16 अगस्त 2009

सरस्वती वन्दना: आचार्य सन्जीव 'सलिल'

गीत

संजीव 'सलिल'

अम्ब विमल मति दे

हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....

नन्दन कानन हो यह धरती।
पाप-ताप जीवन का हरती।
हरियाली विकसे.....

बहे नीर अमृत सा पावन।
मलयज शीतल शुद्ध सुहावन।
अरुण निरख विहसे.....

कंकर से शंकर गढ़ पायें।
हिमगिरि के ऊपर चढ़ जाएँ।
वह बल-विक्रम दे.....

हरा-भरा हो सावन-फागुन।
रम्य ललित त्रैलोक्य लुभावन।
सुख-समृद्धि सरसे.....

नेह-प्रेम से राष्ट्र सँवारें।
स्नेह समन्वय मन्त्र उचारें।
'सलिल' विमल प्रवहे.....

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4 टिप्‍पणियां:

कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपका आशीष मिला। आभार कह कर इसे कम नहीं करेंगे। आपके आने से शब्दकार को नई राह मिलेगी।

अर्चना तिवारी ने कहा…

हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....

सुंदर वंदना

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

bahut sundar...

vipin kumar pandey ने कहा…

bahut achhi vandana hai.