20 जनवरी 2011

देवी नागरानी की ग़ज़ल

ग़ज़ल : १

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बस्तियाँ भी परेशाँ-सी रहती वहाँ

आदमी आदमी से ख़फा है जहाँ

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मौत की बात तो बाद की बात है

ज़िन्दगी से अभी तक मिली हूँ कहाँ?

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देर से ही सही दिल समझ तो गया

वक़्त की अहमियत हो रही है जवाँ

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भीड़ रिश्तों की चारों तरफ़ है लगी

ख़ाली फिर भी है क्यों मेरे दिल का मकाँ?

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खेलते हैं खुले आम खतरों से जो

हौसलों ही पे उनके टिका है जहाँ

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दिल के आकाश में देखा जो दूर तक

कहकशाँ से परे भी थी इक कहकशाँ


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ग़ज़लः2

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मौन भाषा को हमारी तर्जुमानी दे गया

एक साकित-से क़लम को फिर रवानी दे गया

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वलवले पैदा हुए हैं फिर मेरे एहसास में

जाने वाला मुस्करा कर इक निशानी दे गया

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दाँव पर ईमान और बोली ज़मीरों पर लगी

कोई शातिर शहर को यूँ बेईमानी दे गया

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डूब कर ही रह गई हूँ आँसुओं की बाढ़ में

ग़म का बादल हर तरफ पानी ही पानी दे गया

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उसके आने से बढ़ी थीं रौनकें चारों तरफ

जब गया तो वो हमें दर्दे-निहानी दे गया

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दे गया जुंबिश मिरे सोए हुए जज़्बात को

मुझकोदेवीआज कोई ज़िन्दगानी दे गया


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देवी नागरानी
मुम्बई

2 टिप्‍पणियां:

shikha kaushik ने कहा…

bahut achchhi lagi dono hi gazal .har sher apne me ek arth liye tha .badhai.

Devi Nangrani ने कहा…

Shikhaji
aapke utsahan bhare shabd mere liye bahut maaine rakhte hain. Tahe dil se aabhaar