11 मई 2011

अशोक जी की कविता -- बेटियाँ


ओस की बूंदों सी होती हैं बेटियाँ !

खुरदरा हो स्पर्श तो रोती हैं बेटियाँ !!


रौशन करेगा बेटा बस एक ही वंश को !

दो - दो कुलों की लाज ढोतीं हैं बेटियाँ !!


कोई नहीं है दोस्तों एक दुसरे से कम !

हीरा अगर है बेटा तो मोती है बेटियाँ !!


काँटों की राह पर खुद चलती रहेंगी !

औरों के लिए फूल ही बोती हैं बेटियाँ !!


विधि का है विधान या दुनिया की है रीत !

क्यों सबके लिए भार होती हैं बेटियाँ !!


धिक्कार है उन्हें जिन्हें बेटी बुरी लगे !

सबके लिए बस प्यार ही संजोती है बेटियाँ






Ashok jangra
Executive DraughtsMan(C)
Architecture Department,
ARCH CONSULTANT
Architect-Engineers,Int.Designers

8 टिप्‍पणियां:

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

प्रेरक रचना पढ़ाने का जो सौभाग्य मुझे दिया उसके लिए साधुवाद!
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सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

वन्दना ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर भाव संजोये हैं…………बेटियाँ ऐसी ही होती हैं।

Arunesh c dave ने कहा…

मन को छू लेने वाली कविता

मनोज कुमार ने कहा…

भाव से भरी कविता मन को छू गई।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ..

Sakshi ने कहा…

AWESOME POEM.......I LIKED IT A LOT...

Rajesh Kumari ने कहा…

pahli baar is blog par aai hoon.Ashok ji ki kavita betiyan padhi.dil ko choo gai.kaash humaare desh me sabhi ka drashtikon betiyon ke prati aap jaisa ho.

निशांत ने कहा…

bahut pyaari rachna ...