16 जनवरी 2011

तभी नाम ये रह जायेगा....


जीवन था मेरा बहुत ही सुन्दर,
भरा था सारी खुशियों से घर,
पर ना जाने क्या हो गया
कहाँ से बस गया आकर ये डर.
पहले जीवन जीने का डर,
उस पर खाने-पीने का डर,
पर सबसे बढ़कर जो देखूं मैं
लगा है पीछे मरने का डर.
सब कहते हैं यहाँ पर आकर,
भले ही भटको जाकर दर-दर,
इक दिन सबको जाना ही है
यहाँ पर सर्वस्व छोड़कर.
ये सब कुछतो मैं भी जानूं,
पर मन चाहे मैं ना मानूं,
होता होगा सबके संग ये
मैं तो मौत को और पर टालूँ.
हर कोई है यही सोचता,
मैं हूँ इस जग में अनोखा,
कोई नहीं कर पाया है ये
पर मैं दूंगा मौत को धोखा.
फिर भी देखो प्रिये इस जग में जो भी आया है जायेगा,
इसलिए भले काम तुम कर लो तभी नाम ये रह जायेगा.

5 टिप्‍पणियां:

shikha kaushik ने कहा…

bahut shandar prastuti .

वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (17/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

रचना दीक्षित ने कहा…

जीवन का फलसफा निखर कर आया है

संजय भास्कर ने कहा…

वाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.

Kailash C Sharma ने कहा…

फिर भी देखो प्रिये इस जग में जो भी आया है जायेगा,
इसलिए भले काम तुम कर लो तभी नाम ये रह जायेगा.

बहुत सुन्दर सार्थक प्रस्तुति..