23 अप्रैल 2009

कृष्ण कुमार यादव की पुस्तक की समीक्षा - अनुभूतियाँ और विमर्श

विचारों की दस्तावेजी धरोहर
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निबन्ध क्या है, क्या नहीं, इस पर विद्वानों में मतभेद हो सकते हैं। पहला तो यह है कि निबन्ध का एक रूप वह है जिसे व्यवहार में लेख कहा जाता है किन्तु इधर निबन्ध की जो परिभाषा हुई है, उसमें लेखक की वैयक्तिक अनुभूति और शैलीगत विशिष्टता को विशेष महत्व दिया जाता है। हिन्दी में दोनों प्रकार के निबन्ध मिलते हैं।

समीक्ष्य निबन्ध संग्रह ‘अनुभूतियाँ और विमर्श’ में युवा लेखक व भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव ने व्यक्तित्व व कृतित्व, संस्कृतिक प्रतिमानों व समसामयिक मुद्दों पर लिखे गये अपने 15 लेखों को निबन्ध संग्रह के रूप में संकलित कर प्रस्तुत किया गया है। इस संग्रह के व्यक्तित्व व कृतित्व आधारित लेखों मे देश के मूर्धन्य साहित्यकारों व मनीषियों - मुंशी प्रेमचन्द, राहुल सांकृत्यायन, मनोहर श्याम जोशी, अमृता प्रीतम व डा0 अम्बेडकर के जन्म से महाप्रयाण तक के सफर को क्रमशः लिपिबद्ध कर बिखरे मनकों को एकत्र कर माला के रूप में तैयार कर उनके जीवन-संघर्ष व भारतीय समाज में योगदान को रेखांकित करने का सार्थक प्रयास किया गया है। राष्ट्रीयता से ओतप्रोत इन पात्रों पर लिखे गये निबंधों के अध्ययन से परतन्त्र भारत के दौर की उन घटनाओं की याद ताजा हो जाती है, जिनके द्वारा देशवासियों में पराधीनता के समय राष्ट्रीय चेतना की ज्योति जलायी गयी थी।

संग्रह के दूसरे खण्ड में भारतीय संस्कृति के प्रतिमान विषयक लेखों में ‘नारी शक्ति के उत्कर्ष में समाज में नारी-विकास के विभिन्न चरणों की व्याख्या करते हुए वर्तमान परिवेश में नारी जगत द्वारा प्राप्त की जा रही उँचाईयों को इंगित किया गया है, चाहे वह पंचायती राज द्वारा हो या घरेलू महिला हिंसा अधिनियम द्वारा हो या रूढ़िवादी वर्जनाओं के तोड़ने द्वारा हो। ‘इतिहास के आयाम’ में लेखक ने ऐतिहासिक धरोहरों के महत्व को परिभाषित करते हुए, हाल के दिनों में इतिहास पुर्नलेखन को लेकर उठते सवालों के बीच इतिहास की विभिन्न धाराओं को रेखांकित किया है। ‘भारतीय परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता’ लेख में पाश्चात्य व भारतीय सन्दर्भों में धर्म की तुलनात्मक महत्ता को रेखांकित करते हुए भारतीय समाज में धर्म के अवदानों व विभिन्न समयों में धार्मिक एकता को दर्शाते हुए अन्ततः संवैधानिक उपबन्धों के माध्यम से वर्तमान समाज में धर्म का विश्लेषणात्मक विवेचन किया गया है। लेखक का कथन बड़ा सटीक है कि- ‘‘तुष्टीकरण की नीतियों के बीच हमने एक धर्मनिरपेक्ष राज्य को तो अपना लिया है पर धर्मनिरपेक्षता अभी तक हमारे सामाजिक जीवन का अंग नही बन पायी है।’‘ ‘भारतीय संस्कृति और त्यौहारों के रंग’ इस संग्रह का सबसे लम्बा लेख है। इसमें लेखक ने देश के कोने-कोने में मनाये जाने वाले महत्वपूर्ण त्यौहारों, इनके पीछे छिपी मान्यताओं, रीति-रिवाजों और ऐतिहासिक घटनाओं, उनको मनाने के ढंगों में विविधता और उनकी प्रासंगिकता पर रोचक ढंग से प्रकाश डाला है। लेखक ने इस लेख के माध्यम से अन्ततः सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता व अखण्डता एवं त्यौहारों- पर्वों को मनाने की मूल मानवीय भावनाओं को संजोने की कोशिश की है। ‘भूमण्डलीकरण के दौर में हिन्दी’ के जरिये लेखक ने देश में राष्ट्रभाषा की वर्तमान दशा और दुर्दशा का खाका खींचकर इतिहास के पन्नों से इसका कारण भी ढूँढ़ने की चेष्टा की है। यही नहीं लेखक ने यह तथ्य भी उद्धृत किया है कि ब्रिटेन में 1560 ई0 में देवनागरी में छपाई का कार्य आरम्भ हो चुका था जबकि तब तक वह भारत में हाथ से ही लिखी जा रही थी। लेखक ने विभिन्न देशों में हिन्दी भाषियों की चर्चा करते हुए वर्तमान संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी के दौर में हिन्दी की कार्य-संस्कृति को बढ़ावा देने पर बल दिया है, जो लेखक के राष्ट्र भाषा प्रेम को उजागर करता है।

‘युवाः भटकाव की स्थिति क्यों’ में लेखक ने विश्लेषण किया है कि आखिर युवाओं में भटकाव क्यों पनप रहा है? लेखक ने सीधे शब्दों में कहा है -‘‘आदर्श नेतृत्व ही युवाओं को सही दिशा दिखा सकता है, पर नेतृत्व ही भ्रष्ट हो तो युवाओं का क्या?’‘ लेखक का मानना है कि आज का युवा संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहा है, ऐसे में उन्हें रचनात्मक कार्यों की ओर उन्मुख करने की जरूरत है। वहीं युवाओं को भी लेखक ने मोहरे के रूप में स्वयं का उपयोग रोकने के प्रति चेतावनी दी है। ‘भूमण्डलीकरण के दौर में तेजी से बढ़ते भारतीय कदम’ में लेखक ने 1990 के बाद अर्थव्यवस्था में तेजी से आये उछाल को रेखंकित किया है और उद्घोषणा की है कि - ‘‘भारत को एक बार फिर से जगद्गुरु की भूमिका निभाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।‘‘ इसी तरह ‘ब्राण्ड इमेज की महत्ता’ में दर्शाया गया है कि कैसे आधुनिक उपभोक्तावादी समाज में आवश्यकताओं की बजाय ब्राण्ड नेम और उनके स्टार प्रचारक ज्यादा महत्वपूर्ण हो गये हैं। उपभोक्ताओं को नित प्राप्त होते विकल्पों के बीच भटकाव के रास्ते भी बढ़े हैं। ‘इण्टरनेट का बढ़ता प्रभाव’ में लेखक ने इण्टरनेट के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए अमेरिका द्वारा इसके संचालन पर कब्जे की कोशिशों के बीच इण्टरनेट के गुण-अवगुणों की चर्चा की है। ‘कोचिंग संस्थाओं का फैलता मायाजाल’ में कोचिंग संस्थानों द्वारा अपनायी जाने वाली तकनीकों एवं उनके मायाजाल में फँसते सामान्य विद्यार्थियों की दुर्दशा पर प्रकाश डाला गया है, वहीं कोचिंग व्यवस्था के चलते विद्यालयों में अध्यापन के गिरते स्तर पर भी चिन्ता व्यक्त की गयी है।

समीक्ष्य कृति में साहित्यिक निबन्ध को निबन्धों का एक वर्ग मान लेने के कारण कई निबन्ध पुस्तक में शामिल किये गये हैं, वे भी विधामूलक प्रश्न खड़ा करते हैं। वैसे कृष्ण कुमार यादव ने अपनी भूमिका में इसके अंतर को बारीकी से प्रस्तुत किया है, जो नयी दृष्टि-दिशापरक है। निबन्ध रचनाओं में भले ही विषय की कोई सीमा न रहे पर रचना की प्रक्रिया और शैली की विशिष्टता तो माननी ही पडे़गी और वही उसकी विधापरक कसौटी भी हो सकती है। कृष्ण कुमार यादव उत्कृष्ट निबंध रचना के लिये वैयक्तिकता, अनुभूति, विशिष्ट शैली, कल्पना शक्ति आदि तत्वों को स्वीकार करते हैं और संकलन के अधिकतर निबंध इस कसौटी पर खरे उतरते हैं। यह एक सच्चाई है कि वर्तमान में लिखे जा रहे लेखों और निबन्धों में अन्तर का मात्र एक झीना आवरण रह गया है पर कभी-कभी विधा की बजाय उनमें सन्निहित तत्व प्रमुख हो जाते हैं। ऐसे में जब हिन्दी में स्वयं निबन्ध को लेकर दोहरे मानदण्ड चल रहे हों, कृष्ण कुमार यादव के सभी निबन्धों को इसी भाव से देखे जाने की जरूरत है।

कुल मिलाकर कृष्ण कुमार यादव का अल्प समय में यह दूसरा निबंध संग्रह ‘अनुभूतियाँ और विमर्श’ एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है जो बडे़ श्रम, विवेक और विशेषता के साथ साध्य हुयी है। निबंध के स्वरूप विवेचन में ही नहीं बल्कि उनके सम्पादन में भी लेखक ने अपनी शोधपरक दृष्टि द्वारा विषय-वस्तु को ऐतिहासिक तारतम्य की चासनी के साथ परोस कर अपनी लेखनी के कौशल का परिचय दिया है, जो निश्चय ही पाठकों के लिए उपयोगी बन पड़ा है। यह संकलन हिन्दी निबन्ध के जिस पूरे परिदृश्य का एहसास कराता है वह निबंध कला के भावी विकास का सूचक है। यह एक दस्तावेजी निबंध संग्रह है, जो विचारों की धरोहर होने के कारण संग्रहणीय भी है।
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पुस्तक : अनुभूतियाँ और विमर्श (निबन्ध संग्रह)
लेखक : कृष्ण कुमार यादव
मूल्य : 250/-
प्रकाशक : नागरिक उत्तर प्रदेश, प्लाट नं0 2,
नन्दगाँव रिजार्टस्, तिवारीगंज,
फैजाबाद रोड, लखनऊ-226019
समीक्षक : सर्वेश कुमार ‘सुयश’,
ए- 1802, आवास विकास कालोनी, हंसपुरम्, नौबस्ता, कानपुर

5 टिप्‍पणियां:

Ratnesh ने कहा…

के.के. यादव लिख ही नहीं रहे हैं, बल्कि खूब लिख रहे हैं. एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ-साथ अपनी व्यस्तताओं के बीच साहित्य के लिए समय निकलना और विभिन्न विधाओं में लिखना उनकी विलक्षण प्रतिभा का ही परिचायक है. इस निबंध-संग्रह के लिए के. के. जी को शत्-शत् बधाइयाँ. बस यूँ ही लिखते रहें, जमाना आपके पीछे होगा के.के. जी.................!

Ratnesh ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
अरशद मंसूरी ने कहा…

कृष्ण कुमार जी का यह निबंध-संग्रह वाकई नए प्रतिमानों की स्थापना करता है...सर्वेश जी ने बेहद उम्दा समीक्षा प्रस्तुत की है.

डाकिया बाबू ने कहा…

‘अनुभूतियाँ और विमर्श’ जैसे उत्तम संकलन के बारे में शब्दकार पर पढ़कर अच्छा लगा.

Rashmi Singh ने कहा…

मनुष्य एक विचारवान प्राणी है। उसे साहित्य, समाज और परिवेश से प्राप्त मानस संवेदनों के सन्देशों से जिन अनुभूतियों की उपलब्धि होती है, उनके ही विमर्श से नई-नई व्याख्याओं को आधार मिलता है। कृष्ण कुमार यादव का निबंध संग्रह ‘‘अनुभूतियाँ और विमर्श’’ इसी चिन्तन, मनन और विवेचन को आधार देती मानसी वृत्ति का परिणाम है