03 अक्तूबर 2010

गाँधी जी का डंडा

कालेज में गाँधी जयंती का कार्यक्रम चल रहा था ।एक पुराने बुजुर्ग सदस्य एक बड़ा सा डंडा लेकर उसके सहारे चलते हुए आये । वाह डंडा क्या था ,उनके कद से एक फिट ऊंची एक नक्काशीदार लाठी थी । लोगों ने मजाक किया की गाँधी जी का डंडा लाये हैं आप । यह तो बहुत बड़ा है ।उन्होंने कहा कि अगर आज गाँधी जी जिन्दा होते तो इतना बड़ा डंडा लेकर ही उन्हें चलना पड़ता तभी लोग उनकी बात सुनते । बात छोटी सी थी थी पर सोचने पर विवश कर गयी । आज डंडे कि भाषा ही जल्दी समझ में आती है आदमी को । कथनी -करनी में अंतर न हो ,यह बात गाँधी ने कही थी पर कौन उसे अपनाना चाहता है ? गाँधी को तो अप्रासंगिक मानते हैं हम लोग

जेब में हैं गाँधी जी .

गाँधी जयंती पर आज हमारे शहर में एक कार्यक्रम गांधीजी के दुर्लभ चित्रों की प्रदर्शनी के रूप में हुआ । प्रदर्शनी नगर के एक संग्रहालय ने लगाई थी जो कि आयोजकों के समर्पण और कड़ी मेहनत का परिणाम थी । इसका उदघाटन प्रदेश सरकार के एक मंत्री ने किया। मंत्री जी कभी आर० एस ० एस ० के कार्यकर्ता रहे थे , अब बसपा के ब्राहमण कार्ड के बदौलत बसपा सरकार में मंत्री हैं । आर ० एस ० एस ० और बसपा दोनों के गाँधी जी के कितने प्रखर आलोचक रहे हैं ,यह सभी को पता है । कार्यक्रम के इस विरोधाभासी पक्ष पर कितने लोगों का ध्यान गया यह पता नहीं पर जब मुख्य अतिथि प्रदर्शनी का अवलोकन कर रहे थे उस समय आयोजन करने वाली संस्था के एक कार्यकर्त्ता ने मंत्री को समझाया कि गाँधी जी हमारे देश में इतने लोकप्रिय हैं कि हमारी जेब में रहते हैं। शायद उनका आशय नोटों पर छपे गाँधी जीके चित्र से था। यह सुन कर प्रदर्शनी देख रहे एक दर्शक ने टिप्पणी कि हमारा दुर्भाग्य है कि हमने गांधीजी को जेब में बंद कर रखा है ,आवश्यकता उन्हें जेब से निकल कर उनके कृतित्व से कुछ सीखने की है ।

3 टिप्‍पणियां:

अशोक बजाज ने कहा…

बहुत बढ़िया .
कृपया इसे भी पढ़े -http://www.ashokbajaj.com/2010/10/blog-post_03.html

शरद कोकास ने कहा…

बढ़िया व्यंग्य है ।

निर्मला कपिला ने कहा…

बढिया कटाक्ष धन्यवाद।
कृ्प्या इसे भी देखें
http://veeranchalgatha.blogspot.com/