15 सितंबर 2009

महेन्द्रभटनागर के गीत और उनका साहित्यिक परिचय


गीति-शिल्पी महेंद्रभटनागर

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पहला उल्लेख-योग्य प्रकाशित गीत — सन् 1945 में।
लब्ध-प्रतिष्ठ साहित्यकार श्री. जगन्नाथप्रसाद `मिलिन्द´ द्वारा सम्पादित `जीवन´ साप्ताहिक पत्र (ग्वालियर) में प्रकाशित :


बहने देना ....

बहने देना आँसू मेरे किन्तु, स्नेह-उपहार न देना!
पथ पर जब मैं रुक-रुक जाऊँ,
प्रति पग पर जब झुक-झुक जाऊँ,
तूफ़ानों से लड़ते - लड़ते
झंझा में फँस कर थक जाऊँ,
गिर-गिर चलने देना मुझको, क्षण-भर भी आधार न देना!
ज्वार उठे सागर में चाहे,
नौका फँसे भँवर में चाहे,
देख घिरी घनघोर घटाएँ
धड़कन हो अन्तर में चाहे,
बढ़ने देना मुझको आगे, हाथों में पतवार न देना!
अंधकारमय जीवन-पथ पर,
कुश-कंटकमय जीवन-पथ पर,
संबल - हीन अकेला केवल,
अपना अन्तस्तल ज्योतित कर,
मैं उठता-गिरता जाऊंगा, सुलभ-ज्योति संसार न देना!
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द्रष्टव्य : कवि का और हिन्दी का प्रथम नवगीत (सन् 1949 में प्रकाशित)। 'अन्तराल' नामक कविता-संग्रह में समाविष्ट (क्र.24) :
री हवा !
री हवा !
गीत गाती आ,
सनसनाती आ,
डालियाँ झकझोरती
रज को उड़ाती आ !
मोहक गंध से भर
प्राण पुरवैया
दूर उस पर्वत-शिखा से
कूदती आ जा !
ओ हवा !
उन्मादिनी यौवन भरी
नूतन हरी इन पत्तियों को
चूमती आ जा !
गुनगुनाती आ,
मेघ के टुकड़े लुटाती आ !
मत्त बेसुध मन
मत्त बेसुध तन
खिलखिलाती, रसमयी,
जीवनमयी
उर-तार झंकृत
नृत्य करती आ !
री हवा !
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महेंद्रभटनागर के गीत
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गाओ
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गाओ कि जीवन - गीत बन जाये !
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हर क़दम पर आदमी मजबूर है,
हर रुपहला प्यार-सपना चूर है,
आँसुओं के सिन्धु में डूबा हुआ
आस-सूरज दूर, बेहद दूर है !
गाओ कि कण-कण मीत बन जाये !
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हर तरफ़ छाया अँधेरा है घना,
हर हृदय हत, वेदना से है सना,
संकटों का मूक साया उम्र भर
क्या रहेगा शीश पर यों ही बना,
गाओ, पराजय - जीत बन जाये !
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साँस पर छायी विवशता की घुटन,
जल रही है ज़िन्दगी भर कर जलन,
विष भरे घन-रज कणों से है भरा
आदमी की चाहनाओं का गगन,
गाओ कि दुख संगीत बन जाये!
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जिजीविषा
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जी रहा है आदमी
प्यार ही की चाह में !
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पास उसके गिर रही हैं बिजलियाँ,
घोर गह-गह कर घहरती आँधियाँ,
पर, अजब विश्वास ले
सो रहा है आदमी
कल्पना की छाँह में !
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पर्वतों की सामने ऊँचाइयाँ,
खाइयों की घूमती गहराइयाँ,
पर, अजब विश्वास ले
चल रहा है आदमी
साथ पाने राह में !
.
बज रही हैं मौत की शहनाइयाँ,
कूकती वीरान हैं अमराइयाँ,
पर, अजब विश्वास ले
हँस रहा है आदमी
आँसुओं में, आह में !
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मोह-माया
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सोनचंपा-सी तुम्हारी याद साँसों में समायी है !
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हो किधर तुम मिल्लका-सी रम्य तन्वंगी,
रे कहाँ अब झलमलाता रूप सतरंगी,
मधुमती-मद-सी तुम्हारी मोहिनी रमनीय छायी है !
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मानवी प्रति कल्पना की कल्प-लतिका बन,
कर गयीं जीवन जवा-कुसुमों भरा उपवन,
खो सभी, बस, मौन मन-मंदाकिनी हमने बहायी है !
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हो किधर तुम , सत्य मेरी मोह-माया री,
प्राण की आसावरी, सुख धूप-छाया री,
राह जीवन की तुम्हारी चित्रसारी से सजायी है !
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चाँद से
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कपोलों को तुम्हारे चूम लूंगा
मुसकराओ ना !
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तुम्हारे पास माना रूप का आगार है,
सुनयनों में बसा सुख-स्वप्न का संसार है,
अनावृत अप्सराएँ नृत्य करती हैं जहाँ,
नवेली तारिकाएँ ज्योति भरती हैं जहाँ,
उन्हीं के सामने जाओ, यहाँ पर
झलमलाओ ना !
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बड़ी खामोश आहट है तुम्हारे पैर की,
तभी तो चोर बन कर, आसमाँ की सैर की,
खुली ज्यों ही पड़ी चादर सुनहरी धूप की
न छिप पायी किरन कोई तुम्हारे रूप की
बहाना अंग ढकने का, लचर इतना
बनाओ ना !
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युगों से देखता हूँ, तुम बड़े ही मौन हो,
बताओ तो ज़रा, मैं पूछता हूँ कौन हो ?
न पाओगे कभी, जा दृष्टि से यों भाग कर
तुम्हारा धन गया है आज आँगन में बिखर,
रुको, पथ बीच, चुपके से मुझे उर में
बसाओ ना !
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कौन हो तुम
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कौन हो तुम, चिर-प्रतीक्षा-रत, आधी अँधेरी रात में !
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उड़ रहे हैं घन तिमिर के
सृष्टि के इस छोर से उस छोर तक,
मूक इस वातावरण को
देखते नभ के सितारे एकटक,
कौन हो तुम, जागतीं जो इन सितारों के घने संघात में !
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जल रहा यह दीप किसका
ज्योति अभिनव ले कुटी के द्वार पर,
पंथ पर आलोक अपना
दूर तक बिखरा रहा विस्तार भर,
कौन है यह दीप, जलता जो अकेला, तीव्र गतिमय वात में !
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कर रहा है आज कोई
बार-बार प्रहार मन की बीन पर,
स्नेह काले लोचनों से
युग-कपोलों पर रहा रह-रह बिखर,
कौन-सी ऐसी व्यथा है, रात में जगते हुए जलजात में !
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सहसा
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आज तुम्हारी आयी याद,
मन में गूँजा अनहद नाद !
बरसों बाद
बरसों बाद !
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साथ तुम्हारा केवल सच था,
हाथ तुम्हारा सहज कवच था,
सब-कुछ पीछे छूट गया, पर
जीवित पल-पल का उन्माद !
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बीत गये युग होते-होते,
रातों-रातों सपने बोते,
लेकिन उन मधु चल-चित्रों से
जीवन रहा सदा आबाद !
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परिचय
जन्म-तिथि : 26 जून 1926, प्रात: 6 बजे।
जन्म-स्थान : झाँसी (उ.प्र.)
कार्य-क्षेत्र : बुन्देलखंड, चम्बल-अंचल, मालवा।
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प्रकाशित काव्य-संग्रह (रचना-क्रमानुसार)
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1 तारों के गीत (प्रकाशन-वर्ष 1949)
2 विहान (1956)
3 अन्तराल (1954)
4 अभियान (1954)
5 बदलता युग (1953)
6 टूटती शृंखलाएँ (1949)
7 नयी चेतना (1956)
8 मधुरिमा (1959)
9 जिजीविषा (1962)
10 संतरण (1963)
11 संवर्त (1972)
12 संकल्प (1977)
13 जूझते हुए (1984)
14 जीने के लिए (1990)
15 आहत युग (1997)
16 अनुभूत क्षण (2001)
17 मृत्यु-बोध : जीवन-बोध (2002)
18 राग-संवेदन (2005)
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संग्रह क्र. 1 से 16 'महेंद्रभटनागर-समग्र' के खण्ड 1,2 और 3 में समाविष्ट।
प्रकाशक : निर्मल पब्लिकेशन्स / अमर प्रकाशन, ए-139, गली क्र. 3, सौ-फुट रोड, कबीरनगर, शाहदरा, दिल्ली - 110 094 / प्रकाशन-वर्ष 2002 / (सम्पूर्ण साहित्य के छह-खण्ड 1800/-)

संग्रह क्र. 1 से 18 'महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा' के खण्ड 1, 2 और 3 में समाविष्ट। प्रकाशक : विस्टा इंटरनेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली (1150/-)
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विशिष्ट

प्रतिनिधि गेय गीतों के संकलन
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बूँद नेह की : दीप हृदय का
प्रथम संस्करण 1967 / नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली

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हर सुबह सुहानी हो!
द्वितीय संस्करण 1984 / सहयोग प्रकाशन, दिल्ली

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महेंद्र भटनागर के गीत
सम्पादक : डा. हरिश्चंद्र वर्मा
तृतीय संस्करण 2001 / प्रकाशक : इंडियन पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली — 7 / गीत-संख्या 120

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गीति-संगीति [द्वि-भाषिक : हिन्दी-अंग्रेज़ी]
चतुर्थ संस्करण 2007 / प्रकाशक : विस्टा इंटरनेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली / गीत-संख्या 125

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गीत-सृष्टि का आदर्श


हृदय सिन्धु मति सीप समाना।
स्वाती सारद कहहिं सुजाना।।
जो बरखै बर बारि बिचारू।
होंहि कवित मुक्ता मनि चारू।।
गीत की परिभाषा
" सूक्ष्म पावन अनुभूतियों-भावनाओं-संवेदनाओं, विराट कल्पनाओं और उदात्त विचारों की सुन्दर सहज स्वत:स्फूर्त संगीतमयी अभिव्यक्ति गीत है। "
— डा. महेंद्रभटनागर
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कवि की गीत-सृष्टि पर विद्वानों के प्रकाशित आलेख :
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1 सिद्ध गीत-शिल्पी डा0 महेंद्र भटनागर
डा. हरिश्चन्द्र वर्मा
2 संवेदनशील भावुक गीतकार महेंद्र भटनागर
डा. सुरेश गौतम

3 डा. महेंद्र भटनागर के काव्य में गीति-तत्त्व
डा. पी. जयरामन
4 महेंद्र भटनागर के गीत

डा. गोविन्द `रजनीश´
5 महेंद्रभटनागर के गीत

डा. वीरेंद्र श्रीवास्तव
6 महेंद्र भटनागर के गीतों में आस्था, जिजीविषा और संघर्ष-चेतना
डा. स्वर्णकिरण

7 कवि महेंद्र भटनागर के गीतों में सामाजिक चेतना
डा. आदित्य प्रचण्डिया

8 महेंद्र भटनागर के गीत
डा. ऋषभदेव शर्मा

9 महेंद्र भटनागर के गीत
डा. ऋषिकुमार चतुर्वेदी

10 महेंद्र भटनागर के गीत
डा. शिववंश पाण्डेय

11 गीतों का सजल-सर्जक महेंद्र भटनागर
कु. निशा शर्मा

12 डा. महेंद्र भटनागर के गीतों में सौन्दर्य-बोध
डा. सूर्यप्रसाद शुक्ल

13 महेंद्रभटनागर की गीति-रचना
डा. रामचंद्र तिवारी

14 सांगीतिक परिप्रेक्ष्य और महेंद्रभटनागर के गीत
डा. पुष्पम नारायण

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महेंद्रभटनागर के गीतों की ऑडियो सी-डी
यशस्वी गायक : कुमार आदित्य विक्रम [मुम्बई]
श्रव्य : www.radiosabrang.com
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शोध-प्रबन्ध
गीति-तत्त्वों के निकष पर महेंद्रभटनागर के गीत
शोधकर्त्री : कुमारी पी. एषि़ल नाच्चियार
[दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, चेन्नई (तमिलनाडु) / 2003]

साक्षात्कार / प्रश्‍न : डा. सुरेश गौतम द्वारा :
गीत-संदर्भ (`महेंद्र भटनागर-समग्र´ खण्ड 5 में सम्मिलित)

2 टिप्‍पणियां:

KUMAR ADITYA VIKRAM ने कहा…

गीति-शिल्पी महेंद्रभटनागर के साथ आपने मेरी सी-डी का भी उल्लेख किया; अनेक धन्यवाद!
गीतों के ‍रिकॉर्ड्‌स [एम-पी - ३] भेजना चाहता हूँ। साउंड सिस्टम तो होगा ही।
*कुमार आदित्य विक्रम
मुम्बई

ओस की बूँद ने कहा…

bahut sundar tarah se parichay diya gayaa hai. SHABDKAR team ko badhai.