08 जुलाई 2009

डॉ0 महेन्द्र भटनागर के काव्य संग्रह "राग-संवेदन" की दो कवितायें - "सार-तत्त्व" और "निष्कर्ष"



(13) सार-तत्त्व
.........................
सकते में क्यों हो,
अरे!
नहीं आ सकते
जब काम
किसी के तुम —
कोई क्यों आये
पास तुम्हारे?
चुप रहो,
सब सहो!
पड़े रहो
मन मारे,
यहाँ-वहाँ!
.
कोई सुने
तुम्हारे अनुभव,
कोई सुने
तुम्हारी गाथा,
नहीं समय है
पास किसी के!
निष्फल —
ऐसा करना
आस किसी से!
.
अच्छा हो
सूने कमरे की दीवारों पर
शब्दांकित कर दो,
नाना रंगों से
चित्रांकित कर दो
अपना मन!
शायद, कोई कभी
पढ़े / गुने!
या
किसी रिकॉर्डिंग-डेक में
भर दो
अपनी करुण कहानी
बख़ुद ज़बानी!
शायद, कोई कभी
सुने!
.
लेकिन
निश्चिन्त रहो —
कहीं न फैले दुर्गन्ध
इसलिए तुरन्त
लोग तुम्हें
गड्ढ़े में गाड़ / दफ़न
या
कर सम्पन्न दहन
विधिवत्
कर देंगे ख़ाक / भस्म
ज़रूर!
विधिवत्
पूरी कर देंगे
आख़िरी रस्म
ज़रूर!

...........................
(14) निष्कर्ष
.........................
ऊहापोह
(जितना भी)
ज़रूरी है।
विचार-विमर्श
हो परिपक्व जितने भी समय में।
.
तत्त्व-निर्णय के लिए
अनिवार्य
मीमांसा-समीक्षा / तर्क / विशद विवेचना
प्रत्येक वांछित कोण से।
.
क्योंकि जीवन में
हुआ जो भी घटित —
वह स्थिर सदा को,
एक भी अवसर नहीं उपलब्ध
भूल-सुधार को।
.
सम्भव नहीं
किंचित बदलना
कृत-क्रिया को।
.
सत्य —
कर्ता और निर्णायक
तुम्हीं हो,
पर नियामक तुम नहीं।
निर्लिप्त हो
परिणाम या फल से।
(विवशता)
.
सिद्ध है —
जीवन : परीक्षा है कठिन
पल-पल परीक्षा है कठिन।
.
वीक्षा करो
हर साँस गिन-गिन,
जो समक्ष
उसे करो स्वीकार
अंगीकार!
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डा. महेंद्रभटनागर,
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2 टिप्‍पणियां:

'अदा' ने कहा…

आपने जीवन के सारे अनुभवों को शब्दों का जामा पहना दिया है, एक-एक शब्द मूल्यवान है, सभी कुछ कहती जाती है, कही भावः अपना पैनापन लिए हुए हैं, तो कहीं लाचारी,
इसे कविता कहना उचित नहीं, यह जीवन का मर्म है,
यह तो गागर में सागर है...

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने कहा…

सशक्त, मन को छूती और ज़िन्दगी के अनुभवों का सार प्रस्तुत करती रचनाओं हेतु साधुवाद.