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लेखक - डॉ० वीरेन्द्र सिंह यादव का परिचय यहाँ देखें
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अध्याय-3 = पर्यायवरण प्रदूषण के विविध आयाम
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पृथ्वी के अन्दर मानव द्वारा जब खनन का कार्य प्रारम्भ किया गया तब उसे नहीं मालूम था कि वह ऐसा कार्य कर रहा है जो उसके अपने लिए भी घातक सिद्ध हो सकता है अर्थात् यह मानव का पर्यावरण प्रदूषण के प्रति छेड़छाड़ का प्रथम प्रयास था, जिससे कि पर्यावरण को प्रदूषित करने की प्रक्रिया आरम्भ हुयी थी। तत्पश्चात मानव ने जानवरों से रक्षा एवं अपने भोजन को प्राप्त करने के लिए पत्थरों को तोड़कर हथियार बनाये तो यह भी प्रकृति से छेड़छाड़ का दूसरा प्रयास हुआ। इसके साथ ही मानव ने जैसे ही आग जलाने की कला सीखी तो वायु प्रदूषण प्रारम्भ हो गया। खाद्य आवश्यकताओं व आवास की तलाश में जब उसने वनस्पतियों का दोहन शुरू किया तो, प्राकृतिक संतुलन गड़बड़ाने लगा। खाने की वस्तुओं की तलाश में मानव ने लकड़ी का जैसे ही जलाना शुरू किया तो वायुमंडल असुरक्षित हो गया और वनों के लगातार कटने से सब कुछ अव्यवस्थित सा हो गया। भौतिकता की दौड़ एवं तकनीकी तथा प्रौद्योगिकी के विकास ने विभिन्न तरह के प्रदूषणों को जन्म दिया। बड़े उद्योगों के बढ़ने से उनसे निकलने वाले धुंए से वायुमंडल प्रदूषित तो हुआ ही इसके साथ ही उससे निकलने वाले कचरे से मिट्टी तथा उत्सर्जित जल से जल संसाधनों पर खतरा मंडराने लगा। इतना ही नहीं नित नूतन औद्योगिक इकाइयों के शुरू होने से उससे निकलने वाले इलैक्ट्रानिक कचरे से नाभिकीय प्रदूषण, समुद्री प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण व वायु प्रदूषण (जहरीली गैसें, धुंए व उड़ी राख) तेजी से अपनी विनाश लीला फैला रहे हैं और अब ऐसा लगने लगा है कि अचानक बाढ़, सूखा, मृदा अपरदन, अम्ल वर्षा जैसी प्राकृतिक आपदाएं बढ़ने के साथ ही वर्तमान में मानवता भी सुरक्षित नहीं प्रतीत हो रही है।
प्रदूषण को अंग्रेजी शब्द Pollution कहा जाता है जो लैटिन भाषा के Polluere शब्द से बना है। प्रदूषण का शाब्दिक अर्थ हुआ प्रकृष्ट रूप से दूषित करने की क्रिया। व्यापक अर्थों में इसकी चर्चा करें तो इसे विनाश अथवा विध्वंश अथवा नाश होने के अर्थ से जोड़ा गया है वहीं अंग्रेजी का पल्यूशन शब्द पल्यूट क्रिया से बना है जिसका बेवस्टर (Webster) शब्दकोश में गंदा करना (To make or render unclean) अपवित्र करना (To define) दूषित करना (Desecrate), अशुद्ध करना (Profane) मिलता है। ई. पी. ओडम के अनुसार - ‘हवा, जल और मृदा के भौतिक, रसायनिक, जैविक गुणों के ऐसे अवांछनीय परिणामों से जिससे मनुष्य स्वयं को तथा सम्पूर्ण परिवेश प्राकृतिक, जैविक और सांस्कृतिक तत्वों को हानि पहुँचाता है, प्रदूषण कहते हैं। डिक्सन के अनुसार ‘वे सभी सचेतन तथा अचेतन मानवीय तथा पालतू पशुओं की क्रियायें एवं उनके परिणाम जो मानव को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लघुकाल या दीर्घकाल में उनके पर्यावरण आनन्द तथा उससे पूर्ण लाभ प्राप्त करने की योग्यता से वंचित करती है। प्रदूषण कहलाती है। राथम हैरी ने पर्यावरण प्रदूषण को इस तरह से परिभाषित किया है वह यह कि पर्यावरण, प्रदूषण, जो मानवीय समस्याओं को प्रकृति के ताने-वाने तक पहुँचाया है, स्वमेव, सामान्य सामाजिक संकट का प्रमुख अंग है। यदि सभ्यता को लौटकर बर्बर सभ्यता तक नहीं लाना हैं तो उस पर विजय प्राप्त करना अत्यावश्यक है। वहीं संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी की मानें तो ‘प्रदूषण की समस्या संसाधनों’ के स्थानान्तरण की समस्या है। संसाधनों का अधिकांश भाग एक तंत्र में तथा अल्पांश दूसरे तंत्र में रहता है। यही समस्या की जड़ है किसी तंत्र में विद्यमान अनुपयुक्त संसाधन उस तंत्र में एक अप्राकृतिक उत्तेजना एवं दबाव उत्पन्न करता है। ये उत्तेजना कुछ जैविक प्रक्रियाओं का अन्त कर देती हैं। तथा नवीन जैविक प्रक्रियाएं प्रारम्भ कर देती हैं। ये नवीन प्रक्रिया में परितंत्र की दक्षता में परिवर्तन कर देती हैं, प्रजाति संरचना एवं बनावट को प्रभावित करती हैं तथा परितंत्र की गतिशीलता एवं विकास को परिवर्तित कर देती हैं। वहीं संयुक्त राष्ट्रसंघ के पर्यावरण सम्मेलन में संसाधनों को हानि पहुँचाने वाले पदार्थों को प्रदूषण के अन्र्तगत माना गया है। ‘‘प्रदूषण वायु, जल और स्थल की भौतिक, रासायनिक और जैविक विशेषताओं का अवांछनीय परिवर्तन है जो मनुष्य और उसके लिए नुकसानदायक है। दूसरे जन्तुओं पौधों, औद्योगिक संस्थानों एवं कच्चे माल आदि को किसी भी रूप में हानि पहुँचाता है। अवांछित तत्वों की मौजूदगी पर्यावरण प्रदूषण कहलाती है। उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि पर्यावरण की समस्या मानवीय प्रक्रियाओं के उपरांत ही जन्म लेती है क्योंकि मानव ने अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्यावरण की ओर ध्यान न देते हुए इसका जरूरत से ज्यादा उपयोग किया, हानि पहुँचायी। वहीं व्यापक प्रदूषण सम्बन्धी समस्या को भारतीय संदर्भ में एकलव्य चैहान की टिप्पड़ी की ओर ध्यान दें तो बात काफी कुछ स्पष्ट हो जाती है - निर्धनता और अल्प-विकास भारत की मुख्य प्रदूषण सम्बन्धी समस्याएं हैं जो देश में बड़े परिस्थैतिक असंतुलन तथा मानव पर्यावरण की निर्धन गुणवत्ता के मूल कारण हैं।
पर्यावरण के घटक एवं उनके मुख्य प्रदूषक तत्व एवं स्त्रोत
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घटक
वायु
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प्रदूषक तत्व
कार्बन डाई-आक्साइड, सल्फर आक्साइड,
नाइट्रोजन आक्साइड हाइड्रोजन, अमोनिया, लेड,
एल्डिहाइड्स, एस्बेस्टस तथा बेरीलियम
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स्त्रोत
कोयला, पेट्रोल, डीजल जलाना
ठोस अवशिष्ट सीवर आदि
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जल
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प्रदूषक तत्व
घुले तथा लटकते ठोस पदार्थ अमोनिया, यूरिया, नाइटेट एवं नाइट्राइट,
क्लोराइड, फ्लोराइड कार्बोनेटस, तेल और ग्रीस, कीटनाशक टेनिन,
कोली फार्म सल्फेटस, सल्फाइड, भारी धातुएं शीशा-आरसेनिक, पारा,
मैंगनीज तथा रेडियोधर्मी पदार्थ
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स्त्रोत
सीवर नालियाँ, नगरीय प्रवाह,
उद्योगों के जहरीले प्रवाह खेतों तथा अणु संयत्रों के प्रवाह
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मिट्टी
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प्रदूषक तत्व
मानव एवं पशु निष्कासित पदार्थ वायरस एवं वैक्टीरिया,
कूड़ा करकट उर्वरक, कीटनाशक, क्षार फ्लोराइड, रेडियोधर्मी पदार्थ
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स्त्रोत
अनुचित मानव क्रियायें अशोधित औद्योगिक व्यर्थ
पदार्थ, उर्वरक एवं कीटनाशक
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ध्वनि
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प्रदूषक तत्व
शोर (सहन सीमा से उच्च ध्वनि स्तर
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स्त्रोत
हवाई जहाज, स्वचालित वाहन
औद्योगिक क्रियायें, लाउडस्पीकर आदि
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(स्रोत: आर.ए. चौरसिया-पर्यावरण शिक्षा)
पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार
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पर्यावरण में संतुलन बनाये रखने के लिए प्रकृति से कुछ तत्व हमें उपहार स्वरूप मिले हुए हैं। ये सभी तत्व (घटक) एक निश्चित मात्रा में हमारे वातावरण में उपस्थित रहते हैं। इन पर्यावरणीय घटकों की मात्रा कभी-कभी या तो आवश्यकता से अधिक हो जाती है या कम अथवा हानिकारक तत्व पर्यावरण में प्रविष्ट होकर इसे प्रदूषित कर देते हैं जो जीवधारियों के जीवन के लिए घातक एवं हानिकारक सिद्ध होता है। यही रूप पर्यावरण प्रदूषण कहलाता है। इन्हीं तत्वों में जो तत्व पर्यावरण में प्रतिकूल परिवर्तन लाता है अर्थात् जहाँ मनुष्य निवास करता है उनके आस-पास के क्षेत्र को प्रदूषित करता है। सर फ्रेड्रिक वार्नर के शब्दों में कहे तो ‘‘कोई भी पदार्थ सामान्यता प्रदूषक माना जाता है यदि वह प्रजातियों की वृद्धि दर में परिवर्तन द्वारा पर्यावरण में प्रतिकूल परिवर्तन कर देता है, भोज्य श्रृंखला को बाधा उपस्थिति करता है, जहरीला अथवा स्वास्थ्य, आराम, सुविधाओं तथा लोगों की सम्पत्ति के मूल्यों में बाधा उपस्थिति करता है। वार्नर साहब की व्याख्या से स्पष्ट है कि प्रदूषक तत्व शहरी अथवा ग्रामीण क्षेत्रों के द्वारा उत्सर्जित वे पदार्थ हैं जिसका संकेन्द्रण जल प्रवाह, अवशिष्ट दुर्घटना-जन्य प्रवाह, उद्योगों के उप-उत्पादों तथा अनेकानेक मानव क्रियाओं द्वारा होता है। प्रत्यक्ष प्रदूषक तत्वों में प्रमुख चिमनी का धुंआ, कूड़ा-करकट, अवशिष्ट जल आदि हैं। अदृश्य प्रदूषक तत्वों में भ्रष्टाचार एवं अपराध, शोर तथा वैक्टीरिया प्रमुख हैं।
पर्यावरण प्रदूषण का वर्गीकरण
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(A) प्रकृति जन्य प्रदूषण
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(1) वायु प्रदूषण
(2) जल प्रदूषण
(3) मिट्टी प्रदूषण
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(B) मानव जन्य प्रदूषण
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(1) कृषि प्रदूषण
(2) ध्वनि प्रदूषण
(3) औद्योगिक प्रदूषण
(4) सामाजिक प्रदूषण
(5) मानसिक प्रदूषण
स्पष्ट है कि पर्यावरण के प्रमुख प्रकार वायु, जल, भूमि मिट्टी के साथ-साथ मानवजनित सामाजिक प्रदूषण हैं। घरेलू लकड़ी, वाहनों से उत्सर्जित धुंआ, कूड़ा करकट, शक्ति उत्पादक ईंधन से निकली आग से धुंआ वायुमंडल में जाता है। वह वायु प्रदूषण कहलाता है। उद्योगों एवं अन्य स्रोतों से अनेक जहरीले पदार्थ जल में मिलकर उसे जहरीला बना देते हैं जिससे जल प्रदूषित हो जाता है। अत्यधिक कीटनाशकों एवं भारी मात्रा में उवर्रकों तथा अवशिष्ट पदार्थों को भूमि पर फेंकने से भूमि प्रदूषण होता है। छोटे-बड़े वाहनों के चलने, रेलों, हवाई जहाज, लाउडस्पीकर तथा जेट विमानों से निकलने वाली आवाज से ध्वनि प्रदूषण होता है। मानव जनित प्रदूषण में जुंआ, शराब, नैतिक अधः पतन तथा चोरी आदि आते हैं।
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सम्पर्कः
वरिष्ठ प्रवक्ता: हिन्दी विभाग
दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय
उरई-जालौन (उ0प्र0)-285001
07 अप्रैल 2009
डॉ0 वीरेन्द्र सिंह यादव की पुस्तक - पर्यावरण : वर्तमान और भविष्य (3)
04 अप्रैल 2009
डॉ0 वीरेन्द्र सिंह यादव की पुस्तक - पर्यावरण : वर्तमान और भविष्य (2)
-डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव
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अध्याय-2 == पर्यावरण का अर्थ, संकल्पना एवं अवधारणा
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पृथ्वी पर संतुलित जीवन के लिए, वायु, भूमि, जल, वनस्पति, पेड़-पौधे, मानव सब मिलकर पर्यावरण बनाते हैं। पृथ्वी पर जबसे मनुष्य, पशु-पक्षी और जीव तथा जीवाणु उपभोक्ता के रूप में प्रकट हुए तब से लेकर आज तक यह चक्र निरन्तर अवाधि गति से चला आ रहा है। यहाँ पर जिन्हें जितनी आवश्यकता होती है वह उन्हें प्राप्त हो जाता है शेष जो बच रहता है वह प्रकृति आगे के लिए अपने पास संरक्षित कर लेती है। अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में लिखा गया है- ‘‘हे धरती माँ, जो कुछ मैं तुझसे लूंगा, वह उतना ही होगा, जिसे तू पुनः पैदा कर सके। तेरे मर्मस्थल पर या तेरी जीवन शक्ति पर कभी आघात नहीं करूंगा। यही नहीं ऋग्वेद की ऋचाओं में भी पर्यावरण के तत्वों - पृथ्वी, जल, आकाश, वायु के प्रति सभी ऋषि नत्मस्तक होकर प्रणाम करते हैं अर्थात् भारत में नदियों को माँ तुल्य स्थान एवं सम्मान दिया गया है। आज संसाधनों के अंधाधुंध के कारण यह पूजन अर्चन की परम्परा कोरी कल्पना सी लगती है। भूमण्डलीकरण एवं बाजारीकरण के इस भौतिक युग में मानव ने प्रकृति पर विजय प्राप्त करने के लिए अनेक सुख सुविधाएं एवं वैज्ञानिक उपलब्धियां अर्जित कीं साथ ही बढ़ती आबादी की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु औद्योगिक क्रान्ति का सहारा लिया गया, यह वह निर्णायक समय था जब हमारी प्रकृति का सामान्य सा रूप विखण्डित होने लगा। हम औद्योगिक क्रांन्ति और हरित क्रान्ति के योद्धा तो कहलाये परन्तु इसके पीछे हमारा आकाश एवं जमीन दोनों क्षतिग्रस्त हो गये और पंच तत्व का यह भैरव मिश्रण अपनी स्वच्छता खोने लगा। इससे हमारे परितंत्र एवं पारिस्थितिकी असन्तुलित हो गये। वन कटने लगे, उपजाऊ भूमि पर आवास बनने लगे, बड़े-बड़े जंगल साफकर बांधों की योजना बनी और न जाने कितने ऐसे प्रयोग शुरू हो गये जो मानव और प्रकृति के अनुकूल नहीं थे जिससे सामान्य जीवन में अनेक परिवर्तन परिलक्षित होने लगे। पर्यावरण हितैषी जीव-जन्तुओं की बहुत सी प्रजातियाँ विलुप्त होती गयीं और जो शेष बची हैं वे विलुप्त होने के कगार पर खड़ी हैं। सफाईकर्मी गिद्ध विलुप्त होते जा रहे हैं। समुद्र, नदी, तालाब, जंगल और घास के मैदान का परितंत्र विनाश की ओर अग्रसर है यही नहीं वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक असंतुलन के स्पष्ट नजारे दिखने लगे हैं क्योंकि वैश्विक उष्णता से ऋतु चक्रों के सन्तुलित परिचालन में व्यवधान उत्पन्न होने लगा है। हिमखण्ड पिघलने लगे हैं। समुद्र अपनी वर्जनाएं तोड़ रहा है उसका जल स्तर उछाल मार कर संकट की ओर सीधा संवाद कर रहा है अर्थात जल प्रलय का आमंत्रण-पत्र तैयार हो गया है आकाश में ओजोन परत अपना धैर्य खो रही है। साथ ही अन्य प्राकृतिक आपदाएं (सुनामी) कहर ढाहने लगी हैं। पर्यावरण के इस प्रदूषण ने हमारे जनमानस के ऊपर अनेक असाध्य रोगों का आक्रमण शुरू कर दिया है। युद्ध की रणभेरी बज चुकी है। यदि इन परिस्थितियों से मनुष्य प्रकृति के प्रति सचेत और सावधान नहीं हुआ तो भयंकर से भयंकर परिणाम उसके दहलीज पर दस्तक देते नजर आयेंगे।
पर्यावरण दो शब्दों के समन्वय से बना है - परि तथा आवरण। परि से तात्पर्य चारों ओर तथा आवरण का अर्थ है चादर या घेरा अर्थात् जो चारों ओर से घेरे हुए है, वह पर्यावरण कहलाता है। यह वातावरण या पर्यावरण मानव सहित अन्य जीवाणुओं को जो परिस्थितियां दशाएं, शक्तियां और प्रभाव अपने आवरण की क्रोड़ में छिपाये हुए है। विस्तृत अर्थ में जायें तो ‘पर्यावरण सम्पूर्ण दशाओं एवं प्रभावों को जो जीवों के जीवन एवं विकास को प्रभावित करते हैं अर्थात् हम अपने चारो ओर अनेक प्रकार के जीव जंतु, पेड़-पौधों तथा अनेक सजीव व निर्जीव वस्तुएं देखते या महसूस करते हैं वही पर्यावरण कहलाता है। अन्य शब्दों में कहें तो पर्यावरण वह है जो हम अपनी आँखों से सामने अवलोकित करते हैं चाहे वह वायु हो, भूमि हो, अंतरिक्ष हो, या ध्वनि हो या वनस्पति हो। इस तरह से पर्यावरण उस समूची भौतिक व जैविक व्यवस्था को कहते हैं जिसमें सम्पूर्ण जगत के जीवधारी जीवन जीते, बढ़ते और अपनी स्वाभाविक प्र्रवृत्तियों का विकास करते हैं। पर्यावरण जीवन के सामाजिक, सांस्कृतिक व भौतिक आदि सभी पहलुओं को प्रभावित करता है। वास्तव में देखा जाए तो पर्यावरण अत्यन्त व्यापक सत्ता है जो धुलोक से पृथ्वी के प्रत्येक घटक में निहित होता है।
पर्यावरण को अंग्रेजी भाषा में इनवायरमेंट (Environment) कहा गया है जो फ्रांसीसी शब्द Environir शब्द से उत्पन्न हुआ है। जिसका पर्याय घेरना (To Surroun) होता है। अंग्रेजी भाषा में पर्यावरण के लिए एक शब्द Habitat का भी प्रयोग किया जाता है जो लैटिन के Habitare शब्द से बना है, जिसकी व्याख्या यह है कि एक सुनिश्चित स्थान जिसमें जीव उस स्थान की भौतिक एवं जैविक दशाओं में समायोजन स्थापित कर रहते हैं। पारिभाषिक तौर पर देखें तो एक विशेष वातावरण जिसमें एक विशेष जीव वर्ग या समूह निवास करता है। पर्यावरण कहलाता है, पर्यावरण की परिभाषा भारतीय एवं पाश्चात्य पर्यावरणविदों की दृष्टि से देखें तो तो इसका अर्थ स्पष्ट नजर आयेगा - ‘‘भूगोल परिभाषा कोश के अनुसार - ‘‘चारों ओर उन बाहरी दशाओं का योग, जिसके अन्दर एक जीव अथवा समुदाय रहता है या कोई वस्तु रहती है। डा0 वी. पी. सिंह के अनुसार ‘‘पर्यावरण वह आवरण या घेरा है जो मानव समुदाय को चारों ओर से घेरे हुए है तथा मानव को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से प्रभावित करता है।’’ प्रसिद्ध पर्यावरणविद् एवं वैज्ञानिक एच फिटिंग ने पर्यावरण का अर्थ जीव के परिस्थिति कारकों का योग बताया है। आपके अनुसार जीवन की परिस्थिति के सभी तथ्य मिलकर पर्यावरण कहलाते हैं। इस प्रकार ‘पर्यावरण’ वह परिवृत्ति है जो मनुष्य को चारों तरफ से घेरे हुए है तथा उसके जीवन और क्रियाओं पर प्रकाश डालती है। इस परिवृत्ति में मनुष्य के बाहर के समस्त तथ्य वस्तुएं, स्थितियां तथा दशाएं सम्मिलित होती हैं। यही सब मानव के जीवन विकास को प्रभावित करती हैं।’’ पी. जिस्बर्ट के अनुसार - ‘‘वह जो किसी वस्तु के चारों ओर से आवृत्त कर उसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है उस वस्तु का पर्यावरण कहलाता है।’’ इसी तरह बैरिंग, लैंगफील्ड और बेल्ड की मान्यता है कि व्यक्ति गर्भावस्था से लेकर मृत्यु पर्यन्त अपने आस-पास से जो भी उत्तेजनाएं ग्रहण करता है उनके समुच्चय का मान ही पर्यावरण है।’’ तापमान, प्रकाश, जल, वायु, मृदा तथा कोई भी बाह्म शक्ति पदार्थ या दशा जो जीवमात्र को किसी न किसी रूप में प्रभावित करती है, पर्यावरण का कारक कहलाती है। इस प्रकार से पर्यावरण एक समुच्चय है और मानव तथा अन्य जीव पर्यावरण के अविभाज्य अंग हैं एवं पृथ्वी को एक पूर्ण इकाई का रूप भी प्रदान करते हैं। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् अलेक्जांडर फान हम्बोल्ट ने अपने महान ग्रन्थ कासमास में इसी प्राकृतिक संश्लिष्ट एवं एकता को निम्न शब्दों में प्रतिपादित किया है - ‘हम प्राकृतिक रूप से प्रत्येक जीव को सृष्टि से एक अंग के रूप में मानने के लिए बाध्य हैं तथा पौधे या पशु को केवल एक प्रथक प्रजाति ही नहीं समझना चाहिए बल्कि अन्य जीवित या मृत स्वरूप से जुड़ा हुआ मानना चाहिए।’ इसी तरह मैक आइवर नामक पर्यावरणविद् का मानना है कि ‘‘पृथ्वी का धरातल एवं उसकी सभी प्राकृतिक अवस्थाएं यथा-प्राकृतिक संसाधन, भूमि, जल, पर्वत, मैदान, खनिज पदार्थ, पौधे, पशु तथा समस्त प्राकृतिक शक्तियां जो पृथ्वी पर विद्यमान रहकर मानव जीवन को प्रभावित करती हैं, पर्यावरण के अन्तर्गत आती हैं।’’ वहीं ए. जी. टान्सले का मानना है कि पर्यावरण को ‘‘उन सम्पूर्ण प्रभावी दशाओं का योग कहा जाता है जिनमें जीव रहते हैं।’’ इ. जे. रास का मानना है कि ‘‘पर्यावरण वह बाह्म शक्ति है जो प्रभावित करती है।’’ इसी से सम्बद्ध परिभाषा प्रसिद्ध पर्यावरणविद् एवं भूगोलवेत्ता डडले स्टाम्प के अनुसार - ‘‘पर्यावरण प्रभावों का ऐसा योग है जो जीव के विकास एवं प्रकृति को परिवर्तित तथा निर्धारित करता है।’’ हर्सकोविटस के अनुसार - ‘‘पर्यावरण समस्त बाह्म दशाओं एवं प्रभावों का समुच्चय है और इसी सम्बन्ध के कारण जीव प्रतिक्रिया एवं प्रभावित करने में सक्षम होता है।’ स्पष्ट है कि जो तथ्य मानव के जीवन और विकास को प्रभावित करते हैं उन सम्पूर्ण तथ्यों का योग पर्यावरण कहलाता है, भले ही ये तथ्य सजीव हों अथवा निर्जीव। इसी तरह से पर्यावरण की विस्तृत परिभाषा एन. सी. ई. आर. टी., नई दिल्ली के अनुसार ‘‘व्यक्ति के पर्यावरण के अन्तर्गत वे समस्त प्राकृतिक एवं सामाजिक घटक आते हैं। जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में उसके जीवन और व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
संक्षेप में हम निष्कर्ष रूप में यह कह सकते हैं कि पर्यावरण के अन्तर्गत प्राकृतिक एवं मानव निर्मित कारकों का समावेश रहता है जो हमें चारो ओर से घेरे हुए हैं अर्थात पर्यावरण के अन्तर्गत भौतिक के साथ-साथ सांस्कृतिक (जैविक-अजैविक) प्रभावशील घटकों का समावेश किया जाता है जो जगत के जीव की दशाओं और कार्यों को प्रभावित करता है और पर्यावरण की यह गति प्राणि जगत के बीच क्रिया और प्रतिक्रिया की श्रृंखला प्राकृतिक परिवेश से प्रखर होती है। कुल मिलाकर कहा जाये तो पर्यावरण - ‘‘प्राणियों की प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करने वाली आस-पास की सभी जैविक व अजैविक स्थितियों का समुच्चय पर्यावरण कहलाता है।’’
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सम्पर्कः
वरिष्ठ प्रवक्ता: हिन्दी विभाग
दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय
उरई-जालौन (उ0प्र0)-285001
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लेखक परिचय –

युवा साहित्यकार के रूप में ख्याति प्राप्त डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव ने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद ’ की अवधारणा को स्थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया है। आपके दो सौ पचास से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की स्तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, राष्ट्रभाषा हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना कर चुके डा0 वीरेन्द्र ने विश्व की ज्वलंत समस्या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्तुत किया है। राष्ट्रभाषा महासंघ मुम्बई, राजमहल चैक कवर्धा द्वारा स्व0 श्री हरि ठाकुर स्मृति पुरस्कार, बाबा साहब डा0 भीमराव अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान 2006, साहित्य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्मान 2008 सहित अनेक सम्मानो से उन्हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्च शिक्षा अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियां (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।
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अध्याय-2 == पर्यावरण का अर्थ, संकल्पना एवं अवधारणा
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पृथ्वी पर संतुलित जीवन के लिए, वायु, भूमि, जल, वनस्पति, पेड़-पौधे, मानव सब मिलकर पर्यावरण बनाते हैं। पृथ्वी पर जबसे मनुष्य, पशु-पक्षी और जीव तथा जीवाणु उपभोक्ता के रूप में प्रकट हुए तब से लेकर आज तक यह चक्र निरन्तर अवाधि गति से चला आ रहा है। यहाँ पर जिन्हें जितनी आवश्यकता होती है वह उन्हें प्राप्त हो जाता है शेष जो बच रहता है वह प्रकृति आगे के लिए अपने पास संरक्षित कर लेती है। अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में लिखा गया है- ‘‘हे धरती माँ, जो कुछ मैं तुझसे लूंगा, वह उतना ही होगा, जिसे तू पुनः पैदा कर सके। तेरे मर्मस्थल पर या तेरी जीवन शक्ति पर कभी आघात नहीं करूंगा। यही नहीं ऋग्वेद की ऋचाओं में भी पर्यावरण के तत्वों - पृथ्वी, जल, आकाश, वायु के प्रति सभी ऋषि नत्मस्तक होकर प्रणाम करते हैं अर्थात् भारत में नदियों को माँ तुल्य स्थान एवं सम्मान दिया गया है। आज संसाधनों के अंधाधुंध के कारण यह पूजन अर्चन की परम्परा कोरी कल्पना सी लगती है। भूमण्डलीकरण एवं बाजारीकरण के इस भौतिक युग में मानव ने प्रकृति पर विजय प्राप्त करने के लिए अनेक सुख सुविधाएं एवं वैज्ञानिक उपलब्धियां अर्जित कीं साथ ही बढ़ती आबादी की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु औद्योगिक क्रान्ति का सहारा लिया गया, यह वह निर्णायक समय था जब हमारी प्रकृति का सामान्य सा रूप विखण्डित होने लगा। हम औद्योगिक क्रांन्ति और हरित क्रान्ति के योद्धा तो कहलाये परन्तु इसके पीछे हमारा आकाश एवं जमीन दोनों क्षतिग्रस्त हो गये और पंच तत्व का यह भैरव मिश्रण अपनी स्वच्छता खोने लगा। इससे हमारे परितंत्र एवं पारिस्थितिकी असन्तुलित हो गये। वन कटने लगे, उपजाऊ भूमि पर आवास बनने लगे, बड़े-बड़े जंगल साफकर बांधों की योजना बनी और न जाने कितने ऐसे प्रयोग शुरू हो गये जो मानव और प्रकृति के अनुकूल नहीं थे जिससे सामान्य जीवन में अनेक परिवर्तन परिलक्षित होने लगे। पर्यावरण हितैषी जीव-जन्तुओं की बहुत सी प्रजातियाँ विलुप्त होती गयीं और जो शेष बची हैं वे विलुप्त होने के कगार पर खड़ी हैं। सफाईकर्मी गिद्ध विलुप्त होते जा रहे हैं। समुद्र, नदी, तालाब, जंगल और घास के मैदान का परितंत्र विनाश की ओर अग्रसर है यही नहीं वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक असंतुलन के स्पष्ट नजारे दिखने लगे हैं क्योंकि वैश्विक उष्णता से ऋतु चक्रों के सन्तुलित परिचालन में व्यवधान उत्पन्न होने लगा है। हिमखण्ड पिघलने लगे हैं। समुद्र अपनी वर्जनाएं तोड़ रहा है उसका जल स्तर उछाल मार कर संकट की ओर सीधा संवाद कर रहा है अर्थात जल प्रलय का आमंत्रण-पत्र तैयार हो गया है आकाश में ओजोन परत अपना धैर्य खो रही है। साथ ही अन्य प्राकृतिक आपदाएं (सुनामी) कहर ढाहने लगी हैं। पर्यावरण के इस प्रदूषण ने हमारे जनमानस के ऊपर अनेक असाध्य रोगों का आक्रमण शुरू कर दिया है। युद्ध की रणभेरी बज चुकी है। यदि इन परिस्थितियों से मनुष्य प्रकृति के प्रति सचेत और सावधान नहीं हुआ तो भयंकर से भयंकर परिणाम उसके दहलीज पर दस्तक देते नजर आयेंगे।
पर्यावरण दो शब्दों के समन्वय से बना है - परि तथा आवरण। परि से तात्पर्य चारों ओर तथा आवरण का अर्थ है चादर या घेरा अर्थात् जो चारों ओर से घेरे हुए है, वह पर्यावरण कहलाता है। यह वातावरण या पर्यावरण मानव सहित अन्य जीवाणुओं को जो परिस्थितियां दशाएं, शक्तियां और प्रभाव अपने आवरण की क्रोड़ में छिपाये हुए है। विस्तृत अर्थ में जायें तो ‘पर्यावरण सम्पूर्ण दशाओं एवं प्रभावों को जो जीवों के जीवन एवं विकास को प्रभावित करते हैं अर्थात् हम अपने चारो ओर अनेक प्रकार के जीव जंतु, पेड़-पौधों तथा अनेक सजीव व निर्जीव वस्तुएं देखते या महसूस करते हैं वही पर्यावरण कहलाता है। अन्य शब्दों में कहें तो पर्यावरण वह है जो हम अपनी आँखों से सामने अवलोकित करते हैं चाहे वह वायु हो, भूमि हो, अंतरिक्ष हो, या ध्वनि हो या वनस्पति हो। इस तरह से पर्यावरण उस समूची भौतिक व जैविक व्यवस्था को कहते हैं जिसमें सम्पूर्ण जगत के जीवधारी जीवन जीते, बढ़ते और अपनी स्वाभाविक प्र्रवृत्तियों का विकास करते हैं। पर्यावरण जीवन के सामाजिक, सांस्कृतिक व भौतिक आदि सभी पहलुओं को प्रभावित करता है। वास्तव में देखा जाए तो पर्यावरण अत्यन्त व्यापक सत्ता है जो धुलोक से पृथ्वी के प्रत्येक घटक में निहित होता है।
पर्यावरण को अंग्रेजी भाषा में इनवायरमेंट (Environment) कहा गया है जो फ्रांसीसी शब्द Environir शब्द से उत्पन्न हुआ है। जिसका पर्याय घेरना (To Surroun) होता है। अंग्रेजी भाषा में पर्यावरण के लिए एक शब्द Habitat का भी प्रयोग किया जाता है जो लैटिन के Habitare शब्द से बना है, जिसकी व्याख्या यह है कि एक सुनिश्चित स्थान जिसमें जीव उस स्थान की भौतिक एवं जैविक दशाओं में समायोजन स्थापित कर रहते हैं। पारिभाषिक तौर पर देखें तो एक विशेष वातावरण जिसमें एक विशेष जीव वर्ग या समूह निवास करता है। पर्यावरण कहलाता है, पर्यावरण की परिभाषा भारतीय एवं पाश्चात्य पर्यावरणविदों की दृष्टि से देखें तो तो इसका अर्थ स्पष्ट नजर आयेगा - ‘‘भूगोल परिभाषा कोश के अनुसार - ‘‘चारों ओर उन बाहरी दशाओं का योग, जिसके अन्दर एक जीव अथवा समुदाय रहता है या कोई वस्तु रहती है। डा0 वी. पी. सिंह के अनुसार ‘‘पर्यावरण वह आवरण या घेरा है जो मानव समुदाय को चारों ओर से घेरे हुए है तथा मानव को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से प्रभावित करता है।’’ प्रसिद्ध पर्यावरणविद् एवं वैज्ञानिक एच फिटिंग ने पर्यावरण का अर्थ जीव के परिस्थिति कारकों का योग बताया है। आपके अनुसार जीवन की परिस्थिति के सभी तथ्य मिलकर पर्यावरण कहलाते हैं। इस प्रकार ‘पर्यावरण’ वह परिवृत्ति है जो मनुष्य को चारों तरफ से घेरे हुए है तथा उसके जीवन और क्रियाओं पर प्रकाश डालती है। इस परिवृत्ति में मनुष्य के बाहर के समस्त तथ्य वस्तुएं, स्थितियां तथा दशाएं सम्मिलित होती हैं। यही सब मानव के जीवन विकास को प्रभावित करती हैं।’’ पी. जिस्बर्ट के अनुसार - ‘‘वह जो किसी वस्तु के चारों ओर से आवृत्त कर उसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है उस वस्तु का पर्यावरण कहलाता है।’’ इसी तरह बैरिंग, लैंगफील्ड और बेल्ड की मान्यता है कि व्यक्ति गर्भावस्था से लेकर मृत्यु पर्यन्त अपने आस-पास से जो भी उत्तेजनाएं ग्रहण करता है उनके समुच्चय का मान ही पर्यावरण है।’’ तापमान, प्रकाश, जल, वायु, मृदा तथा कोई भी बाह्म शक्ति पदार्थ या दशा जो जीवमात्र को किसी न किसी रूप में प्रभावित करती है, पर्यावरण का कारक कहलाती है। इस प्रकार से पर्यावरण एक समुच्चय है और मानव तथा अन्य जीव पर्यावरण के अविभाज्य अंग हैं एवं पृथ्वी को एक पूर्ण इकाई का रूप भी प्रदान करते हैं। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् अलेक्जांडर फान हम्बोल्ट ने अपने महान ग्रन्थ कासमास में इसी प्राकृतिक संश्लिष्ट एवं एकता को निम्न शब्दों में प्रतिपादित किया है - ‘हम प्राकृतिक रूप से प्रत्येक जीव को सृष्टि से एक अंग के रूप में मानने के लिए बाध्य हैं तथा पौधे या पशु को केवल एक प्रथक प्रजाति ही नहीं समझना चाहिए बल्कि अन्य जीवित या मृत स्वरूप से जुड़ा हुआ मानना चाहिए।’ इसी तरह मैक आइवर नामक पर्यावरणविद् का मानना है कि ‘‘पृथ्वी का धरातल एवं उसकी सभी प्राकृतिक अवस्थाएं यथा-प्राकृतिक संसाधन, भूमि, जल, पर्वत, मैदान, खनिज पदार्थ, पौधे, पशु तथा समस्त प्राकृतिक शक्तियां जो पृथ्वी पर विद्यमान रहकर मानव जीवन को प्रभावित करती हैं, पर्यावरण के अन्तर्गत आती हैं।’’ वहीं ए. जी. टान्सले का मानना है कि पर्यावरण को ‘‘उन सम्पूर्ण प्रभावी दशाओं का योग कहा जाता है जिनमें जीव रहते हैं।’’ इ. जे. रास का मानना है कि ‘‘पर्यावरण वह बाह्म शक्ति है जो प्रभावित करती है।’’ इसी से सम्बद्ध परिभाषा प्रसिद्ध पर्यावरणविद् एवं भूगोलवेत्ता डडले स्टाम्प के अनुसार - ‘‘पर्यावरण प्रभावों का ऐसा योग है जो जीव के विकास एवं प्रकृति को परिवर्तित तथा निर्धारित करता है।’’ हर्सकोविटस के अनुसार - ‘‘पर्यावरण समस्त बाह्म दशाओं एवं प्रभावों का समुच्चय है और इसी सम्बन्ध के कारण जीव प्रतिक्रिया एवं प्रभावित करने में सक्षम होता है।’ स्पष्ट है कि जो तथ्य मानव के जीवन और विकास को प्रभावित करते हैं उन सम्पूर्ण तथ्यों का योग पर्यावरण कहलाता है, भले ही ये तथ्य सजीव हों अथवा निर्जीव। इसी तरह से पर्यावरण की विस्तृत परिभाषा एन. सी. ई. आर. टी., नई दिल्ली के अनुसार ‘‘व्यक्ति के पर्यावरण के अन्तर्गत वे समस्त प्राकृतिक एवं सामाजिक घटक आते हैं। जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में उसके जीवन और व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
संक्षेप में हम निष्कर्ष रूप में यह कह सकते हैं कि पर्यावरण के अन्तर्गत प्राकृतिक एवं मानव निर्मित कारकों का समावेश रहता है जो हमें चारो ओर से घेरे हुए हैं अर्थात पर्यावरण के अन्तर्गत भौतिक के साथ-साथ सांस्कृतिक (जैविक-अजैविक) प्रभावशील घटकों का समावेश किया जाता है जो जगत के जीव की दशाओं और कार्यों को प्रभावित करता है और पर्यावरण की यह गति प्राणि जगत के बीच क्रिया और प्रतिक्रिया की श्रृंखला प्राकृतिक परिवेश से प्रखर होती है। कुल मिलाकर कहा जाये तो पर्यावरण - ‘‘प्राणियों की प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करने वाली आस-पास की सभी जैविक व अजैविक स्थितियों का समुच्चय पर्यावरण कहलाता है।’’
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सम्पर्कः
वरिष्ठ प्रवक्ता: हिन्दी विभाग
दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय
उरई-जालौन (उ0प्र0)-285001
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लेखक परिचय –
युवा साहित्यकार के रूप में ख्याति प्राप्त डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव ने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद ’ की अवधारणा को स्थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया है। आपके दो सौ पचास से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की स्तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, राष्ट्रभाषा हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना कर चुके डा0 वीरेन्द्र ने विश्व की ज्वलंत समस्या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्तुत किया है। राष्ट्रभाषा महासंघ मुम्बई, राजमहल चैक कवर्धा द्वारा स्व0 श्री हरि ठाकुर स्मृति पुरस्कार, बाबा साहब डा0 भीमराव अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान 2006, साहित्य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्मान 2008 सहित अनेक सम्मानो से उन्हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्च शिक्षा अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियां (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।
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