फिर
भोर की लाली
मंद क्यूँ है ?
क्षितिज पर
सूरज
भी चेहरा
छुपाता क्यूँ है ?
पंछियों का
कलरव भी
सहमा - सहमा सा
सहमा - सहमा सा
क्यूँ है ?
शायद
कुछ लाचार बूढों ने
आसमान तले ठिठुर कर
दम तोड़ा होगा कहीं
शायद
कुछ नन्हे कन्धों पर
आ गया होगा फिर
कबाड़ बीनने का बोरा कहीं
शायद
कोई पगली
शिकार हुई होगी
फिर किसी
दरिंदगी की कहीं
हाँ
शायद
इसी लिए
प्रकृति भी शर्मिन्दा
बैठी होगी कहीं ॥