17 अप्रैल 2009

डॉ0 वीरेन्द्र सिंह यादव की पुस्तक - पर्यावरण : वर्तमान और भविष्य

लेखक - डॉ० वीरेन्द्र सिंह यादव का परिचय यहाँ देखें
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अध्याय-5 = जल प्रदूषण, रोकथाम एवं संरक्षण के उपाय
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मानव सभ्यता का प्रादुर्भाव ही जल से हुआ है। अपनी सभ्यता की विकास यात्रा में मानव ने वहीं निवास करना पसंद किया जहाँ उसे जल की पर्याप्त मात्रा बड़ी सुगमता से उपलब्ध हो जाये। अर्थात् गांव बसें, नदियों, नालों, स्रोतों, नहरों एवं झीलों किनारे और शहरों को बड़ी नदियों के किनारे बसाने का कार्य किया गया। जल की इस उपलब्धता और जीवनदायी शक्ति के कारण साहित्य में कहा भी गया है कि ‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून, पानी गये न उबरे मोती माखन चून’ और वास्तविकता भी है कि ‘जल, प्राणियों, वनस्पतियों के जीवन तथा अन्य प्रक्रियाओं का आधार स्तम्भ स्रोत माना जाता है। जल की अनुपस्थिति होने पर पृथ्वी पर जीवन की कल्पना सम्भव नही हैं। प्रकृति ने हमें यदि खारा जल दिया है तो उसके साथ हमें मीठा जल भी प्रदान किया है। इसे विडम्बना कहा जाये या विशेषता वह यह कि पृथ्वी का तीन चैथाई भाग पानी से अच्छादित होने के बाद भी हमें पीने लायक पानी मात्र 3 प्रतिशत ही उपलब्ध होता है। परन्तु विडम्बना की बात यह है कि 3 प्रतिशत जल भी उपयोगिता एवं गुणवत्ता खोता जा रहा है। क्योंकि उद्योगों के हानिकारक उत्सर्जित व्यर्थ पदार्थ, घरेलू मल व कचरा, रासायनिक उर्वरक व कीटनाशक व अनेक पदार्थ कैल्शियम, मैग्नीशियम के योगिक प्राकृतिक स्रोतों से जल में घुल जाते हैं। इसके साथ ही प्रोटोजोआ, जीवाणु तथा अन्य रोगाणु जल को प्रदूषित कर रहे हैं।
जल प्रदूषण से तात्पर्य हम उस जल से समझते हैं जिसमें कोई विजातीय (घुलनशील अथवा अघुलनशील) वस्तु मिल गयी हो और जिसमें वस्तुतः उसके भौतिक, रासायनिक एवं जैविक तत्वों में परिवर्तन आ जाने के कारण उसके मौलिक गुणों में भी परिवर्तन आ गया हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जल प्रदूषण की परिभाषा इस प्रकार से दी है - ‘बाह्य पदार्थ चाहे वे प्राकृतिक स्रोतों से हों अथवा अन्य स्रोतों से जलापूर्ति के साथ प्रदूषित होते हैं और अपने जहरीलेपन, जल के घटे आक्सीजन स्तर, स्वाद में अपेय प्रभावों तथा महामारी फैलाने के कारण, जीवन के लिए हानिकारक होते हैं।’’
दूसरे पश्चिमी पर्यावरणविद् साउथविक के अनुसार प्रदूषण का अर्थ है ‘जल के रासायनिक, भौतिक एवं जैविक गुणों का हास जो मानव क्रियाओं तथा प्राकृतिक प्रक्रियाओं जो जल संसाधन मे अपघटित एवं वनस्पति तथा अपक्षय पदार्थों को मिलाती हैं के द्वारा उत्पन्न होता है।’ एक अन्य विद्वान गिलपिन ने जल प्रदूषण को निम्न तरह से परिभाषित किया है ‘जल के रासायनिक, भौतिक तथा जैविक गुणों में मुख्य रूप से मानव क्रियाओं द्वारा उत्पन्न गिरावट जल प्रदूषण कहलाती है।’ स्पष्ट है कि जल का प्रदूषण चाहे कार्बनिक पदार्थों द्वारा होता हो या अकार्बनिक पदार्थों द्वारा जो मानव के साथ-साथ पशु तथा पौधों को हानि पहुँचाता हो। जल प्रदूषण कहलाता है। इसी तरह की परिभाषा सं. रा. अमेरिका के राष्ट्रपति की विज्ञान/सलाहकार समिति, वाशिंगटन ने जल प्रदूषण की परिभाषा दी है - ‘जल प्रदूषण जल के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों में परिवर्तन है जो मानव तथा जल जीवन में हानिकारक प्रभाव उत्पन्न कर सकता है।’
प्रदूषण के कारण प्रकृति द्वारा उपलब्ध कराये गये जल में जब अशुद्धियाँ मिल जाती हैं तब उनके भौतिक गुणों के साथ-साथ रंग, गंध, प्रकाश भेधता, स्वाद और तापमान में परिवर्तन आ जाता है इसका प्रमुख कारण यह है कि रासायनिक पदार्थों के कारण अम्लीय, क्षारीय तथा खारा शीघ्र हो जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में 70 प्रतिशत से अधिक जल प्रदूषित हो गया है। हमारे देश में 14 बड़ी, 44 मध्यम तथा अनेक छोटी नदियों में लगभग 1645 घन किमी. पानी प्रवाहित होता है। आज ऐसी कोई नदी नहीं शेष है जो प्रदूषण की चपेट में न आ गयी हो। अकेले पवित्र राम की गंगा के 2500 किमी लम्बे रास्ते में लगभग 20 लाख किग्रा कचरा प्रतिदिन गिरता है।

जल प्रदूषण के प्रकार
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भौतिक प्रदूषण
रासायनिक प्रदूषण
जैविक प्रदूषण

जल अपनी विशिष्टता के कारण विशिष्ट पहचान रखता है। क्योंकि स्वच्छ एवं पेयजल पारदर्शी, रंगहीन तथा गंधहीन होता है और इसमें पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन घुली होती है और यह हानिकारक रसायनों तथा जीवाणुओं से मुक्त भी होता है परन्तु जल में भौतिक प्रदूषण के कारण इसका रंग, स्वाद, पारदर्शिता (गंदलापन) गन्ध, विद्युत चालकता एवं सूक्ष्म जीवों का प्रवेश हो जाता है।
रासायनिक परिवर्तन में जल प्रदूषण के मूल्यांकन का आधार जल की गुणवत्ता में आये परिवर्तन से आंका जाता है। साधारण शुद्ध जल का पी. एच. मान 7 से 8.5 तक होता है। जब पी. एच. मान 6.5 से कम अथवा 9.2 से अधिक हो जाता है। तब जल अशुद्ध अथवा प्रदूषित हो जाता है क्योंकि इसमें जल की अम्लीयता, क्षारीयता, घुलित आक्सीजन में परिवर्तित होती है। यह कार्बनिक एवं अकार्बनिक दोनों प्रदूषकों द्वारा होता है।
जैविक प्रदूषण वह होता है जो जीवाणुओं के द्वारा फैलता है यह जैविक प्रदूषण मनुष्य, पालतू एवं जंगली पशुओं से उत्सर्जित पदार्थो के छोड़े जाने से उत्पन्न होता है। जीवाणुओं से प्रदूषित यह जैविक जल प्रदूषित होकर जब मानव एवं पशुओं में प्रवेश करता है तब उनमें अनेक तरह की बीमारियां हो जाती हैं। जिनमें मनुष्य में होने वाली प्रमुख बीमारिया दस्त, उल्टी, आत्र शोध तथा हैजा प्रमुख है।

जल के मुख्य प्रदूषक तत्व
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1- फ्लोराइड 2- सीसा 3- पारा 4- फिनोल 5- सोडियम
6- जस्ता 7- नाइट्राइड 8- पेथोसेनिक 9- वैक्टीरिया 10- आर्मेनिज्म
11- कैल्शियम 12- मैग्नीशियम 13- अपमार्जक 14- घरेलू कचरा 15- रेडियोधर्मी कचरा

जल प्रदूषण के कारण
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वैसे तो जल प्रदूषण के पीछे कई कारण हैं। परन्तु मनुष्य द्वारा जरूरत से ज्यादा संसाधनों का दोहन इसका प्रमुख कारण है। इन सबके अलावा ऐसे कुछ परम्परा से हटकर अप्राकृतिक कारण भी हैं जो जल प्रदूषण को बढ़ावा दे रहे हैं। बढ़ती आबादी के साथ अधिक अन्न की आवश्यकता के लिए मनुष्य ने उद्योगों को बढ़ाया और इसकी पूर्ति ने अप्रत्यक्ष रूप से जल प्रदूषण में भारी वृद्धि की। इस तरह देखें तो प्रदूषण मुख्यतः दो प्रक्रमों से घटित होता है।
1. प्राकृतिक प्रक्रम द्वारा
2. मानवीय प्रक्रम द्वारा

प्रकृति प्रदत्त प्रक्रम द्वारा तब प्रदूषण फैलता है जब उसमें सड़ी-गली वस्तुएँ, जीव, जन्तु, वनस्पति आदि पदार्थ जल स्रोत में मिल जाते हैं और जल की मूल प्रकृति को प्रदूषित कर देते हैं।

मानवीय प्रक्रमों द्वारा जल प्रदूषण
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मनुष्य को अपने प्रतिदिन के कार्य करते समय पता ही नहीं चलता है कि (यह जो नहाने, कपड़े धोने, भोजन पकाने बर्तन मांजने का) उसके द्वारा ऐसी गलती हो रही है जो क्षम्य नहीं है, परन्तु घर से यह निकला पानी सीवरेज लाइन में जाकर मिलता है और सीवरेज किसी नदी या नहर में मिलकर जल प्रदूषण को व्यापकता प्रदान करती है।
अपमार्जन द्वारा भी जल प्रदूषण आज की गम्भीर समस्या है। घर एवं आफिसों तथा सार्वजनिक भवनों की सफाई एवं बर्तनों में प्रयुक्त होने वाला पाउडर, फिनायल, डिटोल, कीटाणुनाशक नहाने एवं कपड़े धोने में प्रयुक्त होने वाले साबुन के अपर्माजक जब जल के साथ नदियों, नालों तथा तालाबों में पहुँचते हैं तो जल प्रदूषण और अधिक बढ़ जाता है। शवों के द्वारा भी जल प्रदूषण तेजी से फैल रहा है। प्राचीन हिन्दू परम्परा के अनुसार शवों को जलाकर या ऐसे ही नदियों में प्रवाहित करने की परम्परा परिलक्षित है। यही नहीं कुछ लोग पशुओं को भी नदियों में प्रवाहित या फेंक देते हैं। जिससे नदियों का जल प्रदूषित हो जाता है। जली, अधजली लाशें एवं इसकी अग्नि की राख नदियों के तापमान में वृद्धि कर इसे बुरी तरह से आज भी प्रदूषित करने में लगे हुए हैं।
बाहित मल मूत्र भी मानव नदी, नालों, तालाबों में फेंककर जल प्रदूषण कर रहा है। इसके प्रत्यक्ष उदाहरण यमुना का दिल्ली में काला पानी है। इसके साथ ही अन्य अनेक झीलें एवं गंगा जैसी पवित्र नदी के पानी में भी प्रदूषण शुरू हो गया है।
कृषि से सम्बन्धित पदार्थ जब जल से मिलते हैं तब जल प्रदूषण बढ़ जाता है। उत्पादन बढ़ाने के लिए खेतों में रासायनिक खादों, कीटनाशी जीवाणुओं को मारने वाली दवा, खरपतवारनाशी आदि डाले जाते हैं तो इनकी मात्रा भूमि में भी बढ़ जाती है जो कि पानी के माध्यम से बहकर नदी, तालाबों एवं नालों में पहुँच जाते हैं। इससे जल जीवों एवं मानव पर हानिकारक प्रभाव पड़ने लगता है।
ईधनों के जल में मिलने से वह दूषित हो जाता है जिनमें से कोयला, पेट्रोल, डीजल आदि के जलने से विषैली गैसें उत्पन्न हो जाती हैं जो जल में घुलकर अनेक तरह के प्रदूषण को जन्म देती हैं।
रेडियोधर्मी पदार्थों को जब ऊर्जा के रूप में प्रयोग किया जाता है तब उनके विस्फोट से अनेक तरह के घातक विकिरण जल में घुलकर जल प्रदूषण को जन्म देते हैं। इसी तरह से जब जल को शुद्ध किया जाता है तो उसमें अनेक तरह के रासायनिक तत्वों को मिलाया जाता है। इन रासायनिक तत्वों की कम ज्यादा मात्रा जल को प्रदूषित कर देती है।
खनिज तेलों का समुद्र में जहाजों के दुर्घटना ग्रस्त होने से रिसाव हो जाने के कारण भारी मात्रा में जल प्रदूषण हो जाता है, यही तेल जब मिट्टी के माध्यम से बाहर आता है तो जल के साथ-साथ हमारी नदियों, नालों एवं तालाबों में भी जल प्रदूषित हो जाता है।
जल के बढ़ते इस प्रदूषण से इतना तो स्पष्ट है कि मानव केवल अपनी सुख सुविधा को ध्यान में रखकर एवं तीव्र भौतिक विकास की लालसा वश ही यह सब कर रहा है। उसे नहीं मालूम कि वह जिस जल का अंधाधुंध प्रयोग कर रहा है उसके अब परम्परागत स्रोतों में सूखा पड़ रहा है और विश्व बैंक की पानी पर आने वाली रिपोर्ट ने भी यह बात साफ कर दी है। फिर प्रश्न उठता है कि आखिर जल प्रदूषण की रोकथाम एवं संरक्षण के क्या भावी उपाय हो सकते हैं जो हमारे भविष्य को उज्जवल दिशा की ओर ले जाएं।
पीने योग्य पानी में प्रदूषक तथा अन्य तत्वों की स्वीकार्य सीमा
(Tolerance Limits of Pollutants and Other Elements in Potable Drinking Water)
क्र.गुण/पदार्थ सहन सीमा
BIS* स्तर ICMR** स्तर
1. रंग, हेजेन यूनिट्स 10 5-25
2. गंध - -
3. स्वाद - -
4. पीएच मान 6.5-8.45 7-8.5
5.लोहा (मिग्रा/ली.) 0.3 0.3
6.कैलशियम (मिग्रा/ली.) 75 75
7.मैगनेशियम (मिग्रा/ली.) 30 50
8.मैंगनीज (मिग्रा/ली.) 0.1 0.1
9.सल्फेट्स (मिग्रा/ली.) 150 200
10.क्लोराइड्स (मिग्रा/ली.) 250 200
11.फिनोलिक यौगिक (मिग्रा/ली.)0.001 0.001
12.सीसा (मिग्रा/ली.) 0.01-0.1 0.01-0.1
13.आर्सेनिक (मिग्रा/ली.) 0.05 0.05
14.सेलेनियम (मिग्रा/ली.) 0.01 0.01
15.कैडमियम (मिग्रा/ली.) 0.01 0.01
16.क्रोमियम (मिग्रा/ली.) 0.01 0.01
17.पारा (मिग्रा/ली.) 0.001 0.001
18.चाँदी (मिग्रा/ली.) 0.01 0.01
19.बैनम (मिग्रा/ली.) 0.1 0.1
20.साइनाइड्स (मिग्रा/ली.) 0.05 0.05
21.नाइटेटस (मिग्रा/ली.) 15 20
22.फ्लोराइड्स (मिग्रा/ली.) 0.6-1.2 1.0
23.जस्ता (मिग्रा/ली.) 5.0 5.0
24.कठोरता 300 300
* BIS : Bureau of Indian Standard
**ICMR : Indian Council of Medical Research

जल प्रदूषण की रोकथाम एवं संरक्षण के उपाय
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अंग्रेजी की कहावत ‘प्रेवेन्शन इज वेटर दैन क्योर’ अर्थात् जल प्रदूषण पर नियंत्रण करने का सबसे सही तरीका तो यही है कि इसे प्रदूषित ही न किया जाये लेकिन ऐसा कर पाना अति कठिन कार्य है। हालाँकि भारत सरकार ने जल प्रदूषण नियंत्रण एवं संरक्षण कानून सन् 1974 में निर्मित किया परन्तु भारत में अशिक्षा, स्वार्थपरता, अनिवार्य आर्थिक विकास एवं जनसंख्या वृद्धि के कारण जल प्रदूषण कम नहीं हो सका। फिर भी जल प्रदूषण को निम्न विधियों के प्रयोग से अपनाकर दूर किया जा सकता हैं -
1.औद्योगिक इकाइयों व घरेलू उत्सर्जित दूषित जल को (शोधन) के उपरांत ही नदी या सरोवर में छोड़ा जाना चाहिए।
2.तालाबों, नदियों में कपड़े-धोने व पशुओं को नहलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाये जाने चाहिए।
3.बचा हुआ भोजन, कागज, सड़ती हुई वनस्पति तथा प्लास्टिक को खुले नाले-नालियों में नहीं फेंकना चाहिए।
4.मृत मनुष्य की लाशों एवं पशुओं के शवों को जल के स्रोतों में न बहाया जाये।
5.ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक से अधिक साझा-शौचालयों का निर्माण कराया जाए एवं खुले मैदान में शौच के लिए प्रतिबंध लगाया जाए।
6.जल की शुद्धता से सम्बन्धी नई तकनीक विकसित की जाए एवं इसको शुद्ध करने वाले जीवों को संरक्षण दिया जाए।
7.जल में उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों जिससे कई प्रमुख है इसे जल में पनपने का अवसर नहीं दिया जाये।
8.मद्यनिर्माणशाला से निकलने वाले पदार्थों तथा जैविक युक्त ठोस वज्र्य पदार्थ को वायोगैस सयंत्र में पहुँचाकर उनसे ऊर्जा का उत्पादन किया जाना चाहिए।
9.नदियां, समुद्र एवं जल की अन्य सतहों पर बनी तेल रिसाव की परत को चूषण तकनीक द्वारा हटा देना चाहिए। इसके साथ ही सतह पर रिसाव से फैले हुए तेल के अवशोषण हेतु लकड़ी के बुरादे का प्रयोग किया जाना चाहिए।
10.रेडियो टेलीविजन, समाचार पत्र-पत्रिकाओं एवं विभिन्न विज्ञापनों के माध्यम से जल प्रदूषण के खतरों एवं इसके कुप्रभावों का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए। शिक्षा के माध्यम से कालेजों एवं विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों में शोध परिचर्चा, संगोष्ठियों एवं प्रदर्शनियों के माध्यम से आने वाली नयी पीढ़ी को जागरूक करना चाहिए।
11.जल को राष्ट्रीय सम्पत्ति का दर्जा संविधान में देकर इसे प्रदूषित करने वालों के विरूद्ध कठोर कार्यवाही सुनिश्चित करना चाहिए।

भारत सरकार ने 23 मार्च, 1974 को जल प्रदूषण को रोकने के उद्देश्य से इस अधिनियम को लागू किया जिसके प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं।
1.वर्तमान एवं भावी उपयोगें के लिए जल को प्रदूषण से बचाना।
2.प्रदूषण स्रोतों के लिए न्यूनतम राष्ट्रीय मानक लागू करना।
3.नए उद्योगों की अवस्थिति को नियंत्रित करना।
4.जल के पुनश्चक्र एवं पुनरूपयोग को प्रोत्साहित करना।
5.जल की समस्याओं तथा गुणवत्ता की मानीटरिंग करना।
6.जल प्रदूषण नियंत्रण के लिए प्रशिक्षण देना एवं जनशिक्षा का प्रसार करना।
7.अनुदान, परामर्श एवं कानूनी कार्यों द्वारा जल प्रबन्ध को प्रोत्साहित करना।
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सम्पर्कः
वरिष्ठ प्रवक्ता: हिन्दी विभाग
दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय
उरई-जालौन (उ0प्र0)-285001
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2 टिप्‍पणियां:

DR.MANISH KUMAR MISHRA ने कहा…

aap ka blog bahut hi achha hai,

aj ने कहा…

sir aapka lekh jal pradushan pada acha laga aapne isme achi jankari di thanks