12 जनवरी 2010

मौत

आज मैंने मौत को देखा
अर्द्धविक्षिप्त अवस्था में हवस की शिकार
वो सड़क के किनारे पड़ी थी
ठण्डक में ठिठुरते भिखारी के
फटे कपड़ों से वह झांक रही थी
किसी के प्रेम की परिणति बनी
मासूम के साथ नदी में बह रही थी
नई-नवेली दुल्हन को दहेज की खातिर
जलाने को तैयार थी
साम्प्रदायिक दंगों की आग में
वह उन्मादियों का बयान थी
चंद धातु के सिक्कों की खातिर
बिकाऊ ईमान थी
आज मैंने मौत को देखा ।






5 टिप्‍पणियां:

शब्दकार-डॉo कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

Marmik drishya kheencha hai aapne........

ersymops ने कहा…

के.के. साहब, दिल को कचोटती कविता.

ersymops ने कहा…

के.के. साहब, दिल को कचोटती कविता.

Dr. Brajesh Swaroop ने कहा…

यह सिर्फ कविता नहीं, एक सच्चाई है...बेहद सुन्दर भाव-चित्र...बधाई हो यादव जी.

Rashmi Singh ने कहा…

मार्मिक व सार्थक कविता.