23 जनवरी 2010

नेताजी सुभाषचंद्र बोस को आदर्श माने, उनकी मौत को विवाद न बनाएं,

‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा’ ये घोषवाक्य आज भी हमें रोमांचित करता है। यही एक वाक्य सिद्ध करता है कि जिस व्यक्तित्व ने इसे देश हित में सबके सामने रखा वह किस जीवट का व्यक्ति होगा। आज हम उसी जीवट व्यक्तित्व की जयन्ती मना रहे हैं।


कहना न होगा कि सुभाषचन्द्र बोस ने देश हित में एक सच्चा सशस्त्र संघर्ष छेड़ा था। देश के अन्दर उस समय सभी में देश स्वातन्त्रय की इच्छा थी। जो जिस रूप में समृद्ध था वह उसी रूप में देश की आजादी में अपना सर्वस्व न्यौछावर करना चाहता था।



ऐसी स्थिति में नेताजी ने देश के बाहर जाकर आजाद हिन्द फौज का गठन किया और कुशल नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। नेताजी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को यदि देखा जाये तो उनमें प्रखर चिन्तक, कुशल नेतृत्वकर्ता, सच्चे देशभक्त के साथ-साथ अपने बड़ों का सम्मान करना भी दिखता है।

उनके अंग्रेजों के विरुद्ध किये जा रहे कार्य को उनके पिता ने बहुत पसंद नहीं किया था। अपने पिता के सामने अपने आपको साबित करने की दृष्टि से ही उन्होंने उस समय की सबसे प्रतिष्ठित और कठिन परीक्षा आई0 सी0 एस0 को पास किया था। चूँकि नेताजी का लक्ष्य किसी भी तरह से विदेशी नौकरी करना नहीं था उन्हें इस बात को सिद्ध करना था कि उस समय की इस कठिन परीक्षा को कोई हिन्दुस्तानी भी पास कर सकता है।

अपने आपको देश सेवा और देश की आजादी के लिए समर्पित कर चुके नेताजी को जब अंग्रेज खतरा समझने लगे तो उनको नजरबन्द कर दिया गया। ऐसी विपरीत परिस्थिति में नेताजी बिना घबराये अंग्रेजों की नजरबन्दी से भाग निकले और अपने कार्यों से अंग्रेजी सरकार को परेशान करते रहे।

आजाद हिन्द फौज का गठन और उस पर विदेशी धरती पर भारत देश के लिए समर्थन जुटाने जैसा कार्य वही कर सकता था जिसके पर अद्भुत नेतृत्व क्षमता हो। नेताजी ने ऐसा किया भी और तो और महात्मा गाँधी से अपने वैचारिक मतभेदों को भुलाकर नेताजी ने ही पहली बार उनको राष्ट्रपिता की उपाधि से सम्बोधित किया। यह नेताजी का अपने बड़ों के प्रति प्रेम और सम्मान को दर्शाता है।




शायद परिणाम कुछ और ही होना था, इस कारण द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों की पराजय हुई। नेताजी की आजाद हिन्द फौज इसके बाद भी बिना हताशा के युद्ध लड़ती रही। अन्त किसी न किसी रूप में पराजय से हुआ किन्तु नेताजी अंग्रेजों के बीच इस सन्देश को प्रसारित करने में सफल रहे कि अब देश को बहुत दिनों तक गुलाम बनाकर नहीं रखा जा सकता है।

नेताजी ने अपनी रणनीति को बन्द नहीं किया। वे इसके बाद भी एक और प्रयास करने के पक्ष में थे। यही कारण है कि अपनी रणनीतिक यात्रा में वे एक विमान हादसे का शिकार हो गये। यह हादसा भारत देश की आजादी के लिए तो ग्रहण साबित हुआ ही साथ ही नेताजी जैसे व्यक्तित्व के लिए भी एक ग्रहण लेकर आया।

नेताजी के मौत ने कई सवाल खड़े कर दिये। मौत हुई या नहीं? विमान हादसे में हुई या किसी और तरह से? नेताजी देश की आजादी के बाद भी देश में रहे आदि-आदि। कुछ भी हो, नेताजी के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि तो यह होनी चाहिए कि उन्हें बिना किसी विवाद के हम एक आदर्श रूप में स्वीकारें।

यहाँ हमारा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि यदि किसी भी समय यह सिद्ध हो जाता कि फलां व्यक्ति नेताजी हैं तो क्या होता? चूँकि नेताजी को युद्ध अपराधी घोषित किया जा चुका था और उनके सामने आने पर किसी किसी रूप में वैश्विक दवाब में नेताजी को सौंपना होता। क्या यह हमारे लिए स्वाभिमानी कदम होता?

विविध सरकारों द्वारा समय-समय पर आयोग बनाकर नेताजी के सम्बन्ध में जाँच करवाई जाती रही। किसी आयोग द्वारा तो यहाँ तक कहा गया कि जापान के रणकोजी मंदिर में जिस कलश में नेताजी की अस्थियाँ रखीं हैं उनकी डीएनए जाँच करवा कर सिद्ध किया जाये कि ये नेताजी की अस्थियाँ हैं भी या नहीं। इससे क्या सिद्ध होता? जिस कलश को हम नेताजी की अस्थियों के कारण पूज्य मान रहे हैं उसका भी निरादर कर दें।

कुछ भी हो नेताजी की मौत पर विवाद करके हम किसी न किसी रूप में उनकी आत्मा को ही कष्ट पहुँचा रहे हैं। हमें यदि उनको आदर्श सिद्ध करना है तो उनको उसी रूप में स्वीकार करना होगा। हमारा अकसर कहना भी होता है कि जिसे आप खोज सकें तो उसको उसी स्वरूप में स्वीकार करलें जो आपके सामने है। नेताजी की मौत को विवाद न बनाकर उनके कार्यों से प्रेरणा लें। उनको आदर्श बनायें और अपनी युवा पीढ़ी के लिए उनसे कुछ सीखने का वचन लें। यही नेताजी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

1 टिप्पणी:

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने कहा…

आत्मीय!

वन्दे मातरम.

क्या सच को सच कहना विवाद पैदा करना है?,

क्या विवाद न हों इस आशंका से सच कहा भी न जाए?

क्या यह सच नहीं है की १९४७ में नेताजी को प्रिजनर ऑफ़ वार्स की सूची में रखा गया था और उनके मिलते ही पकड़कर मित्र सेनाओं को सौंपने की शर्त पं. नेहरु ने स्वीकार की थी.?

क्या यह सच नहीं है कि अटल सरकार के समय गठित आयोग ने नेताजी की तथाकथित अस्थियों को उनकी नहीं माना?

क्या यह सच नहीं है कि भारत, रूस और इंग्लॅण्ड कि सरकारों ने नेताजी से सम्बन्धित बहुत से दस्तावेज और नस्तियाँ मुखर्जी आयोग को नहीं दिए?

क्या यह सच नहीं है कि जिस विमान की दुर्घटना में नेताजी का निधन होने की बात कही जाती है, आयोग ने पाया की वह कभी उड़ा ही नहीं था?

क्या यह सच नहीं है कि राम भवन अयोध्या के गुमनामी बाबा के निधन के बाद उनके सामान में नेताजी की कई वस्तुएँ, दुर्लभ चित्र, संबंधियों के पत्र, सैन्य सामग्री, हस्तलिपि में कागजात, गोपनीय नक़्शे आदि मिले थे?

क्या यह सच नहीं है कि गुमनामी बाबा से मिलने नेताजी के परिवारजन न केवल आते थे, जन्मदिन पर उपहार भी भेजते थे.

क्या यह सच नहीं है कि भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग कि अनुशंसाओं को महज इसलिए नहीं स्वीकार कि उसने नेताजी के निधन की पुष्टि नहीं की थी ?