06 मार्च 2009

आकांक्षा यादव की दो कवितायें

मैं अजन्मी


मैं अजन्मी
हूँ अंश तुम्हारा
फिर क्यों गैर बनाते हो
है मेरा क्या दोष
जो, ईश्वर की मर्जी झुठलाते हो
मै माँस-मज्जा का पिण्ड नहीं
दुर्गा, लक्ष्मी औ‘ भवानी हूँ
भावों के पुंज से रची
नित्य रचती सृजन कहानी हूँ
लड़की होना किसी पाप की
निशानी तो नहीं
फिर
मैं तो अभी अजन्मी हूँ
मत सहना मेरे लिए क्लेश
मत सहेजना मेरे लिए दहेज
मैं दिखा दूँगी
कि लड़का से कमतर नहीं
माद्दा रखती हूँ
श्मशान घाट में भी अग्नि देने का
बस विनती मेरी है
मुझे दुनिया में आने तो दो।


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21वीं सदी की बेटी


जवानी की दहलीज पर
कदम रख चुकी बेटी को
माँ ने सिखाये उसके कर्तव्य
ठीक वेसे ही
जैसे सिखाया था उनकी माँ ने
पर उन्हें क्या पता
ये इक्कीसवीं सदी की बेटी है
जो कर्तव्यों की गठरी ढोते-ढोते
अपने आँसुओं को
चुपचाप पीना नहीं जानती है
वह उतनी ही सचेत है
अपने अधिकारों को लेकर
जानती है
स्वयं अपनी राह बनाना
और उस पर चलने के
मानदण्ड निर्धारित करना।

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आकांक्षा यादव
प्रवक्ता, राजकीय बालिका इण्टर कालेज
नरवल, कानपुर -209401
e-mail - kk_akanksha@yahoo.com

11 टिप्‍पणियां:

Ratnesh ने कहा…

बहुत उम्दा कवितायेँ और सारगर्भित प्रस्तुति. आकांक्षा जी को ढेरों शुभकामनायें !!

Bhanwar Singh ने कहा…

ये इक्कीसवीं सदी की बेटी है
जो कर्तव्यों की गठरी ढोते-ढोते
अपने आँसुओं को
चुपचाप पीना नहीं जानती है
.....Aj ki nari ko sahi likha apne.

Bhanwar Singh ने कहा…

लड़की होना किसी पाप की
निशानी तो नहीं
फिर
मैं तो अभी अजन्मी हूँ
....समाज की मानसिकता पर चोट करती अद्भुत कविता.

Ram Shiv Murti Yadav ने कहा…

मैं अजन्मी
हूँ अंश तुम्हारा
फिर क्यों गैर बनाते हो
है मेरा क्या दोष
जो, ईश्वर की मर्जी झुठलाते हो
....लाजवाब है आकांक्षा की यह प्रस्तुति.

Yuva ने कहा…

इन कविताओं को पढ़कर मैं इतना भाव-विव्हल हो गया हूँ कि शब्दों में बयां नहीं कर सकता.

Yuva ने कहा…

महिला दिवस पर युवा ब्लॉग पर प्रकाशित आलेख पढें और अपनी राय दें- "२१वी सदी में स्त्री समाज के बदलते सरोकार" ! महिला दिवस की शुभकामनाओं सहित...... !!

Rashmi Singh ने कहा…

आकांक्षा जी की इन कविताओं के मर्म को समझते हुए यदि कोई एक व्यक्ति भी वास्तव में आपने में परिवर्तन ला सका तो इसकी सार्थकता होगी.

KK Yadav ने कहा…

शब्दकार पर नारी की आवाज को बुलंद करती आकांक्षा जी की बेहतरीन कवितायेँ. जज्बा है समाज की रुढियों को तोड़ने का.

Dr. Brajesh Swaroop ने कहा…

इक्कीसवीं सदी की बेटी की आवाज बुलंद करती भावपूर्ण कविता. इस भावपूर्ण कविता हेतु आकांक्षा जी को बधाई.

डाकिया बाबू ने कहा…

मत सहना मेरे लिए क्लेश
मत सहेजना मेरे लिए दहेज
मैं दिखा दूँगी
कि लड़कों से कमतर नहीं
.....बहुत कुछ कह जाती हैं ये पंक्तियाँ. इनमें मारक क्षमता है.

Ratnesh ने कहा…

कविता के बहाने यह रचना उस सच को बयां करती है, जिसे जानते हुए भी तथाकथित सभ्य समाज नजरें चुराता है. आकांक्षा जी की लेखनी की धार नित तेज होती जा रही है...साधुवाद स्वीकारें !!