम मेरे नाम कर सकते हो, बस आखिरी शाम .....’’ ? ‘‘ठीक है’’, प्रणय ने कुछ अनमने भाव से कहा।
शाम आने से पहले प्रिया सारे दिन सोचती रही लेकिन शायद स्त्री संकोच उसे प्रणय कर दबाव डालने से रोकता रहा। यूँ दिल तो बहुत चाह रहा था प्रणय से उस वाक्य को वापस लेने के आग्रह करने का फिर यह सोचकर कि प्रेम दबाव का नहीं बल्कि स्वाभाविकता और सहजता का नाम है, उसने अपनी भावनाओं के ज्वार को दबाना ही ठीक समझा। हालांकि उसके अन्तस से आवाज आ रही थी विद्रोह की; प्रणय को खरी-खोटी सुनाने की लेकिन अपनी इच्छाओं को परे धकेल कर वह शाम का इन्तजार करने लगी।
अन्ततः प्रिया ने अपनी सारी भावनाओं, इच्छाओं व आशाओं का गला घोंटते हुये प्रणय को दोस्त रूप में मिलने का निर्णय किया, जिसमें वह प्रेयसी के रूप में अपना अधिकार जमाने नहीं बल्कि एक सहपाठिनी के रूप में अधिकार जताने वाली थी। सुपर मार्केट की ‘बुक-वार्म’ दुकान में निगाहें दौड़ाते, उसने सामने से आते हुये प्रणय को देखकर हाथ हिलाया। प्रणय कितने दबाव में है बल्कि कुछ सहमा सा भी, इसका अंदाज उसके चेहरे से ही लगा लिया था प्रिया ने। लेकिन रेस्तरां में प्रिया को उसी पुराने उन्मुक्त व अल्हड़ मूड में देखकर प्रणय थोड़ी ही देर में काफी सहज हो चुका था। सुबह के तनाव का हल्का सा चिन्ह भी उसे प्रिया के चेहरे पर नहीं दिखाई दे रहा था और उधर प्रिया, वह अपनी जिन्दगी की इस सबसे ‘खास’ शाम को शायद पूरी तरह जी लेना चाहती थी इसलिये बिना वक्त बरबाद किये उसने पूछा, ‘‘क्या खिलाने जा रहे हो आज ?’’ प्रणय ने उत्साहित होकर कहा, ‘‘पूरी साल एक भी ट्रीट न देने के कारण बैच में तुमने मुझे कंजूस की जो उपाधि दी थी, आज मैं उस लेबिल को हटाना चाहता हूँ इसलिये तुम आज जी भरकर आर्डर करना।’’ ‘‘अच्छा’’ कहते हुये वह खिलखिला कर हँस पड़ी। ‘‘तो ठीक है, पनीर कटलेट, बेजीटेबिल बर्गर, मटन चाॅप और हाँ कसाटा मँगाना मत भूलना।’’
‘‘हाँ, वो सुबह तुम क्या कह रही थी ?’’ प्रणय ने जैसे अनिच्छा से पूछा। ‘‘मैं ...... कुछ खास नहीं ..............’’, प्रिया ने जानबूझकर बात अधूरी छोड़ी लेकिन प्रणय ने भी मानो बात टालने की गरज से प्रिया द्वारा खरीदे उपन्यास को उठाया और उपन्यास का शीर्षक नो रूम फार लोनलीनेस देखकर एक गहरी साँस छोड़ी। प्रिया ने कनखियों से उसे तनाव मुक्त होते देखकर अपने दिल पर बोझ सा महसूस किया। शायद उपन्यास के शीर्षक ने उसे प्रिया के अकेलेपन का अहसास न होने दिया या उसने जरूरत ही न समझी। आज भी उस शाम की याद जेहन में आते ही प्रिया बहुत अकेलापन महसूस करती है। ठगे जाने का एक अहसास जिसे वह कभी किसी को नहीं बता पाई लेकिन साथ में एक सुकून भी था कि प्रणय ने अगर प्रेम का रिश्ता नहीं निभा पाया तो क्या, उसने स्वयं दोस्ती का फर्ज बखूबी निभाया।
घर लौटते समय अँधेरा घिरने को था लेकिन बाहर के अंधेरे से गहरा था उसके मन का अंधेरा। कमरे में पहुँचकर निढाल होकर वह बिस्तर पर गिर पड़ी। सब कुछ खत्म हो चुका था, जिन्दगी बेमायने हो चुकी थी। उसकी दुनिया में प्यार की शमा जलने से पहले ही बुझ चुकी थी। आँखों से अविरल गिरते आँसुओं के बीच कब वह अतीत के ख्यालों में डूब गई उसे पता ही न चला।
अभी दो महीने पहले की ही तो बात थी जब पहली दफा उसने ‘प्यार’ शब्द को जाना था और आज यह शब्द अपना अर्थ खो चुका था। उसे अच्छी तरह याद है वह दिन जब पहली बार प्रणय ने उसका ‘प्यार’ शब्द से परिचय कराया था। उस दिन भी बहुत रोई थी वह, शायद खुशी की अधिकता से या अपनी विवशता के पूर्वाभास से। विश्वास नहीं हो रहा था उसे अपने ऊपर, बार-बार शीशे में निहारते हुये उसे अपने चेहरे पर गर्व-मिश्रित संतोष की रेखा चमकती दिख जाती थी क्योंकि यह प्रणय-निवेदन उसे मिला था उसके सबसे प्रिय दोस्त एवं पूरे बैच की जान, हँसमुख, वाचाल, स्मार्ट या यूँ कहें कि सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व की तरफ से। जिसकी वह कुछ हद तक प्रशंसक भी रही है। आज फिर वह रो रही है। क्या प्यार पाने और खोने दोनों ही स्थितियों में स्त्री को सिर्फ रोना ही है ? आखिर क्यों ? क्या प्यारे करने या न करने का एकाधिकार सिर्फ पुरुष के ही पास है ? क्यों इतना कमजोर एवं असहाय हो गई है वह ? अपनी सहेलियों के बीच ‘बोल्ड’ व उन्मुक्त रूप में प्रसिद्ध वह व्यक्तिगत जिन्दगी में इतनी कमजोर होगी, उसने कभी कल्पना भी न की थी।
यूँ प्रणय और उसके बीच सत्र के शुरूआत से ही छोटी-छोटी चिटों व ग्रीटिंग्स का आदान-प्रदान होता रहा था जिसमें एक दूसरे को ‘बेवकूफ’ साबित करना ही जैसे दोनों का एकमात्र उद्देश्य था। साथ ही सबके सामने परस्पर चिढ़ाना, मजाक बनाना तथा खिंचाई करना, रोज का आवश्यक कार्य था लेकिन प्रिया ने इस वाक्युद्ध को कभी भी दोस्ती से ज्यादा कुछ न समझा। इसी दौरान प्रणय का चयन बिजनेस मैनेजमेंट कोर्स के लिये हो गया। चयन की खुशी में आयोजित पार्टी वाली सुबह दिये एक ग्रीटिंग में जब प्रिया ने प्रणय का मित्रता से हटकर कुछ अलग संदेश देखा तो उसे सहसा विश्वास न हुआ। उसने इसे भी प्रणय के मजाक का एक हिस्सा समझा। सारे दिन असमंजस में रहने के बाद जब शाम को वह अपने धड़कते दिल को मुश्किल से सँभाले हुये पार्टी में पहुँची तो सहपाठियों द्वारा लगातार टोकने पर भी वह हमेशा की तरह सहज न हो पाई थी। प्यार का प्रथम अहसास इतना शक्तिशाली होगा कि वह इतनी भीड़ में भी जैसे एकदम अकेली हो जायेगी, उसने कभी सोचा भी न था। उसकी आँखे कुछ नहीं देख पा रही थी, सिवाये प्रणय के और वह ग्रीटिंग में लिखी पंक्तियों का अर्थ प्रणय की आँखों में ढूँढ़ रही थी। जबकि प्रणय था हमेशा की तरह चंचल, वाचाल व उन्मुक्त, कहीं कोई दबाव या तनाव का चिन्ह प्रिया को उसके चेहरे या व्यवहार में नही मिला और यही बात उसे अन्दर ही अन्दर सशंकित भी कर रही थी।
काउन्सलिंग के लिये शहर छोड़ने से पहले प्रणय ने उसे वह पत्र भी अन्ततः दे ही दिया जिसमें स्वभावानुसार उसने स्पष्ट रूप से मन की बातों का खुलासा करते हुये प्यार का इजहार भी किया था। उस लम्बे भावुक पत्र में पहली बार प्रणय ने गंभीरता से हर घटना व हर अनुभव का जिक्र विस्तार से किया था कि किस तरह प्रथम दिन के आकर्षण से शुरू हुआ यह सफर घनिष्ठ दोस्ती से होता हुआ आज प्यार के मुकाम तक आ पहुँचा था और अन्त में अधिकारपूर्वक उसने तीन-चार साल इन्तजार करने को कहा था। ‘इन्तजार’ यही तो वह कार्य था जो उसके लिये लगभग असंभव था कारण मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार की सबसे बड़ी संतान थी वह। यही क्या कम था कि काॅलेज की पढ़ाई के बाद उसे इस प्रोफेशनल कोर्स में दाखिला लेने दिया गया वरना तो शायद उसे भी अब तक ससुराल पहुँचा दिया गया होता। शायद इसमें भी उसके दुर्भाग्य का साथ था, जो उसे आज प्यार के अहसास का अमूल्य तोहफा दे गया था। एक तो सामथ्र्य से ज्यादा दहेज की माँग, दूसरे साधारण रूप रंग की वजह से कितने ही परिवारों द्वारा उसे अस्वीकृत किया गया था। इसके अलावा पैरों के नीचे कोई आर्थिक या व्यवसायिक आधार न होने पर भी परिवार के निरन्तर प्रयासों के बीच किसी तरह से वह अपना कोर्स पूरा कर पा रही थी। इन जटिल परिस्थितियों में प्रणय के ‘इंतजार’ का आग्रह उसके लिये असंभव था हालांकि यह प्रणय-निवेदन उसके लिये रेगिस्तान की बारिश की तरह अमूल्य एवं अप्रत्याशित था। प्रणय ने लौटकर जबाव माँगा था और वह चला गया। इसी बीच प्रिया, वह तो जैसे बाबली हुई जा रही थी; उसकी तो जैसे दुनिया ही बदल गई थी। एक बार सिर्फ एक बार उसके कान प्रणय से प्रत्यक्ष प्यार का इजहार सुनना चाहते थे कि हाँ, वह भी किसी का प्यार है, वह भी किसी की जरूरत है, यह दुनिया उसके अरमानों की भी है, कोई उसे भी चाहता है। कितना खूबसूरत है यह अहसास उसे अब समझ आ रहा था। कई जगह उसके रिश्ते को ठुकराए जाने के बाद वह जिस अग्नि में जल रही थी आज जैसे उस तप्त हृदय को बर्फ सी शीतलता महसूस हो रही थी। आत्मसंतुष्टि का भाव वास्तव में उसे आत्ममुग्धता की ओर लिये जा रहा था जहाँ एक नई दुनियाँ बाँहें फैलाकर उसका इन्तजार कर रही थी। उसे लगा जैसे उसे भी बहुत कुछ कहना है प्रणय से। वे अनुभूतियाँ जिन्हें वह अब महसूस कर रही थी लेकिन कैसे कहे, उसका मीत तो उससे बहुत दूर था। कई दफा आशंका ग्रस्त उसका हृदय रोना ही शुरू कर देता था कि हे भगवान क्या होगा ? क्या यह सच है ? क्या यह संभव है मेरे साथ ? आखिरकार उसकी आशंका उसकी इच्छाओं पर भारी पड़ी और भगवान ने उसका साथ छोड़ दिया। जब प्रणय वापिस लौटा तो प्रिया के द्वारा उस पत्र का जिक्र होने पर उसने यह छोटा सा वाक्य कि, ‘प्रिया आई थिंक, चैप्टर मस्ट बी क्लोज्ड’, कहकर अपनी तरफ से शुरू हुये प्यार को अपनी तरफ से ही खत्म कर दिया। वाह री, पितृसत्तात्मक सत्ता! स्त्री की भावनाओं, प्रतिक्रियाओं, विचारों और राय की कोई आवश्यकता नहीं।
आज वह किस दोराहे पर खड़ी हो गई है। इससे तो अच्छा होता यह प्रेम का इजहार ही न हुआ होता कम से कम जिन्दगी के मायने यूँ तो न बदले होते। सहज जिन्दगी अब कितनी असहज हो गई थी, वही कालेज, वही मित्र-मंडली सब कुछ वही था लेकिन उसके लिये सब कुछ बेरौनक हो गया था। प्रणय के मुताबिक इस प्यार का अहसास उसे कालेज में प्रवेश के प्रथम दिन के साथ हुआ जिसे उसने हर रोज जिया था। बेचारी प्रिया, पहले तो उसे इसका आभास ही न हुआ और जब हुआ तो ‘चैप्टर’ बंद करने के फरमान के साथ। ‘क्या स्त्री की नियति सिर्फ पुरुष की मर्जी पर है ? प्यार करना या न करना इसके सर्वाधिकार सिर्फ पुरुषों के साथ ही सुरक्षित हैं ? क्या प्यार का ‘चैप्टर’ खोलना और बंद करना उन्हीं की इच्छा पर निर्भर है ?’ जितना विद्रोह था उसके मन में उतनी ही आहत भी थी वह। शायद ‘सहना’ ही नारी की नियति है। सहिष्णुता जो स्त्री का सबसे बड़ा गुण है आज उसे कमजोर बना रहा था। आखिर किसने दिया पुरुष को यह अधिकार कि जिन्दगी का सबसे महत्वपूर्ण ‘चैप्टर’ उसकी मर्जी के मुताबिक खुले और बंद हो ? सोचते-सोचते कब उसकी आँख लग गई पता ही न चला। जब आँख खुली तो देखा रात खामोशी का आँचल ओढ़कर अपने पथ पर अडिगता से बढ़ती जा रही थी। सितारों के साथ चारों ओर सन्नाटा-खामोशी सी छा गयी थी। वह सोच रही थी यह खामोश, उदास समां कितना अपना सा लगता है ठीक उसकी जिन्दगी की तरह-दर्द, उदासी, खामोशी और वीरानियों से भरा। इंसान भावनाओं से क्यों हार जाता है ...... ? किसलिये टूट जाता है ?
‘नहीं यह मेरी नियति नहीं हो सकती, मैं इतनी कमजोर नहीं जो जिन्दगी के इस नाजुक क्षण में अपने को यूँ बिखरने दूँ’, अन्तर्मन से उठी इस हल्की प्रतिरोधात्मक आवाज को उसने सुनने का प्रयास किया। ‘आखिर कब तक पुरुष-प्रधान इस समाज में स्त्री खुद की बागडोर उनके हाथों में सौंपकर शोषित होती रहेगी ? कभी दहेज की माँग पूरी न होने पर रिश्ता ठुकराए जाने के रूप में और कभी मानसिक व भावनात्मक रूप से कमजोर बनाकर, कब तक .....? नहीं, कम से कम मुझे तो नहीं शिकार होना है इस व्यवस्था का।’ दृढ़-निश्चय के साथ उसने सिर को झटका दिया। ‘भावनाओं को परे ढकेलना ही होगा उसे आज, अभी, इस वक्त, वरना कल तो देर हो जायेगी।’ सोचते हुये उसने सुदूर आसमान में फिर से ताका तो वही अँधेरा अब निश्छल चाँदनी में तब्दील हो चुका था। रात की बोझिलता व नीरवता अब एक खास स्निग्धता व कोमलता में बदल चुकी थी। यह प्रकृति का व्यक्ति के साथ अद्भुत संयोजन था या उसके बदले विचारों का प्रभाव। कुछ तो था जो उसे अब महसूस हो रहा था। ठीक उसके सामने का चमचमाता हुआ ध्रुव तारा-अटल, स्थिर। उसके चेहरे पर खुद-व-खुद हल्की मुस्कराहट तैर गयी और उसने अपने बोझिल दिल को बोझमुक्त, तनावमुक्त होते महसूस किया। एक विशिष्ट शान्ति के साथ वह सोने चली गई।
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विभागाध्यक्ष अंग्रेजी
दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय
उरई (जालौन)

04 मार्च 2009

कृष्ण कुमार यादव की कहानी - शरीफ बदमाश

खट..खट..खट.. दरवाजा खोलो, पुलिस। अचानक हास्टल के कमरा नम्बर बत्तीस पर रात्रि में पुलिस ने छापा मार दिया था। मुखबिर द्वारा पुलिस को सूचना मिली थी कि उस कमरे में शहर के शातिर बदमाश का एक शागिर्द छुपा हुआ है। गहरी निद्रा में तल्लीन राकेश ने कमरे का दरवाजा खोला तो एक पुलिस वाले ने उसकी कनपटी पर रिवाल्वर सटा दी। हिलना नहीं अपनी जगह से.. हैण्ड्स अप। तभी दरोगा जी की कड़कड़ाती आवाज सुनाई दी- 'एक-एक चीज की तलाशी लो।' 'पर सर! मैंने किया क्या है? वाह बच्चू! कितने भोले हो, अभी पता चलता है तुमने क्या किया है, लेकिन सर! मैं तो विश्वविद्यालय में पढ़ने वाला साधारण छात्र हूँ, कहें तो अपना परिचय-पत्र भी दिखा दूँ। दरोगा ने तमतमाती आवाज में कहा- 'हम तुम्हारा भाषण सुनने के लिए यहाँ नहीं आये हैं और न ही विश्वविद्यालय का परिचय-पत्र इस बात का प्रतीक है कि तुम बहुत शरीफ हो। आजकल विश्वविद्यालय एवं कालेजों में पढ़ने वाले छात्र रातों-रात अमीर बनने के लिए बदमाशों की शागिर्द में जाते हैं और फिर किसी हास्टल में दाखिला लेकर अपने को पढ़ाकू छात्र साबित करने की कोशिश करते हैं।'
सर! इसके कमरे से एक मोबाइल फोन, एक हीरो-होण्डा मोटरसाइकिल के कागजात एवं कुछ ग्रीटिंग्स कार्ड व पत्र मिले हैं जो किसी लड़की ने इसे दिए हैं। उस सर्द सी जमा देने वाली चिचचिलाती ठण्ड में दरोगा ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ राकेश के गाल पर मारा, जिसकी गूँज रात्रि में हास्टल से बाहर तक सुनायी दी। राकेश की आँखों में आँसू आ गए थे। वह बार-बार अपनी बेगुनाही का हवाला दे रहा था कि तभी एक सिपाही की व्यंग्य भरी अवाज उसके कानों में पड़ी-सर! ये तो कवितायें भी लिखता है। फिर अपनी फूहड़ आवाज में जोर-जोर से राकेश द्वारा लिखी गई कविताओं में से एक का पाठ करने लगा। च..च..च.. कितनी बढ़िया कविता लिख लेता है यह। चलो, अब रात को थाने में सन्नाटा तो नहीं पसरेगा, इस भाँड़ की कविताओं का रस लिया जाएगा... पर हाँ तू ये तो बता कि अपनी कविताओं में तुमने व्यवस्था की टांग ही खींची है या कुछ अपनी उस ग्रीटिंग कार्ड वाली गर्ल-फ्रैण्ड के बारे में भी लिखा है कि यौवनावस्था में उभरते हुए उसके उन्नत उरोज, सांसों की धड़कनें, पुष्ट नितम्ब, पतली कमर, मचलकर चलना...... बिहैव योर सेल्फ! राकेश की तमतमाती आवाज गूँज उठी थी- 'आप को किसी को इस तरह जलील करने का कोई अधिकार नहीं है, मैं कोई चोर-उचक्का, बदमाश या लड़कियों का दलाल नहीं हूँ कि आप मुझे इस तरह प्रताड़ित कर रहे हैं। मैं आपके सीनियर्स से आपकी शिकायत करूँगा। कोई भी कानून इस तरह किसी को परेशान करने की इजाजत नहीं देता।' दरोगा ने पलटकर फिर एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसे मारा और काबू से बाहर होते हुये बोला- 'पुलिस वाले को धौंस देता है कानून की। चल थाने में तुझे हम वहाँ कानून भी पढ़ायेंगे और तेरी कविताओं का नशा भी उतार देंगे। इतनी धाराएं लगाकर जेल में ठूंसूंगा कि मेरा नाम भी दरोगा.... नहीं।'
अगले दिन के अखबारों में प्रमुखता से यह खबर छपी कि- 'अमुक गैंग का एक शातिर बदमाश पुलिस ने अपनी सक्रियता से धर दबोचा। अपने को विश्वविद्यालय का छात्र बताने वाला उक्त बदमाश काल-गर्ल्स रैकेट का शहर में सूत्रधार था और उसके कमरे से तमाम आपत्तिजनक वस्तुयें बरामद हुयी है। यह भी संज्ञान में आया है कि चंद पैसों के लालच में आरोपी बदमाश बड़े-बड़े होटलों एवं अमीर लोगों को जवान लड़कियाँ सप्लाई करता था और प्राप्त पैसे से गुलछर्रे उड़ाता था। सौदेबाजी में प्रयुक्त मोबाइल फोन एवं गर्ल्स हास्टल के आस-पास अक्सर देखी जाने वाली हीरो होण्डा मोटरसाइकिल भी पुलिस ने उस बदमाश के पास से प्राप्त की है।'
राकेश एक मध्यवर्गीय संभ्रान्त परिवार से ताल्लुक रखने वाला एवं डाक्टर-दम्पति का इकलौता बेटा था। बेटे को भी डाक्टर बनाने की खातिर माता-पिता ने उसका दाखिला एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में करा दिया, जहाँ बी. एस. सी. द्वितीय वर्ष में अध्ययनरत् होने के साथ ही उसने कोचिंग क्लासेज भी ज्वाइन कर ली थीं। आकर्षक व्यक्तित्व का धनी राकेश अपनी विनोदप्रियता, हाजिर जवाबी एवं मधुर वाणी के चलते कक्षा का केन्द्र-बिन्दु बन गया था। इकलौता बेटा होने के कारण माँ-बाप ने उसे मोटरसाइकिल एवं मोबाइल फोन जैसी सारी सुविधायें दे रखी थीं। खुले दिलो-दिमाग वाले राकेश से उसके क्लास की लड़कियाँ भी खुल कर हँसी- मजाक कर लेतीं और उसका शायरना एवं कवि अंदाज तो हर समारोह की जान बन गया था। पर ये सब बातें कक्षा के कुछ छात्रों को अखरने लगी थीं। वे राकेश की जगह अपने को देखना चाहते, पर सफलता हाथ नहीं लगी। राकेश का विनोदी स्वभाव, लड़कियों से खुल कर बातें करना एवं हर समारोह में आगे बढ़कर अपना योगदान देना उन छात्रों को अन्दर ही अन्दर कुढ़ने को मजबूर कर देता था और आखिरकार एक दिन हास्टल में बैठकर उन सभी ने राकेश का कैरियर बर्बाद करने की योजना बना डाली। इस काम में उनका साथ एक छात्र नेता ने दिया जो कि पुलिस हेतु मुखबिरी भी करता था। फिर क्या था रातों-रात पुलिस व कुछ छात्रों की मिलीभगत ने साजिश रचकर एक शरीफ छात्र को काल-गल्र्स रैकेट का सूत्रधार घोषित कर दिया। यहाँ तक कि अखबारों ने भी चटकारे ले-लेकर उसके चरित्र पर कीचड़ उछाला।
राकेश के मम्मी-पापा ने दौड़-धूपकर किसी प्रकार उसकी जमानत करवायी और उसे फिर से अपने कैरियर की ओर उन्मुख करने की चेष्टा की, पर सब बेकार। अदालतों के चक्कर काटते-काटते, कानूनी दांव-पेचों से रोज उलझते एवं पड़ोसियों व रिश्तेदारों की उपेक्षा व व्यंग्य भरी निगाहों ने राकेश के अन्तर्मन में गहरी टीस भर दी। व्यवस्था की विसंगतियों एवं लम्बी कानूनी प्रक्रियाओं ने उसे तोड़ कर रख दिया। उसका पक्ष जानने की बजाय समाज ने उसे ही कटघरे में खड़ा कर दिया। अपने ही कमरे में कैद वह पन्नों पर कुछ लिखता और फिर उन्हें फाड़ कर फेंक देता यहाँ तक कि अपने मम्मी-पापा से भी ज्यादा बातें नहीं करता। मम्मी-पापा ने उसे शादी करने की सलाह दी तो उसे भी उसने ठुकरा दिया।
आखिरकार एक लम्बे समय बाद वह दिन भी आया जबकि राकेश को अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया पर इतनी जलालत के बाद ये सब चीजें उसके लिए बेमानी हो गई थीं। जिस दिन अदालत ने राकेश को सारे आरोपों से मुक्त कर बाइज्जत बरी कर दिया, उस दिन उसके मम्मी-पापा काफी खुश हुए थे। बहुत दिन बाद उनके मायूस चेहरे पर खुशी के भाव दिखे। उस दिन राकेश ने भी रात्रि का भोजन उनके साथ लिया। मम्मी-पापा को भी लगा कि अब राकेश एक नई जिन्दगी की शुरूआत कर सकेगा, पर शायद होनी को कुछ और ही मंजूर था।
सुबह जब राकेश काफी देर तक नहीं जगा तो किसी अनहोनी की आशंका से मम्मी-पापा ने उसके कमरे का दरवाजा खोला पर सामने का नजारा देखते ही चीख पड़े। सामने राकेश की लाश पड़ी हुयी थी और बगल में जहर की एक खुली शीशी रखी हुई थी। उनकी चीख सुनकर सारे पड़ोसी इकट्ठा हो गये और किसी ने पुलिस को भी इत्तला दे दी। पुलिस आकर लाश के पंचनामे में जुट गई। पुलिस को राकेश के तकिये के नीचे एक कागज मिला था, जिस पर उसने लिखा था कि- 'अदालत ने मुझे दोषमुक्त साबित करके तो अपने कर्तव्य की इत्तिला कर ली, पर मेरे उन सुनहरे दिनों एवं मेरे परिवार वालों की मानसिक प्रताड़ना का क्या कोई अदालत न्याय कर पायेगी? व्यवस्था की सनक ने एक शरीफ छात्र को गुनाहगार घोषित कर दिया.... यहाँ तक मीडिया ने भी बिना कुछ जाने-समझे चटकारे लगा-लगाकर मेरे चरित्र पर तोहमत लगायी। अपने रिश्तेदारों एवम् पड़ोसियों की उपेक्षा व व्यंग्य भरी निगाहों को मैं कैसे भुला सकता हूँ, क्या इन जलालतों का कोई अदालत न्याय कर पायेगी? मैं अभी तक सिर्फ इसलिए जिन्दा था कि अपनी मम्मी-पापा को समाज में निगाहें ऊँची करके चलते देख सकूँ। मैं उनके ऊपर कोई पाप या गुनाह की गठरी छोड़कर नहीं मरना चाहता था। मम्मी-पापा! हो सके तो मुझे माफ कर देना पर मैं ऐसी विसंगतिपूर्ण व्यवस्था में और नहीं जीना चाहता, जहाँ कि मेरा दम घुटता हो। मैंने अपनी जिन्दगी के लम्हे जी लिए और अब भारमुक्त होकर स्वेच्छा से मौत को गले लगा रहा हूँ... अलविदा।'
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कृष्ण कुमार यादव
भारतीय डाक सेवा,
वरिष्ठ डाक अधीक्षक,
कानपुर मण्डल, कानपुर-208001

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