29 दिसंबर 2010

नीता पोरवाल की कविता -- ये ख्वाइश क्यूँ हैं....

ये ख्वाइश क्यूँ हैं....
---------------------------------

आज फिर ये वावरी पलके नम क्यू है
सावन की बदरी सी झरती
नन्ही बूंदों को चुन - चुन के हथेली पे सजाये कोई
ये ख्वाइश क्यूँ है

तपती- दुपहरी वीरान- राहें
बेकल पंछी से भटकते तन को छाँव बन के आये कोई
ये ख्वाइश क्यूँ है

तेज़ हवाएं तूफानी मौजें
भंवर में डोलती कश्ती से मन को साहिल तक ले जाये कोई
ये ख्वाइश क्यूँ है

महसूस की उनकी मौजूदगी हर ज़र्रे में हमने
अब मुझे भी मेरे होने का अहसास दिलाये कोई
ये ख्वाइश क्यूँ है

गर वादा किया तो साथ निभाया भी हमने
दो कदम मेरे भी साथ चल कर दिखाए कोई
ये ख्वाइश क्यूँ है

तेरी यादों के चरागों को हर पल रोशन रखा हमने
अब मेरे अंधियारे दिल में भी चराग जलाए कोई
ये ख्वाइश क्यूँ है

तेरी बेरुखी को भी ग़ज़ल सा गुनगुनाया हम ने
अब नीता के बेसुरे गीत भी गुनगुनाये कोई
ये ख्वाइश क्यूँ है

----------------
नीता पोरवाल

4 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

हज़ारों ख्वाहिशे ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले……………बस ये भी उनमे से एक है……………सुन्दर प्रस्तुति।

Payal ने कहा…

Mind Blowing..

kullu da laconic one........ ने कहा…

It's really heart touching........

alka ने कहा…

wow,
kya baat hai,
kya depth hai...
maan gaye!