13 मार्च 2009

सीताराम गुप्ता की लघुकथा - पगड़ी

भाई ईश्वरदयाल ने फोन पर फूफाजी के निधन की सूचना दी, ''भाई अशोक! पिताजी नहीं रहे। कल तेरहवीं है। अंतिम दिनों में पिताजी तुझे बहुत याद करते रहे। उन्होंने कई बार कहा कि अशोक से मिलने की बहुत इच्छा है अशोक को बुला दो पर तेरा फोन नंबर ही नहीं मिल पाया। आज मुश्किल से किसी तरह मिल पाया है तेरा नंबर। खैर! जैसी प्रभु की इच्छा। अच्छा, हमारी बुआ के लड़के जयप्रकाश को तो जानते ही हो उसका नंबर भी नहीं मिल पा रहा है। यदि तेरे पास कहीं लिखा हो तो ज़रा देखना।’’

मैंने डायरी में देखकर जयप्रकाश का पता और फोन नंबर भाई ईश्वरदयाल को लिखवा दिया। फूफाजी मुझसे बहुत स्नेह रखते थे। अंतिम समय में फूफाजी से न मिल पाने का दुख हुआ लेकिन इससे भी ज़्यादा दुख इस बात का हुआ कि भाइयों ने मुझे बुलाया क्यों नहीं। बुआजी का घर बमुश्किल पन्द्रह-सोलह किलोमीटर की दूरी पर होगा हमारे घर से। फिर बुआजी के पाँच बेटे और तीन बेटियाँ हैं। आना-जाना भी लगा ही रहता है। जब फूफाजी की मुझसे मिलने की इतनी इच्छा थी और हमारा फोन नंबर उन्हें मिल नहीं रहा था तो क्या कोई भाई आ के नहीं बुला ले जा सकता था मुझे?

हम सपरिवार तेरहवीं पर पहुँचे। बड़ा बेटा होने के नाते भाई ईश्वरदयाल को पगड़ी बाँधी गई। रस्म पगड़ी के बाद धीरे-धीरे सभी आगंतुक चले गए। हम भी चलने की तैयारी कर ही रहे थे कि भाई ईश्वरदयाल ने अपने सभी भाइयों को संबोधित करते हुए कहा, ''देखो एक ये अशोक है जिसके पास तुम्हारे रिश्तेदारों के पते और फोन नंबर भी हैं और एक तुम हो कि अपने मामा के परिवार का नंबर भी तुम्हारे पास नहीं। शर्म आनी चाहिए तुम्हें।’’ मैं भाई ईश्वरदयाल के सर पर रखी पगड़ी को देख रहा था जो शायद ठीक से नहीं बंधने के कारण सरककर काफी नीचे आ चुकी थी और जो मेरे देखते-देखते एक झटके के साथ खुलकर नीचे गिर पड़ी। भाई ईश्वरदयाल ने उपेक्षा से पगड़ी को उठाकर कोने में पड़े मैले-कुचैले कपड़ों के ढेर के ऊपर फेंक दिया।
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सीताराम गुप्ता
ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,
दिल्ली-110034
फोन नं. 011-27313954/27313679
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1 टिप्पणी:

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत बढ़िया लघुकथा लगी . आभार.