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12 जनवरी 2011

नीता पोरवाल की कविता --- ऐसा क्यूँ है...

आज
फिर
भोर की लाली
मंद क्यूँ है ?


क्षितिज पर
सूरज
भी चेहरा
छुपाता क्यूँ है ?

पंछियों का
कलरव भी
सहमा - सहमा सा
क्यूँ है ?

शायद
कुछ लाचार बूढों ने
आसमान तले ठिठुर कर
दम तोड़ा होगा कहीं

शायद
कुछ नन्हे कन्धों पर
आ गया होगा फिर
कबाड़ बीनने का बोरा कहीं

शायद
कोई पगली
शिकार हुई होगी
फिर किसी
दरिंदगी की कहीं

हाँ
शायद
इसी लिए
प्रकृति भी शर्मिन्दा
बैठी होगी कहीं ॥

29 दिसंबर 2010

नीता पोरवाल की कविता -- ये ख्वाइश क्यूँ हैं....

ये ख्वाइश क्यूँ हैं....
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आज फिर ये वावरी पलके नम क्यू है
सावन की बदरी सी झरती
नन्ही बूंदों को चुन - चुन के हथेली पे सजाये कोई
ये ख्वाइश क्यूँ है

तपती- दुपहरी वीरान- राहें
बेकल पंछी से भटकते तन को छाँव बन के आये कोई
ये ख्वाइश क्यूँ है

तेज़ हवाएं तूफानी मौजें
भंवर में डोलती कश्ती से मन को साहिल तक ले जाये कोई
ये ख्वाइश क्यूँ है

महसूस की उनकी मौजूदगी हर ज़र्रे में हमने
अब मुझे भी मेरे होने का अहसास दिलाये कोई
ये ख्वाइश क्यूँ है

गर वादा किया तो साथ निभाया भी हमने
दो कदम मेरे भी साथ चल कर दिखाए कोई
ये ख्वाइश क्यूँ है

तेरी यादों के चरागों को हर पल रोशन रखा हमने
अब मेरे अंधियारे दिल में भी चराग जलाए कोई
ये ख्वाइश क्यूँ है

तेरी बेरुखी को भी ग़ज़ल सा गुनगुनाया हम ने
अब नीता के बेसुरे गीत भी गुनगुनाये कोई
ये ख्वाइश क्यूँ है

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नीता पोरवाल

27 दिसंबर 2010

नीता पोरवाल की काव्य-रचना --- दिल करता है

कुछ देखना जो चाहूँ तो धुंधला जाती है आँखे
आज क्यूँ बहुत ..हाँ बहुत रोने को दिल करता है

कुछ लिखना जो चाहूँ तो अलफ़ाज़ नहीं मिलते
आसुओं को ही जुबान बनाने को दिल करता है

हर पल बढ़ती ये बेचैनी....ये दीवानगी.. ये पागलपन
आज किसी की आरजू में फना हो जाने को दिल करता है

वो न समझे थे ना समझेंगे खामोशियों की जुबान
शायद कभी समझेंगे ये झूठा गुमान रखने को दिल करता है

लम्हा -लम्हा , हर लम्हा साथ तो निभाया है इन आसुओं ने
तो अब इन आसुओं को ही हमसाज़ बनाने को दिल करता है

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नीता पोरवाल