08 जून 2011

शोभा रस्तोगी 'शोभा' की दो लघुकथाएं

लघुकथा-१
सबसे सुखी

प्रश्न था - 'सबसे सुखी कौन है?'

'मै'- मेरे पास बैंक बेलेंस है 'घर है ,हर सुविधा है '- एक बोला।
'मै भी , ऊंची पोस्ट व धन के साथ कर भी है'-दूसरे का उत्तर था।

'मै' - एक अन्य व्यक्ति ने कहा तो सब हैरानी से बोले-'तुम ?तुम्हारे पास न धन, न घर। ऐसा कुछ भी नहीं जिसे सुख की श्रेणी में रखा जा सके। फिर तुम सुखी ? कैसे?'

'मै सुख -दुःख मै सम-भाव से रहता हूँ । न ज्यादा सुखी न अधिक दुखी।'

सब अचरज में थे।

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लघुकथा-२
रावण की आत्मा

दशहरे के दिन रावन का पुतला जलने के लिए तैयार था। लोक समूह पुतले के इर्द-गिर्द जमा था।
अग्नि-प्रज्वलन के लिए शहर प्रमुख नेता आमंत्रित थे। नियत समय पर नेता के हाथ में मशाल दी गयी।

ज्यों ही नेता ने मशाल पुतले की तरफ बढ़ाई त्यों ही
रावण की आत्मा ने पुतले में प्रवेश किया। उसने हैरत से नेता को देखा। अपने से बड़ा रावण सामने खड़ा पाया। फिर भीड़ में दृष्टि डाली। अपने से कई गुना बड़े अनेक रावण उसे नज़र आये। घबराकर आँखें मूँद ली। चुपके से पुतले में से निकलने में ही भलाई समझी।

नेता ने पुतले को अग्नि के समर्पित कर दिया।

रचनाकार :---
शोभा रस्तोगी 'शोभा'
पालम कालोनी, नई दिल्ली - ७७

3 टिप्‍पणियां:

सुधाकल्प ने कहा…

दोनों लघुकथाओं के नाम बहुत सोच-समझकर रखे हैं।पूर्णता के लिये बस लिखती रहिये ।
सुधा भार्गव

kishor srivastava ने कहा…

Accha laga, badhai..

New Observer Post ने कहा…

'मै सुख -दुःख मै सम-भाव से रहता हूँ । न ज्यादा सुखी न अधिक दुखी।' laghuktha ka yeh paksh behad sundar hai.aam jan-jiwan ka sundar khaka hai.bdhai. kthakar smaaj ke kitne nazdik hai,yeh uske lekhan men saaf dikhai deta hai.shobha ji ko punh bdhai.....