30 नवंबर 2009

कृष्ण दयाल सक्सेना 'निस्पृह ' का गीत

निभना ही सीखा जीवन में

जाने कितनी बाधाओं को , मैंने शशि- सम हृदय लगाया ;
कष्ट-भार से बोझिल मन को , विचलित होने पर समझाया ;
भाँति शलभ की, दुःख की लौ पर ,मिटना ही सीखा जीवन में ;
निभना ही सीखा .......................................................... । १।
शूल-सुमन दोनों को एक सम ,इस जीवन में प्यार किया है ;
शूल -मूल्य लेकर मानव से ,पुष्पों का व्यापार किया है ;
बन चकोर शशि हित ,शोलों को, चुगना ही सिखा जीवन में ;
निभना ही सीखा ...............................................................। 2।
मंद पवन की शीतल सिहरन, को मैंने स्वीकार किया है ;
जब कि चुभन से भी शूलों की ,हँस कर ही अभिसार किया है ;
आंधी और तूफानों में भी , बढ़ना ही सीखा जीवन में ;
निभना ही सीखा ........................................................ । ३।
मृग-चितवन की मनहर छवि का,मंजुल स्वर में गान किया है;
जब कि शौर्य को भी मृगेंद्र के ,समुचित ही सम्मान दिया है ;
कोमल -सबल सभी से मिल कर, हँसना ही सीखा जीवन में ;
निभना ही सीखा ........................................................ । ४ ।
जब भी जिसको वचन दिया जो ,उसको पूरी तौर निभाया ;
हँस कर ही टाला है मग में ,कंकड़ -पत्थर , जो भी आया ;
कष्ट पड़े कितने भी ,प्रण पर टिकना ही सीखा जीवन में ;
निभना ही सीखा........................................................ ।५ ।

बकरीद -निरीह जानवरों के कत्लेआम का विकल्प सोचने की जरूरत

ईद -उल -जुहा उर्फ़ बकरीद बीत गयी । कुर्बानी के नाम पर लाखों निरीह बकरे कुर्बान हो गए । आज तक मै यह नहीं समझ पाया कि इन बेजुबानों को मार कर व पका कर खाने से कैसी धार्मिक संतुष्टि मिलती है । मैंने अपने कई मुस्लिम मित्रों से इस बावत पूछा ,पर सभी का रटा -रटाया सा जबाब था कि यह कुर्बानी प्रतीकात्मक है और एक रिवाज के रूप में सदियों से स्थापित है अतः इस पर तर्क की ज्यादा गुंजायस नहीं है । इक्कीसवीं सदी में ऐसी तर्क आश्चर्यजनक भले ही लगते हों पर धार्मिक अंधविश्वासों कि जड़े कितनी गहरी होती है,यह भी स्पष्ट होता है।
अखबारों में ईद-उल-जुहा के महत्त्व के बारे में कई इस्लामिक विशेषज्ञों के विचार भी पढने को मिले । इस पर्व को आध्यात्मिक उन्नयन को प्रेरित करने वाला बताया गयाक़ुरबानी को अपनी प्यारी से प्यारी चीज को अल्लाह के नाम पर न्योछावर करने की प्रथा कहा गयाकुछ लोगों ने यह भी कहा कि कुर्बानी बुरी इच्छाओं एवं आदतों के परित्याग का प्रतीक है । पर निरीह जानवर को काट कर ऐसे लक्ष्य कैसे प्राप्त किये जा सकते हैं ?
मुस्लिम समाज में अब शिक्षा का व्यापक प्रसार हो चुका हैवहां पर भी जागरूक संवेदनशील लोगों कि एक अच्छीखासी जमात हैऐसी वीभत्स और सारहीन प्रथाओं के विरुद्ध इस समाज में भी आवाज उठनी चाहिये
बकरीद पर इस बार बकरे बहुत मँहगे बिके । कुछ बकरे तो कार से भी ज्यादा मँहगे थे । पच्चीस लाख तक का बकरा बिका । मैंने अपने एक परिचित ,जो घर से बाहर सर्विस पर नियुक्त हैं , को बकरीद पर मुबारकबाद के लिए फोन किया । उनकी बच्ची ने फोन रिसीव किया । मैंने पूछा कि कैसी बकरीद मनाई? उसने कहा कि इस बार कुर्बानी नहीं हो पायी क्यांकि पापा ने अपने एक दोस्त को कुर्बानी के लिए बकरा खरीदने के लिए पैसे दिये थे ,पर बकरा इतना मँहगा था कि ख़रीदा नहीं जा सका । मैने कहा ,"फ़िर क्या किया ?" उसने कहा कि जो पैसे बकरा खरीदने को निकाले थे , वह गरीबों में दान कार देंगें । मुझे लगा कि कुर्बानी के स्थान पर यदि यह विकल्प अपनाने पर मुस्लिम समाज विचार करे तो केवल लाखों बेजुबान जानवरों के खून से हाथ रँगने से बचा जा सकता है वरन इस पर्व के मूल में निहित 'मोह -माया का परित्याग क़र आध्यात्मिक विकास की ओर अग्रसर होना ' भावना को सही अर्थों में साकार किया जा सकता है।