07 मार्च 2011

दिव्या गुप्ता जैन का आलेख -- कम से कम अब तो तस्वीर बदलनी चाहिए -- महिला दिवस पर विशेष

कम से कम अब तो तस्वीर बदलनी चाहिए
दिव्या गुप्ता जैन
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सही मायने में महिला दिवस तब ही सार्थक होगा जब समाज में महिलाओं को मानसिक व शारीरिक रूप से संपूर्ण आज़ादी मिलेगी, जहाँ उन्हें कोई प्रताड़ित नहीं करेगा! समाज में हर महत्वपूर्ण निर्णय में उनके नज़रिए को महत्वपूर्ण समझा जायेगा! उन्हें भी पुरुष के सामान एक इंसान समझा जायेगा! जहाँ वह सर उठा कर अपने महिला होने पर गर्व कर सके!

आज भी सच्चाई ये है की जन्म से पहले ही उसे जीने का अवसर बेटे की अपेक्षा काफी कम मिलता है! और अगर दुनिया में आ भी गयी तो पोषण और स्वस्थ्य सुबिधाओ में भारी कमी की जाती है! शिक्षा के मामले में बेटे को गुणवत्तापूर्ण श्रेठ विद्यालय तो बेटी को कम खर्च वाला सरकारी विद्यालय! क्यूंकि हम मानते है की उसे तो आगे चलकर चूल्हा- चौका ही करना है! घर के कामों की जिम्मेदारी उस पर 6 वर्ष से आ जाती है जबकि लड़का 14-15 साल तक भी बाबू ही रहता है!

शादी के निर्णय में लड़कियों को कोई पसंद- नापसंद का अधिकार नहीं दिया जाता जबकि लड़के को ये अधिकार है कि वो कब और किससे शादी करेगा! खेल स्पर्धा में आज भी बहुत सी लडकिया काबिल होते हुए भी परिवार की रजामंदी न होने से हिस्सा नहीं ले पाती! यहाँ तक की राजनीति में भी परिवार के पुरुषो द्वारा महिलाये तब लायी जाती है जब महिला आरक्षित सीट हो या पुरुष किसी केस में फंसा हो! पद पर रखी जाती है महिला और उसकी डोर होती है पुरुष के हाथ!

महिला परिवार को खुशियाँ देने के लिए प्रसव पीड़ा सहे! बच्चो को पाले पोसे! घर के बुजुर्गो का धयान रक्खे! मेहमानों की आवभगत करे! साल भर की गृहस्थी तैयार करे! पर फिर भी हम कहते हैं कि वो कुछ नहीं करती! क्यूंकि हम सिर्फ पैसा कमाने को ही काम मानते है! वो अलग बात है कि महिला 15 घंटे काम करती है और पुरुष 8 घंटे! अब तो हमें सोच बदलनी चाहिए वरना हजारों महिला दिवस आयेंगे और चले जायेंगे!

और महिला बेटी, बहन, भाभी और माँ तो बन जाएगी पर समाज में और इंदिरा गाँधी, किरण बेदी, कल्पना चावला, सुनीता विलियम या सानिया मिर्ज़ा पैदा नहीं हो पाएंगी!

1 टिप्पणी:

ZAROORIHAIINDIA ने कहा…

बहुत सही कहा दिव्या जी ...पर शायद समाज (पुरुषो +महिलाओ सहित ) को स्त्रियों का नाजुक एवं सौन्दर्यात्मक स्वरुप ही स्वीकार है ..
श्रीमती इंदिरा गाँधी ,सुश्री कल्पना चावला ,सुश्री किरण वेदी या सुश्री मायावती सरीखा मज़बूत एवं चुनौतीपूर्ण नही ..?
अपवादों को स्वीकार करना तो सभी की मजबूरी होती ही है ..DEBATE 2 BE CONTINUED..