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27 अप्रैल 2010

हितेश कुमार शर्मा की कविता --- याद पुरानी

बचपन की फिर याद पुरानी आई है।
फिर से वह बरसात सुहानी आई है।

कागज की जब नाव बनाया करते थे।
पानी में फिर उसे तिराया करते थे।
डूब न जाये कहीं यही शंका लेकर-
उसके संग-संग दौड़ जाया करते थे।

भीग भागकर जब लौटा करते थे घर,
माँ की पड़ती डाँट हँसानी आई है।

कभी खाँसते, कभी छींकते थे लेकिन।
नालों में हम नाव डालते थे लेकिन।
कभी फँसाकर कील, बाँध डोरी ऊँची-
राह चली टोपियाँ फाँसते थे लेकिन।

बुरा मानता था तब कोई कभी नहीं।
वही शरारत याद लुभानी आई है।

वह बरसाती मौसम की मोहक यादें।
बूँदों में जाने की माँ से फरियादें।
माँ की झिड़की पर मित्रों का आवाहन-
चिन्ता रहती, घर बाहर कैसे साधें।

आँख मिचौली जो खेली जीवन में।
याद वही हमको मरजानी आई है।

गर्म पकोड़ी खाते थे हम अपने घर।
और चाय पीने जाते थे उसके घर।
वह जो नन्ही मुन्नी प्यारी गुड़िया सी-
चुपके-चुपके मिलती थी घर के बाहर।

हँसती थी तो सारा आलम हँसता था।
याद वही फिर हँसी बिरानी आई है।
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हितेश कुमार शर्मा,
गणपति भवन,
सिविल लाइन्स, बिजनौर 246701

26 अप्रैल 2010

हितेश कुमार शर्मा की कविता - मंहगाई

मंहगाई
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मंहगाई कुछ और बढ़ेगी, लगता मुझको यार हितेश,
अभी सियासत और लड़ेगी मंहगाई पर यार हितेश।

कोरे भाषण या आश्वासन कमी नहीं कर पायेंगे,
जाने कितने घर निगलेगी यह मंहगाई यार हितेश।

लोकसभा में, राज्यसभा में भाषण दोषारोपण होंगे,
पर मंहगाई कम करने पर होगा नहीं विचार हितेश।

धरने और प्रदर्शन होंगे, हड़तालें और जाम लगेंगे,
इन्कलाब का शोर मचेगा मंहगाई पर यार हितेश।

ऊँचे नेता मंत्री अफसर सबके भाषण खूब छपेंगे,
पर गरीब का नहीं लिखेगा दुख कोई अखबार हितेश।

अपना सबकुछ देकर तू किस-किस को देगा राशन,
अनगिन चूल्हे बुझा चुकी है यह मंहगाई यार हितेश।

मिली न जुम्मन को मजदूरी फाका गुजरा हफ्तों से,
गंगा जी में डूब के उसने जान गँवाई यार हितेश।

सरकारी सेवक का वेतन बढ़ा दोगुना चौगुना,
मजदूरों की मजदूरी में बढ़ी न पाई यार हितेश।

हुये करोड़ों के घोटाले मंत्री मालामाल हुये,
उनको कभी न छू पायेगी यह मंहगाई यार हितेश।

टूटी हुईं चारपाई भी जिनके घर पर नहीं मिली,
सांसद और विधायक निधि ने उन्हें दिलाई कार हितेश।

मंत्री जी बनने से पहले कुल जमीन थी बीघा तीन,
सौ बीघे के कई फार्म हैं उनके अब सरकार हितेश।

चुपकर वरना कल को तेरा नहीं मिलेगा पता कहीं,
सत्ताधीशों के होते हैं हत्यारे किरदार हितेश।
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हितेश कुमार शर्मा,
गणपति भवन, सिविल लाइन्स,
बिजनौर - 246701 (उ0प्र0)

28 फ़रवरी 2010

हितेश कुमार शर्मा की कविता - होली का त्यौहार सलोना

मौसम मादक हुआ हवा महकी महकी है,
दूर आम की डाली पर कोयल चहकी है।
होली का आगमन हुआ है मन आँगन में,
अंग उमंग तरंग साँस बहकी बहकी है।

नभ में इन्द्रधनुष की सतरंगी चूनर है,
धरती के माथे पर फूलों की झूमर है।
गली मोहल्ले में रंगों की बरसात हो रही,
रंगों से बच इधर उधर जाना दूभर है।

गीत गा रही हैं सुहागिनें बौराई सी,
कहीं-कहीं हैं आँख मिचौली शरमाई सी।
पीकर भंग अनंग हुए हैं कुँवर कन्हाई,
उजली-उजली धूप है अलसाई सी।

होली के दिन शिकवे गिले नहीं होते हैं,
कुछ करते हैं नशा और पीकर सोते हैं।
रंगों में उल्लासित तरंगित मन मतवारे,
सद्बुद्धि सज्जन तो होश नहीं खोते हैं।

परिजन पुरजन सबके हाथ गुलाल सने हैं,
टेसू का रंग भर पिचकारी सभी तने हैं।
हाथ और मुँह काले-पीले रंग-बिरंगे,
मस्ती में कुछ झूम रहे कुछ बने-ठने हैं।

बेगाने तो दूर-दूर से ताक रहे हैं,
केवल अपने ही अपनापन आँक रहे हैं।
चहक रहे हैं कुछ तो कुछ बिलकुल गुमसुम हैं,
खड़े नयन में इक दूजे के झाँक रहे हैं।

रंग-बिरंगी मतवारी होली आयी है,
बच्चे बूढ़े सबके ही मन को भायी है।
सबको शुभ हो होली का त्यौहार सलोना,
यही भावना प्रिय सुकामना मन भायी है।

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हितेश कुमार शर्मा
गणपति भवन, सिविल लाइन्स,
बिजनौर - 246701 (उ0प्र0)

22 फ़रवरी 2010

हितेश कुमार शर्मा की कविता - वन्दे मातरम्

किसने लिखा है भाल पर भारत के वन्दे मातरम्,
यह कौन उषाकाल में गाता है वन्दे मातरम्।

हम हैं अभी पहने हुए अंग्रेजियत की बेड़ियाँ,
बस व्यंग्य सा लगता है हमको मित्र वन्दे मातरम्।

हो दासता से मुक्त अपनी भारती माँ भारती,
होगा तभी तो सत्य शाश्वत घोष वन्दे मातरम्।

इस देश में अब देशहित की बात होती ही नहीं,
बस चल रहा है राम भरोसे भारत वन्दे मातरम्।

है धार्मिक उन्माद की ऐसी पराकाष्ठा यहाँ,
कुछ लोग कहने को नहीं तैयार वन्दे मातरम्।

न्यायालयों, कार्यालयों में हैं सहस्त्रों रिक्तियाँ,
भरता नहीं कोई उन्हें निस्वार्थ वन्दे मातरम्।

आत्मा हमारी मर गई परमात्मा भी खो गया,
हावी है सुविधा शुल्क सिद्धि स्वार्थ वन्दे मातरम्।

हिन्दी है हिन्दुस्तान में परित्यक्त पत्नी की तरह,
अंग्रेजियत है प्रेमिका सत्ता की वन्दे मातरम्।

जो देश हम पर कर रहा आतंकियाँ हमले हितेश,
हम साथ उसके खेलते क्रिकेट वन्दे मातरम्।

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हितेश कुमार शर्मा
गणपति काम्पलैक्स, सिविल लाइन्स,
बिजनौर, पिन-246701 (उ0प्र0)