27 नवंबर 2009

रामनिवास की गज़ल - वतन के नाम से जो है

गज़ल:-वतन के नाम से जो है
वतन के नाम से जो है वही सच्ची जवानी है
मोहब्बत है जुड़ी जिससे वही सच्ची कहानी है !!

वतन के नाम पर हँसकर कभी कुर्बान जो होती
वही असली जवानी है वही सच्ची जवानी है !!

जिसके काम से खुशबू सदा अर्पण की आती है
हमें उसकी ही खुशबू से सदा महफ़िल सजानी है!!

खाकर अन्न भारत का करे गुणगान दुश्मन का
वही तो देश द्रोही है उसे छोड़ना नादानी है!!
करता नाम जो रोशन सदा दीपक सा जल कर के
वही तन खूबसूरत है वही चेहरा नूरानी है !!

जो दूसरो के दुःख को भी दुःख अपना समझता है
वही सुलझा हुआ मानव वही ऋषियों सा ज्ञानी है !!

हमारा 'इंडिया' जीवन समर्पित मातृभूमि को
सदा इसके ही चरणों में हमें मस्तक झुकानी है!!

ग़ज़लकार -

राम निवास 'इंडिया'
गीतकार,नई दिल्ली

हिंदी सबके मन बसी --संजीव'सलिल'

हिंदी सबके मन बसी

आचार्य संजीव'सलिल', संपादक दिव्य नर्मदा

हिंदी भारत भूमि के, जन-गण को वरदान.
हिंदी से ही हिंद का, संभव है उत्थान..

संस्कृत की पौत्री प्रखर, प्राकृत-पुत्री शिष्ट.
उर्दू की प्रेमिल बहिन, हिंदी परम विशिष्ट..

हिंदी आटा माढिए, उर्दू मोयन डाल.
'सलिल' संस्कृत तेल ले, पूड़ी बने कमाल..

ईंट बने सब बोलियाँ, गारा भाषा नम्य.
भवन भव्य है हिंद का, हिंदी ह्रदय प्रणम्य.

संस्कृत पाली प्राकृत, हिंदी उर्दू संग.
हर भाषा-बोली लगे, भव्य लिए निज रंग..

सब भाषाएँ-बोलियाँ, सरस्वती के रूप.
स्नेह पले, साहित्य हो, सार्थक सरस अनूप..

भाषा-बोली श्रेष्ठ हर, त्याज्य न कोई हेय.
सबसे सबका स्नेह ही, हो लेखन का ध्येय..

उपवन में कलरव करें, पंछी नित्य अनेक.
भाषाएँ अगणित रखें, मन में नेह-विवेक..

भाषा बोले कोई भी. किन्तु बोलिए शुद्ध.
दिल से दिल तक जा सके, बनकर दूत प्रबुद्ध..