27 जुलाई 2009

डॉ0 अनिल चड्डा की दो रचनाएँ - "स्पंदन" एवं "संस्कार"



(1) स्पंदन
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मेरे ह्रदय के स्पंदन से
एक तरंग उठी
भावनाओं में ढ़ल कर
शब्द-बद्ध हुई
इसे समझने को
न केवल मेरी दृष्टि ही
बल्कि चाहिए
मेरे ह्रदय का सा स्पंदन
और चाहिए
भावना ऐसी ही
किन्तु भावना-शून्य यह जग
क्या समझ पाये गा
इन शब्दों में छुपी
मेरे अन्तस की प्रताड़ना को
जो सह्स्त्रों सदियों में भी
अंगीकार न कर पाया हो
व्यथा
अपने से
परन्तु, मूक व बघिर प्राणी की
क्या समझ पायेगा वो जग !
ह्रदय में गुंथी भावना को
क्या समझ पायेगा वो जग
शब्दों में छुपी भावना को !!

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(2) संस्कार
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मैं आदतन
उन पर भरोसा कर बैठा
उन्होने आदतन
भरपूर की दगा
पर
कैसी शिकायत
किससे शिकायत
दोनों ने ही तो किया
अपने-अपने संस्कार का निर्वाह !
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डा0अनिल चड्डा
http://anilchadah.blogspot.com
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