डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

01 जुलाई 2011

शब्दकार ब्लॉग बंद कर दिया गया है --- जानकारी

पिछले कुछ माह की शब्दकार की गतिविधियों के बाद और अभी तक के अपने प्रयास के बाद ऐसा लगने लगा था कि जैसा सोचकर इस ब्लॉग की शुरूआत की गई थी हम उस उद्देश्य में सफल नहीं हो सके। 1 मार्च 2009 से प्रारम्भ हुए इस ब्लॉग में शुरूआती दिनों में लेखकों की रचनाओं को ब्लॉग संचालक द्वारा प्रकाशित किया जाता था। बाद में लेखकों की सक्रियता बढ़ाने के उद्देश्य से इस ब्लॉग को सामुदायिक ब्लॉग के रूप में संचालित करना शुरू कर दिया।


बहुत कुछ सहयोग मिलने के बाद भी लगातार कुछ न कुछ खालीपन सा, अधूरा सा महसूस होता रहा। इधर यह भी एहसास हो रहा था कि जिस सोच के साथ ब्लॉग शुरू किया है जब वह ही पूरा नहीं हो पा रहा है तो ब्लॉग संचालन की आवश्यकता ही नहीं रह जाती है। वैसे भी शब्दकार के सदस्य अपने-अपने ब्लॉग पर पूरी सक्रियता से उपस्थित हैं, ऐसे में शब्दकार के द्वारा कोई विशेष अथवा अभिनव कार्य नहीं किया जा रहा है।

कई दिनों की अपनी पशोपेश की स्थिति के बाद लगा कि शब्दकार को बन्द कर देना चाहिए। हालांकि अभी इसको अस्थायी रूप से बन्द किया जा रहा है, यदि भविष्य में किसी तरह का कुछ अलग सा करने का मन बना या कोई रास्ता दिखा तो इसे पुनः शुरू किया जायेगा।

एक बात शब्दकार के अपने साथियों से, जिन्होंने पूरी तन्मयता के साथ अपनी रचनाओं को प्रकाशित कर शब्दकार को महत्वपूर्ण बनाया, कि उनके लेखकीय अधिकारों को रोका सा गया है। हमारी मंशा है कि अब शब्दकार पर किसी तरह की पोस्ट का प्रकाशन न हो, इस कारण से सदस्यों की सदस्यता को शब्दकार से समाप्त करना हमारी मजबूरी रही। अभी हमें ब्लॉग का तकनीकी ज्ञान नहीं है, इस कारण ऐसा कदम उठाना पड़ा। आशा है आप लोग अन्यथा नहीं लेंगे।

एक बात अपने इंटरनेट के सभी साथियों से कि आज 1 जुलाई 2011 से शब्दकार पर किसी भी तरह की रचनाओं का प्रकाशन नहीं किया जायेगा। कृपया किसी भी रूप में रचनाओं को प्रकाशन हेतु न भेजें और न ही शब्दकार की सदस्यता के लिए अनुरोध करें। शब्दकार के सदस्यों की सदस्यता को भी इसी कारण से बाधित किया गया है कि वे भी अपनी रचनाओं का प्रकाशन शब्दकार पर न कर सकें।

शब्दकार अपनी 2 वर्ष 4 माह की इंटरनेट आयु बिताने के बाद अपनी 421 पोस्ट-इस पोस्ट के अतिरिक्त- के साथ अस्थायी रूप से बन्द हो रहा है। जिन लेखकों का, शब्दकार सदस्यों का, पाठकों का, टिप्पणीकारों का, आलोचकों का, शुभेच्छुओं का सहयोग शब्दकार को मिला उसका शब्दकार संचालक की ओर से आभार। आगे भी, यदि कोई अभिनव कार्य प्रारम्भ होता है तो, आप सभी का सहयोग पूर्व भी भांति प्राप्त होता रहेगा, ऐसी आशा की जा सकती है।

आभार सहित, धन्यवाद सहित, भरे मन से आपका
शब्दकार संचालक
डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

27 मार्च 2011

चार सौ का आंकड़ा छूने की बधाई -- सुझाव आमंत्रित हैं

शब्दकार आप सभी सदस्यों की मेहनत और सहयोग से निरन्तर आगे बढ़ रहा है। राजीव जी की इस पोस्ट के साथही शब्दकार ने अपनी चार सौवीं पोस्ट को छू लिया है। यह सदस्यों की लगातार बनी रहने वाली सक्रियता का सूचक है।


चित्र गूगल छवियों से साभार

400 के आंकड़े को शब्दकार के द्वारा छूने के बाद भी लगता है कि जो सोचकर इस ब्लॉग को शुरू किया था, वह उद्देश्य अभी भी कहीं से पूरा होते नहीं दिखता है। पूरा क्या अभी उसके आसपास भी पहुंचता नहीं दिखता है। शब्दकार आप सभी के सामूहिक प्रयास का सुखद परिणाम है तथा इसको और भी अधिक सुखद बनाने के लिए आप सभी का पर्याप्त सहयोग अपेक्षित है।

इस बार आप सभी सदस्यों से और शब्दकार के पाठकों से इस बात की अपेक्षा है कि वे शब्दकार को और अधिक लोकप्रिय, और भी अधिक सारगर्भित, और भी अधिक साहित्यिक बनाने के लिए हमें अपने-अपने स्तर पर सुझाव भेजने का कष्ट करें।

चूंकि सभी सदस्यों के व्यक्तिगत ब्लॉग हैं और सभी अपने-अपने स्तर पर उत्कृष्ट लेखन करके हिन्दी भाषा तथा साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। ऐसे में शब्दकार जैसे सामुदायिक ब्लॉग की आवश्यकता क्यों और किस कारण से पड़ी है? ऐसा क्या किया जाये कि सभी को, चाहे वह इस ब्लॉग का सदस्य हो अथवा पाठक, यहां की सामग्री के अध्ययन के द्वारा कुछ सार्थकता प्राप्त हो सके। इसमें हम अकेले कुछ नहीं हैं, आप सभी इसके महत्वपूर्ण अंग हैं।

अतः शब्दकार को अपना ब्लॉग मानकर, समझकर इस सम्बन्ध में अपने अमूल्य सुझाव अवश्य देवें कि इसे कैसे और अधिक प्रभावी तथा लोकप्रिय बनाया जा सके। सभी सदस्यों और पाठकों को शब्दाकर के चार सौ का आंकड़ा छूने पर बधाई तथा शुभकामनायें। सभी लेखक सदस्यों का विशेष आभार जो अपने सहयोग से, अपनी रचनात्मकता से शब्दकार को लोकप्रिय तथा जीवन्त बनाये हुए हैं।

20 सितंबर 2010

शब्दकार की तीन सौवीं पोस्ट प्रकाशित--आभार संजीव 'सलिल' जी का--इतिहास पर नजर डालें


शब्दकार ब्लॉग का आरम्भ 01 मार्च 2009 को किया गया था। तबसे लेकर आजतक इसके साथ उतार-चढ़ाव वाला समय भी आता रहा। एक बारगी बीच में ऐसा भी समय आया जबकि इसका संचालन बन्द करने का भी विचार बना। शब्दकार के लगभग सभी साथियों की ओर से इसको बन्द न करने का सुझाव दिया गया।

अपनी छोटी सी यात्रा में शब्दकार ब्लॉग जगत में कहाँ स्थित है यह तो आकलन आप सुधी पाठकजन ही करें। अपनी व्यस्तता के बीच समय निकाल कर देखा तो पाया कि शब्दकार पर 300वीं पोस्ट का प्रकाशन हो चुका है।

इस 300वीं पोस्ट का प्रकाशन इसी 10 सितम्बर 2010 को हुआ। इस पोस्ट के रचनाकार ब्लॉग जगत के सम्माननीय आचार्य संजीवसलिलजी हैं। तीन सौवीं पोस्ट भी कविता रही जिसका शीर्षक था जीवनअंगना को महकाया आचार्य संजीव ‘सलिल’ जी के साथ शब्दकार का अजब संयोग जुड़ा हुआ है। इसको आप शब्दकार के संक्षिप्त इतिहास के द्वारा देख-समझ सकते हैं।

लगभग बारह दिनों पूर्व शब्दकार की तीन सौवीं पोस्ट के प्रकाशन होने के पूर्व एक दिन पोस्ट का सम्पादन करते समय देखा था कि जल्द ही शब्दकार पर तीन सौवीं पोस्ट किसी न किसी के द्वारा प्रकाशित होगी। पहले सोचा कि इस बात को सबके बीच बाँट कर तीन सौवीं पोस्ट लिखने वालों को आमंत्रित किया जाये फिर विचार आया कि नहीं देखते हैं कि किस शब्दकार साथी की पोस्ट 300 का आँकड़ा छूती है।

आइये अब एक निगाह शब्दकार की संक्षिप्त सी यात्रा पर भी डाल लें और इसके विकास की राह को और प्रशस्त करें।

शब्दकार की पहली पोस्ट का प्रकाशन हुआ था 01 मार्च 2009 को। इस पहली पोस्ट के रचनाकार थे डॉ0 ब्रजेश कुमार और इनके द्वारा एक कविता प्रकाशनार्थ प्रेषित की गई थी। इस कविता का शीर्षक था--लो पुनः मधुमास आया।

यहाँ सुधी पाठकों को याद दिला दें कि पहले शब्दकार में पोस्ट का प्रकाशन शब्दकार के संचालक डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर के द्वारा होता था। बाद में रचनाकारों की अधिक से अधिक सहभागिता को सुनिश्चित करने के लिए इस ब्लॉग को सामुदायिक ब्लॉग के रूप में संचालित करना शुरू किया। शब्दकार का सामुदायिक संचालन 15 अगस्त 2009 से किया गया।

सामुदायिक ब्लॉग के रूप में शुरू होने के बाद पहली पोस्ट का प्रकाशन 16 अगस्त 2009 को एक कविता के रूप में हुआ। सरस्वती वंदना के द्वारा प्रकाशित होने वाली पहली रचना के साथ ब्लॉग जगत के माननीय आचार्य संजीवसलिलजी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।

इसके बाद से लगातार शब्दकार साथियों के द्वारा रचनाओं का प्रकाशन होता रहा। शब्दकार में इसके बाद भी पूर्व की भाँति उन रचनाकारों की भी रचनाओं का प्रकाशन होता रहा जो शब्दकार के सदस्य नहीं बने थे।

शब्दकार की सौवीं पोस्ट के रूप में डॉ0 अनिल चड्डा की कविताओंतेरा वजूदऔरतेरा इन्तजार को स्थान मिला। इन कविताओं को दिनांक 08 जुलाई 2009 को शब्दकार संचालक द्वारा ही प्रकाशित किया गया था। ध्यातव्य रहे कि तब तक शब्दकार का संचालन सामुदायिक रूप में शुरू नहीं हुआ था।

शब्दकार की दो सौवीं पोस्ट के रूप में भी एक कविता को स्थान मिला और इस बार भी रचनाकार रहे आचार्य संजीवसलिलजी। इस बार उनकी बाल कविता थी बंदर मामा और तारीख रही 30 जनवरी 2010।

शब्दकार की यात्रा धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ रही थी और लगातार रचनाओं को प्रकाशनार्थ संचालक द्वारा मंगवाया भी जा रहा था। शब्दकार के सदस्य साथियों के अलावा भी अन्य ब्लॉगर मित्र अपनी रचनाओं को प्रकाशनार्थ प्रेषित कर रहे थे।

इस बीच वह भी समय आया जबकि शब्दकार में 300 वीं पोस्ट का प्रकाशन हुआ। इस पोस्ट के बारे में विवरण आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं।

सभी सदस्य साथियों को, अन्य मित्रों को जो रचनाएँ प्रकाशनार्थ भेजते हैं, पाठकों को, शब्दकार की रचनाओं पर टिप्पणी करने वालों का आभार, बधाईयाँ और शुभकामनाएँ। आप सभी के सहयोग की इसी तरह आवश्यकता रहेगी। भावी योजनाओं में विचार है कि शीघ्र ही एक शब्दकारआयोजन करवाया जायेगा जिसमें सभी साथियों को आमन्त्रित करके सम्मानित करने की योजना है (यदि आर्थिक संसाधन साथ देते रहे)

शुभकामनाएँ आप भी भेजिए शेष तो भविष्य के गर्भ में छिपा है।

शब्दकार के सदस्य साथी ------
शब्दकार ब्लॉग के समर्थकों की संख्या भी 60 है

10 अप्रैल 2010

"शब्दकार बंद कर दिया जाए" -- अपनी राय जल्द से जल्द दें

क्यों शब्दकार का प्रकाशन बंद कर दिया जाए?

ये सवाल आप सभी (सदस्यों से) से इस कारण पूछा जा रहा है ताकि आप सभी को ये ना लगे कि हमने बिना आपकी सहमति के ऐसा कदम उठाया है
जबसे शब्दकार को सामुदायिक ब्लॉग के रूप में शुरू किया है तब से आचार्य संजीव 'सलिल' जी का आशीर्वाद ही मिलता रहा है, शेष सदस्यों ने बहुत ही बेरुखी दिखाई है

वैसे हम तो इसे बंद करने का मन बना चुके हैं...........आगे आप लोगों का विचार बस जानना है

ये किसी की कोई मजबूरी नहीं कि सदस्यता ली है तो लिखना ही पड़ेगा (कोई लिख भी कहाँ रहा है??) आप सभी का आभार जो आप लोग इससे जुड़े

हमने तो सोचा था कि इसी बहाने हिंदी भाषा, साहित्य के लिए कुछ कर पायेंगे पर.....................

चलिए दिनांक 12-04-10 की शाम 05 बजे तक के लिए आप सभी सदस्यों की और उन पाठकों की रायमांगी जा रही है जो शब्दकार के प्रति रूचि रखते हैं......................
धन्यवाद--
डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
संचालक - शब्दकार

16 फ़रवरी 2010

शब्दकार से सदस्यता समाप्त

बड़े ही अफसोस के साथ सभी सदस्यों को यह जानकारी देनी है कि आज, इसी समय से गार्गी गुप्ता जी की सदस्यता शब्दकार से समाप्त की जा रही है।
बार-बार निवेदन के बाद भी गार्गी गुप्ता जी के द्वारा अंग्रेजी भाषा में विज्ञापन स्वरूपी पोस्ट का लगाना जारी रहा। आज भी उनके द्वारा 53 पोस्ट इस तरह की लगाई गईं।
क्षमा सहित यह बात कहनी पड़ रही है कि शब्दकार की प्रकृति को बचाये रखने के कारण ऐसा कड़ा कदम उठाना पड़ा। आशा है सभी सदस्य इस कदम से अपने सहयोगात्मक स्वरूप में कोई कमी नहीं आने देंगे।

सभी का पुनः आभार सहित
संचालक-शब्दकार

14 फ़रवरी 2010

शब्दकार का पत्रकारिता स्वरूपी ब्लॉग शुरू === एक निगाह का इंतज़ार

नमस्कार साथियो,

विगत कई दिनों से आपसे सम्पर्क स्थापित नहीं कर सके, इसका खेद है। इसके बाद भी आप सभी साथियों की ओर से शब्दकार को नियमित रूप से सहयोग प्राप्त होता रहा है, इसके लिए आप सभी का आभार व्यक्त करना चाहते हैं।

इधर कुछ दिनों से देखने में आ रहा है कि शब्दकार को कुछ इस तरह की मेल मिल रहीं हैं जिनमें किसी संगोष्ठी की सूचना, किसी पुस्तक के विमोचन की खबर, किसी साहित्यकार से सम्बन्धित कोई जानकारी रहती है। इन जानकारियों को शब्दकार में प्रकाशित करने का निवेदन होता है।

चूँकि हमारी दृष्टि में इस तरह की जानकारियों को समाचारों की श्रेणी में रखा जा सकता है और शब्दकार को हम समाचार ब्लाग से अलग हट कर साहित्यिक-सांस्कृतिक ब्लाग के रूप में देखते हैं। शब्दकार से जुड़े सभी साथियों की ओर से भी यही दृष्टि अपनाते हुए इसी तरह की रचनाओं का प्रकशन समय-समय पर होता रहता है। यह उन सदस्यों की सहयोगात्मक प्रवृत्ति का द्योतक है।

पिछले कुछ दिनों से शब्दकार की एक सम्मानित सदस्य गार्गी गुप्ता जी के द्वारा कुछ जानकारी भरी पोस्ट प्रकाशित की जा रहीं हैं, जिन्हें कि हमको शब्दकार की प्रकृति की न होने के कारण बड़े ही भारी मन से हटाना पड़ता है। अपने शब्दकार साथी की मेहनत जाया न हो और जो मित्रगण हमें मेल द्वारा जानकारी भरी, समाचार रूप में जो मेल भेजते हैं उन्हें भी कष्ट न हो, किसी तरह की नाराजी न हो, यह सोचकर शब्दकार का पत्रकारिता भरा स्वरूप भी शुरू कर दिया है। पत्रकारिता से ओतप्रोत इस ब्लाग का नाम भी शब्दकारिता रख दिया है। इस ब्लॉग पर गार्गी गुप्ता जी द्वारा उन कुछ पोस्ट को लगा दिया है जो शब्दकार में प्रकाशित की गईं थीं(आप भी देख लीजिये)

गार्गी जी को मेल के द्वारा इस ब्लाग के बारे में सूचित कर दिया है और सदस्यता आमंत्रण भी भेज दिया है। इसके बाद भी उनके द्वारा शब्दकार पर लगातार जानकारी भरी पोस्ट का प्रकाशन किया जा रहा है। लगता है कि गार्गी जी ने अपना ई-मेल बदल दिया है और नया ई-मेल शब्दकार के पास नहीं है।

आप सभी से निवेदन है कि जो सम्मानित सदस्य गार्गी जी के सम्पर्क में हो वह कृपया उनका नया ई-मेल शब्दकार को प्रेषित करदे। जिससे उन्हें शब्दकारिता के बारे में पुनः जानकारी दी जा सके।

यदि गार्गी जी इस पोस्ट को पढ़ें तो वे स्वयं शब्दकार से सम्पर्क करें ताकि उनकी मेहनत जाया न जाये।

साथ ही आप सभी से निवेदन है और सलाह भी ली जा रही है कि लगातार गार्गी जी द्वारा शब्दकार पर ऐसी समाचार रूपी पोस्ट का प्रकाशन किया जाता रहा तो इसका उपाय क्या होगा? लगातार उन पोस्ट को हटाना हमें स्वयं ही खराब लगता है।

आशा है कि आप सभी हमेशा की तरह शब्दकार की मदद करेंगे।

धन्यवाद सहित

डा0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
संचालक-शब्दकार

29 जनवरी 2010

पुस्तक समीक्षा से सम्बंधित एक ब्लॉग पुस्तक विमर्श

बहुत दिनों से साध थी कि एक ऐसा ब्लाग शुरू किया जाये जिसके माध्यम से पुस्तकों पर चर्चा की जा सके। इधर देखने में आ रहा है कि युवा पीढ़ी लगातार पढ़ने से और अच्छा साहित्य पढ़ने से बच रही है। इसके पीछे एक कारण तो उनके अभिभावकों, गुरुओं अथवा किसी बुजुर्ग द्वारा पुस्तकों के पाठन को प्रेरित न करना है तो एक दूसरा कारण सही पुस्तकों की जानकारी भी न होना है।
इसे पारिवारिक माहौल ही कहिए कि पढ़ने का शौक बचपन से ही बना रहा और उस पर अच्छा काम यह हुआ कि लिखने की बीमारी लग गई। इस लिखने की और हमेशा अच्छा लिखने की बीमारी ने सदैव पढ़ते रहने को प्रेरित किया।
पढ़ने के साथ पंस्तकों की समीक्षा करना, उन पर शोधपरक आलेख तैयार करने ने समीक्षात्मक और आलोचनात्मक दृष्टि भी प्रदान की। इस कारण से भी पुस्तकों पर समीक्षा की दृष्टि से एक शुरूआत करना चाह रहे थे।
ब्लाग (पुस्तक विमर्श) भी बनाया और पुस्तकों की एक लम्बी सूची भी तैयार कर ली, जिन्हें युवाओं को पढ़ना चाहिए। ऐसी पुस्तकों की भी सूची बनाई जिनके द्वारा समाज में इस समय विमर्श की परम्परा चालू है। इसके बाद भी मन में एक कसमसाहट थी कि कोई ऐसी पुस्तक से शुरूआत की जाये जिसके साथ कुछ अपनत्व भरा जुड़ाव हो।

पुस्तक खोजी जा रही थी किन्तु असफलता ही हाथ लग रही थी। ऐसे असमंजस के क्षणों में हमारे भतीजे दीपक ‘मशाल’ ने सारी समस्या ही सुलझा दी। उसके काव्य-संग्रह ‘अनुभूतियाँ’ का विमोचन हुआ तो लगा कि यही वह पुस्तक है जिसके द्वारा ब्लाग (पुस्तक विमर्श) की शुरूआत की जा सकती है।


बस फिर क्या था पुस्तक की समीक्षा कर डाली और बस आज नहीं कल, आज नहीं कल के साथ दिन निकलते जा रहे थे। इसी आज-कल में आदरणीय निर्मला कपिला जी के ब्लाग वीर बहूटी पर अनुभूतियाँ की समीक्षा देखी। इस समीक्षा को देखकर लगा कि हमारा प्रयास तो लगता है निरर्थक गया। समीक्षात्मक और आलोचनात्मक दृष्टि के बाद भी हम इस तरह की समीक्षा में अपने को पारंगत नहीं बना पाये जैसा कि निर्मला कपिला जी ने उदाहरण दिया है।
उनसे अनुरोध करने के बाद उन्होंने सहृदयता के साथ अपनी समीक्षा को पुनः इस ब्लाग (पुस्तक विमर्श) पर पोस्ट करने की अनुमति दी, उनके प्रति आभार। हमारे मन में एक अप्रत्याशित खुशी भी है कि ब्लाग की पहली पोस्ट समीक्षा के रूप में लगने जा रही है हमारे भतीजे के काव्य-संग्रह की और इस पोस्ट को शब्द मिले हैं प्रतिष्ठित ब्लाग सदस्य आदरणीय निर्मला कपिला जी के।
पुनः निर्मला जी का आभार करते हुए आप सभी से काव्य-संग्रह ‘अनुभूतियाँ’ की समीक्षा पढ़ने का निवेदन है। इस समीक्षा को मूल रूप में निर्मला जी के ब्लाग ‘वीर बहूटी’ पर भी यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

23 जनवरी 2010

नेताजी सुभाषचंद्र बोस को आदर्श माने, उनकी मौत को विवाद न बनाएं,

‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा’ ये घोषवाक्य आज भी हमें रोमांचित करता है। यही एक वाक्य सिद्ध करता है कि जिस व्यक्तित्व ने इसे देश हित में सबके सामने रखा वह किस जीवट का व्यक्ति होगा। आज हम उसी जीवट व्यक्तित्व की जयन्ती मना रहे हैं।


कहना न होगा कि सुभाषचन्द्र बोस ने देश हित में एक सच्चा सशस्त्र संघर्ष छेड़ा था। देश के अन्दर उस समय सभी में देश स्वातन्त्रय की इच्छा थी। जो जिस रूप में समृद्ध था वह उसी रूप में देश की आजादी में अपना सर्वस्व न्यौछावर करना चाहता था।



ऐसी स्थिति में नेताजी ने देश के बाहर जाकर आजाद हिन्द फौज का गठन किया और कुशल नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। नेताजी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को यदि देखा जाये तो उनमें प्रखर चिन्तक, कुशल नेतृत्वकर्ता, सच्चे देशभक्त के साथ-साथ अपने बड़ों का सम्मान करना भी दिखता है।

उनके अंग्रेजों के विरुद्ध किये जा रहे कार्य को उनके पिता ने बहुत पसंद नहीं किया था। अपने पिता के सामने अपने आपको साबित करने की दृष्टि से ही उन्होंने उस समय की सबसे प्रतिष्ठित और कठिन परीक्षा आई0 सी0 एस0 को पास किया था। चूँकि नेताजी का लक्ष्य किसी भी तरह से विदेशी नौकरी करना नहीं था उन्हें इस बात को सिद्ध करना था कि उस समय की इस कठिन परीक्षा को कोई हिन्दुस्तानी भी पास कर सकता है।

अपने आपको देश सेवा और देश की आजादी के लिए समर्पित कर चुके नेताजी को जब अंग्रेज खतरा समझने लगे तो उनको नजरबन्द कर दिया गया। ऐसी विपरीत परिस्थिति में नेताजी बिना घबराये अंग्रेजों की नजरबन्दी से भाग निकले और अपने कार्यों से अंग्रेजी सरकार को परेशान करते रहे।

आजाद हिन्द फौज का गठन और उस पर विदेशी धरती पर भारत देश के लिए समर्थन जुटाने जैसा कार्य वही कर सकता था जिसके पर अद्भुत नेतृत्व क्षमता हो। नेताजी ने ऐसा किया भी और तो और महात्मा गाँधी से अपने वैचारिक मतभेदों को भुलाकर नेताजी ने ही पहली बार उनको राष्ट्रपिता की उपाधि से सम्बोधित किया। यह नेताजी का अपने बड़ों के प्रति प्रेम और सम्मान को दर्शाता है।




शायद परिणाम कुछ और ही होना था, इस कारण द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों की पराजय हुई। नेताजी की आजाद हिन्द फौज इसके बाद भी बिना हताशा के युद्ध लड़ती रही। अन्त किसी न किसी रूप में पराजय से हुआ किन्तु नेताजी अंग्रेजों के बीच इस सन्देश को प्रसारित करने में सफल रहे कि अब देश को बहुत दिनों तक गुलाम बनाकर नहीं रखा जा सकता है।

नेताजी ने अपनी रणनीति को बन्द नहीं किया। वे इसके बाद भी एक और प्रयास करने के पक्ष में थे। यही कारण है कि अपनी रणनीतिक यात्रा में वे एक विमान हादसे का शिकार हो गये। यह हादसा भारत देश की आजादी के लिए तो ग्रहण साबित हुआ ही साथ ही नेताजी जैसे व्यक्तित्व के लिए भी एक ग्रहण लेकर आया।

नेताजी के मौत ने कई सवाल खड़े कर दिये। मौत हुई या नहीं? विमान हादसे में हुई या किसी और तरह से? नेताजी देश की आजादी के बाद भी देश में रहे आदि-आदि। कुछ भी हो, नेताजी के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि तो यह होनी चाहिए कि उन्हें बिना किसी विवाद के हम एक आदर्श रूप में स्वीकारें।

यहाँ हमारा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि यदि किसी भी समय यह सिद्ध हो जाता कि फलां व्यक्ति नेताजी हैं तो क्या होता? चूँकि नेताजी को युद्ध अपराधी घोषित किया जा चुका था और उनके सामने आने पर किसी किसी रूप में वैश्विक दवाब में नेताजी को सौंपना होता। क्या यह हमारे लिए स्वाभिमानी कदम होता?

विविध सरकारों द्वारा समय-समय पर आयोग बनाकर नेताजी के सम्बन्ध में जाँच करवाई जाती रही। किसी आयोग द्वारा तो यहाँ तक कहा गया कि जापान के रणकोजी मंदिर में जिस कलश में नेताजी की अस्थियाँ रखीं हैं उनकी डीएनए जाँच करवा कर सिद्ध किया जाये कि ये नेताजी की अस्थियाँ हैं भी या नहीं। इससे क्या सिद्ध होता? जिस कलश को हम नेताजी की अस्थियों के कारण पूज्य मान रहे हैं उसका भी निरादर कर दें।

कुछ भी हो नेताजी की मौत पर विवाद करके हम किसी न किसी रूप में उनकी आत्मा को ही कष्ट पहुँचा रहे हैं। हमें यदि उनको आदर्श सिद्ध करना है तो उनको उसी रूप में स्वीकार करना होगा। हमारा अकसर कहना भी होता है कि जिसे आप खोज सकें तो उसको उसी स्वरूप में स्वीकार करलें जो आपके सामने है। नेताजी की मौत को विवाद न बनाकर उनके कार्यों से प्रेरणा लें। उनको आदर्श बनायें और अपनी युवा पीढ़ी के लिए उनसे कुछ सीखने का वचन लें। यही नेताजी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।