10 जनवरी 2011

देवी नागरानी की गज़लें

ग़ज़लः१

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यूँ हवा आके पत्ते उड़ा ले गई

शाख़े -गुल को भी आख़िर दग़ा दे गई

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किस क़दर मुन्तज़िर बज़्म में थे सभी

हर नज़र दस्तकों की सदा दे गई

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साफ़ इन्कार करना तो अच्छा था

कुछ उमीदों का वो सिलसिला दे गई

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जो समझती रही वो नहीं तू रहा

तेरी पहचान तेरी जफ़ा दे गई

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मौज घबराके टकराई साहिल से यूँ

आनेवाला है तूफाँ, पता दे गई.

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शोखियों का इरादा धरा रह गया

मेरी मुस्कान मुझको दग़ा दे गई

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हिज्र की आग में दिल सुलगता रहा

याद रह -रह के देवी हवा दे गई


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ग़ज़लः २

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पंछी थे प्यार के यहाँ जाने कहाँ उड़े

वीरान करके बस्तियाँ क्यों दूर जा बसे

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वो क्या हैं, लोग खुद को कभी देखते नहीं

उंगली उठाके और पे हँसते सदा रहे

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सपनों में आशियाँ तो बने प्यार के बहुत

लेकिन हक़ीक़तों से वो टकराके कब बचे

.

कुछ दिक्क़तें थीं बीच में दीवार की तरह

वो सिलसिले मुसीबतों के कम हो सके

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हर ज़िंदगी के वार से ख़ुद को बचा लिया

लेकिन कज़ा के सामने मजबूर हो गये

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जो दे पनाह दिल को मेरे वह मिला नहीं

बस दर- -दर की ठोकरों में हम पले-बढ़े

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देवी नागरानी

मुम्बई

1 टिप्पणी:

shikha kaushik ने कहा…

bhavon ko samete bahut kuchh kahti v byan karti dono gazal achchhi lagi .badhai .