19 जनवरी 2010

डॉ0 जयजय राम आनन्द के दोहे -- सन्नाटे में गाँव

बाग़ बगीचे गाँव में,खो बैठे पहचान
आम जाम जामुन हुए,बाज़ारों की शान.
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पीपल बरगद नीम ने,खींच लिए हैं हाथ
हमने ही जबसे दिया,नीलामी का साथ.
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ताल तलैया नहर के,बदल गए हैं पाट
अन्धकार में रौशनी, लिए गाँव में हाट.
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गायब सब पगदंदियाँ,खा चकबंदी मार
सड़कें जोडें गाँव के,अब शहरों से तार.
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सड़क गाँव को ले गई, फुटपाथों की छाँव
संनते में भटकते,छानी छप्पर गाँव.
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अत पात पीले झरे,खड़े पेड़ सब ठूंठ
जगर मगर सब शहर की,गयी गाँव से रूठ.
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ठिठुर ठिठुर ठंडा हुआ,होरी धनिया गाँव
रातरात भर तापता,जान बचाय अलाव.
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घर आँगन बरसात में,कीचड दलदल गाँव
पछताते नर नारियाँ,जामे रोग के पाँव.
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जमींदार खोखल हुए,बेंचे खाएं खेत
धन दौलत इज्ज़त हुई,ज्यों मुठ्ठी में रेत.
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जिनके घर में थी नहीं,कौडी भून्जीं भांग
हाथ पसारे गाँव की,पूरी करते मांग.
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भूमिहीन हैं गाँव में,ऋण से लदे किसान
दानों को मुहताज है,संकट में ईमान.
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बांग न मुर्गों की मिले,बन बागन में मोर
जकडे सारे गाँव को,बाघ भेड़िया शेर.
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घर आँगन खलियान का,बदल गया भूगोल
गली गली में डोलता, राजनीति भूडोल.
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तोप तमंचा गोलियाँ,घर घर चौकीदार
पकड़ फिरौती मांग में,शामिल रिश्तेदार.
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शाम ढले कपने लगे,थर थर सारा गाँव
द्वार देहरी में बधें, नर नारी के पाँव.
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कहाँ न जाने खो गए, रेशम से सम्बन्ध
खान पान अनुराग के, भंग हुए अनुबंध.

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डॉ० जयजय राम आनंद
भोपाल

1 टिप्पणी:

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने कहा…

दोहे पढ़ आनंद के, मिलता है आनंद.
भैया जयजय राम जी, नित लिखिए नव छंद..