21 मई 2010

आदमी साला बोर क्यूँ होता है यार.....??

आदमी साला बोर क्यूँ होता है यार.....??
ऐय क्या बोलती तू...क्या मैं बोलूं....सुन...सुना....आती क्या खंडाला...क्या करुं...आके मैं खंडाला...अरे घुमेंगे..फिरेंगे...नाचेंगे..गायेंगे...ऐश करेंगे...मौज करेंगे..बोरिंग को तोडेंगे...और क्या....ऐय क्या बोलती तू.......हां...!!चल ना अब तू.......ये आदमी धरती पर एक-मात्र ऐसा जीव है,जो हर कार्य से जल्दी ही बोर हो जाता है और उससे कोई अलग कार्य करने की सोचने लगता है या उस एकरसता से दूर भागने के प्रयास करने लगता है....और कभी-कभी तो उसकी बोरियत इतनी ज्यादा ही बढ जाती है कि वह "छुट्टी" पर चला जाता है,अकेला नहीं बल्कि अपने परिवार और दोस्तों के संग...और वह भी कहां....सुरम्य वादियों में...पहाडों... नदियों ..समंदर के पास...यानि किसी भी ऐसी जगह जो अपनी उस रोजमर्रा की जिंदगी से बिल्कुल अलहदा हो....जहां कि लगे कि कुछ दिन हम अलग सा जीये....इसीलिये यह गाना उसके दिमाग में बजता ही रहता है...चल कहीं दूर निकल जायें....कि कितनी खूबसूरत ये तस्वीर है....ये कश्मीर है....और भी जाने क्या-क्या....और आदमी कुछ दिन घूम-फिरा कर वापस अपने घर लौट आता है....कुछ दिनों के लिए अपने दामन में या कि झोले में खुशियों के कुछ टुकडे लेकर....थोडे दिन तो सब कुछ ठीक-ठाक ही चलता रहता है...मगर उसके बाद फिर वही...ऐय क्या बोलती तू.....!!
आदमी,मैं सोचता हूं,सच में ही है तो बडा ही विचित्र जीव....यदि ऐसा ना होता तो शायद उसे ये तो पता ही होता कि धरती को बने आज अरबों वर्ष हो चुके ....और यह इन अरबों वर्षों से बिना एक पल भी रूके...बिना एक पल को बोर हुए......अपनी धूरी पर चक्कर काटती हुई...सुर्य के चारों और परिक्रमा किये जा रही है....मौसमों और परिवर्तनों का एक-समान चक्र इतने ही वर्षों से चला ही जा रहा है....रोज-ब-रोज बादल बन रहे हैं और कहीं-ना-कहीं बरस रहे हैं....किसी भी पल को यह बोर नहीं होते...अगर एक पल को मान लो कि सिर्फ़ एक पल को ये बोर हो जायें तो.....???...यहां तक कि सूरज नाम का यह आग का भयावह गोला जो धरती से भी ज्यादा बरसों से धधक रहा है....धधकता ही जा रहा है....साला...कभी बोर ही नहीं होता....सेकेंड के एक अरबवें हिस्से के लिये एक दिन-एक बार बोर हो जाये ना... तो सिर्फ़ जिसके चारों और घूमने से धरती पर असंख्य प्रकार का जीवन चक्र चल रहा है....और निर्बाध रूप से चलता ही जा रहा है और यह भी तय है कि आदमी ही अपने कु-कर्मों से इस चक्र की गति को अपने खिलाफ़ भले कर ले.... आदमी के कारण भले कुछ भयावह किस्म की टूट-फूट या परिवर्तन धरती और वायुमंडल में कोई बवंडर भले ही हो जाये .....मगर अपनी और से प्रकृति ऐसा कुछ बदलाव नहीं करती....नहीं ही करती.... और साली कभी बोर ही नहीं होती....पागल है क्या ये साली....??
और आदमी....!!.....इसका बस चले ना.....तो यह घंटों-दिनों-सप्ताहों-महीनों तो क्या....हर पल ही बोर हो जाये....और हर पल ही किसी और ही दुनिया में चला जाये....शायद इसीलिये ही आदमी नाम का यह विचित्र जीव अपने ख्यालों की अपने से भी ज्यादा विचित्र दुनिया में विचरण करता रहता है....करता ही रहता है मगर मजा तो यह है कि यह साला वहां से भी बोर हो जाता है....अब जैसे कि यह कभी छुट्टी मनाने जो कभी बाहर भी जाता है तो वहां भी यह ज्यादा दिन आराम से टिक कर नहीं रह पाता क्योंकि उसे वहां फिर अपनी पुरानी दुनिया के काम याद आने लगते हैं....अपनी नौकरी...अपना बिजनेस...या फिर अपने अन्य दूसरे काम.....!!
तो बाहर-बाहर भले आदमी अपना काम करता हुआ-सा लगता है मगर साथ ही अन्दर-अन्दर वो अपनी किसी और ही दुनिया में गुम भी रहता है...और जब भी उसे अकस्मात चेत होता है....उसे लगता है....अरे मैं तो यहीं था...और अपने आप पर हंसता है आदमी....मैं अक्सर सोचा करता हूं......काश कि आदमी में धरती-सूरज-चांद-तारों-मौसम-जलवायू और प्रकृति के ठहराव का यह गुण आ जाये जिससे कि वह सदा अपने-आप में रह सके....एकरसता में भी सदा के लिये सदाबहार जी सके....मगर पता नहीं आदमी को तो क्या तो होना है....अपन तो उसकी ओर को सदा शुभ-ही-शुभ सोचा करते हैं....पता नहीं आदमी यह शुभ कब सोच पायेगा.....पता नहीं कब आदमी अपना भला कब सोच पायेगा....पता नहीं कब आदमी यह समझ भी पायेगा कि उससे जुडी हुई हैं असंख्य जिन्दगियां.....और जिनसे वो खुद भी उसी तरह जुडा हुआ है... सब एक-दूसरे के प्राणों से जटिलतम रूपों से जुडे हैं....इस नाते सबको अपने ख्याल के साथ-साथ अन्य सबों का भी ख्याल रखना है....जैसे उपर वाला हमारा ख्याल कर रहा है....करता ही चला आ रहा है....और करता ही रहेगा....मगर आदमी को यह होश शायद तब तक नहीं आयेगा....जब तक कि वह खुद अपनी मौत नहीं मर जाता......!

3 टिप्‍पणियां:

शिव कुमार "साहिल" ने कहा…

nice

शिव कुमार "साहिल" ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
डा. हरदीप सँधू ने कहा…

Jee han sahee kha hai aap ne ...
Admee ek esee cheez hai jo jaldee hee 'Bore' ho jata hai. Ek kaam se jaldee hee bhagne lagta hai... har dam us ko 'jaldee' lagee rehtee hai...
Vo maan se 'shaant' nahee hai.. yeh maan kee 'ashantee' hee oose jaldee hee ek kamm se 'Bore' hone ka ehsas karvatee hai.
Hum ko 'Suraj-Chanda-Dhartee' se sheksha laenee chaheae.