18 मार्च 2009

डा. वीरेन्द्र सिंह यादव का आलेख - पर्यावरण और स्वयंसेवी संस्थाओं की प्रासंगिकता एवं उपादेयता

विश्व बैंक की पहल पर सरकार के अलावा समाज की भलाई के काम में लगी संस्थाएं जो सामान्य जनता के लोगों से ही बनी होती हैं स्वयंसेवी संस्थाएं कहलाती है। इनका कार्य सरकार एवं जनता के बीच तालमेल बैठाकर विकास करना होता है अर्थात् ये स्वयंसेवी संस्थाएं सरकारों से तालमेल बिठाकर उनकी योजनाओं को आम जनता तक पहुँचाती हैं और इसके साथ ही जनता की प्रतिक्रियाएं आकांक्षाएं और अपेक्षाओं को सरकार के पास तक ले जाती हैं। वास्तव में देखा जाये तो ये स्वयंसेवी संस्थाएं सरकार एवं आम जनता के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इन संस्थाओं मं समाज के ऐसे व्यक्ति जुड़े होते हैं जो निस्वार्थ सेवाभावी, त्यागी और निष्ठावान होने के साथ-साथ उनका अन्तिम लक्ष्य समाज अथवा देश की सेवा वृत्त से जुड़ा होता है। विनोबा भावे जिसे सज्जन शक्ति कहा करते थे। विनोबा भावे जी ने गाँधी जी के समय में ‘भंगी मुक्ति’ से लेकर चर्खा और खादी संघों की स्थापना कर इन्हें निष्ठापूर्वक चलाया। लेकिन सेवा और राहत के इन कामों में लगे रहने के बावजूद इन समाजसेवियों को यह एहसास तो होता ही था कि अपने समाज के दलितों, गरीबों की सेवा करके परिस्थितियों को बदला नहीं जा सकता है। तब इन्हीं स्वयंसेवी संस्थाओं से जुड़े कुछ लोगों ने समाज के विकास का जिम्मा उठाया था क्योंकि यह भारत का नवनिर्माण का दौर था और हमारे यहाँ विकास के नाम पर सरकारें भी तरह-तरह के उपक्रम करने में लगी थीं। गैर-सरकारी लोगों के इन स्वयंसेवकों ने खुद कृषि, शिक्षा, साक्षरता आदि को लेकर महत्वपूर्ण संस्थाए खड़ी कीं थीं और नेकनियती एवं ईमानदारी से जुड़कर कार्य करते रहे और देखते-देखते अपने कार्यों एवं विकास के बल पर इनकी स्वतंत्र पहचान बननी शुरू हो गयी। इसी दौर में ये गैर-सरकारी समूह समाज को बदलने के लिए संघर्षरत जुझारू समूहों में तब्दील होते गये यही दौर था कि जब देश में नर्मदा बचाओं आन्दोलन, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा, संघर्ष वाहिनी या ऐसे ही अनेक समूह उभरे जिन्होंने विकास के साथ-साथ अपनी निजी जिन्दगी में भी सादगी, शुचिता और संयम के सिद्धांतों का कड़ाई से पालन करते रहे।
इन स्वयंसेवी संस्थाओं में सामान्य शिक्षा स्तर के लोगों के समूह से लेकर उच्च शिक्षित एवं अपने क्षेत्र विशेष में दक्ष तथा तकनीकी (डाक्टर, प्रोफेसर, इंजीनियर, विधिवेत्ता, आर्कीटेक्ट आदि) सभ्रांन्त लोग इन संस्थाओं से जुड़े रहते हैं। ये संस्थायें केन्द्र तथा राज्य सरकारों से मान्यता प्राप्त (रजि.) होती हैं। कुछ नहीं भी। साथ ही उनके नियमों से प्रतिबंधित भी होती हैं। यहाँ यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि जब हम ‘अराजकीय संस्थाओं की बात करते हैं तब हमारा आशय उन संस्थाओं से नहीं है जो निजी तौर पर बनती हैं अथवा बनी होती हैं और जिनको कोई धन लाभ कमाने का लालच है। हमारा स्पष्ट आशय ऐसी संस्थाओं से है जो निजी (गैर-सरकारी) तो हैं, पर स्वयंसेवी भी है (Private of Voluntary organisation) और जिनका ध्येय जनता के कष्ट दूर करना तथा देश के विकास में सहायक होना होता है।’ स्पष्ट है कि ये गैर-सरकारी संस्थाएं अपनी पहचान बनाने में सफल हो गयी हैं और इनके कार्य क्षेत्र भी आज विविध हो गये हैं। अपने कार्यों की विस्तृत रूपरेखा बनाकर ये गैर-सरकारी संघटन छोटे बड़े आफिस के रूप में अपने को स्थापित करती हैं और धनराशि एकत्रित करने का उनका आधार कुछ समाज के दानी लोगों के साथ-साथ कुछ विदेशी संस्थाएं भी सहायता देती हैं। सरकार से मिली जिम्मेदारियां एवं मदद के द्वारा ये संस्थाएं अपने कार्यों को करती हैं धन की कमी होने पर ये संस्थायें किसी भी गैर-सरकारी स्रोतों से धन एकत्रित करती हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि समाज में इनकी साफ-सुथरी छवि होती है और लोग जानते है कि वास्तव में ये संस्थाएं समाज की भलाई ही करती हैं।
वर्तमान में भारत सहित विश्व में अनेक गैर-सरकारी स्वयंसेवी संस्थाएं अपना कार्य ईमानदारी से कर रही हैं। कनाडा, फ्रांस, इंग्लैण्ड, जर्मनी एवं संयुक्तराष्ट्र अमेरिका में अनेक ऐसी संस्थाएं कार्य कर रही हैं जिनका कार्य केवल समाज कल्याण से सम्बन्धित है। पिछले 50 वर्षों में एन.जी.ओ. संस्थाओं की बढ़ती संख्या के प्रमुख कारण इस अवधि में बढ़ती भीषण और भयानक घटनाओं तथा दुर्घटनाओं के घटने से व्यथित जनसमुदाय को सुविधायें प्रदान करना है। इसके साथ ही आर्थिक गरीबी तथा अशिक्षा के कारण कई देशों के लोगों पर होने वाले गलत व्यवहार ने भी कई स्वयंसेवी संस्थाओं को जन्म दिया है इन गैर-सरकारी संगठनों की उत्पत्ति के पीछे शायद यह इतिहास भी छिपा हुआ है कि सरकार या प्रशासन से यदि तत्काल उचित न्याय नहीं मिल पाता है तो ये स्वयं सेवी समूह ही मदद दे सकते हैं।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में जब हम स्वयंसेवी संस्थाओं की बात करते हैं तो विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा यहाँ पर इनकी संख्या बहुत कम है। इसके पीछे सरकार की नीतियां एवं विश्वास की कमी ही स्पष्ट दिखती है। जब बात पर्यावरण से सम्बन्धित और सरकारी संगठनों की होती है तो स्थितियां काफी निराशा जनक प्रतीत होती है।
केन्द्रीय पर्यावरण विभाग में (सम्पूर्ण भारत में) 1984 तक केवल 187 संस्थाएं ही (रजि.) मिलती हैं परन्तु वर्तमान में इनकी संख्या अधिक हो गई है। इस समय लगभग 600 से अधिक गैर-सरकारी संगठन पर्यावरण से सम्बन्धित विविध मुद्दों पर अपने-अपने तरीके से कार्य कर रही हैं इतना तो निश्चित है कि ‘‘पर्यावरण’’ के क्षेत्र में चाहे संरक्षण की बात हो चाहे सुधार की, चाहे प्रदूषण कम करने की बात हो अथवा रोकने और नियंत्रण करने की, यह बात अनुभव के आधार पर सराहनीय कही जा सकती है कि ये स्वयंसेवी संस्थाएं निम्न क्षेत्र में अधिक सफल हुई हैं -
1. समाज और सरकार के मध्य तालमेल बिठाना।
2. पर्यावरण शिक्षा, चेतना एवं जन जागृति के कार्य।
3. समाज की समस्याओं को सरकारों तक पहुँचाना और उनको सही कार्य करने को बाध्य करना।
4. समाजहित में कानून की सहायता करना।
(पर्यावरण शिक्षा - डा. एम. के गोयल, पृ. 332)
कार्यक्षेत्र
पर्यावरण जागरूकता से सम्बन्धित इन स्वयंसेवी संगठनों ने कुछ ऐसे कार्य किये हैं जो सरकारें भी नहीं कर पायी हैं। ये संगठन समझा रहे हैं कि पर्यावरण प्रदूषण के पीछे कारण एवं चुनौतियां क्या हैं साथ ही इसे कैसे नियंत्रण में लाया जा सकता है ? अपने बेबाक कार्यों एवं स्पष्ट नीतियों के कारण ये स्वयंसेवी संस्थाएं आज लोगों का विश्वास अर्जित कर दिनोंदिन प्रगति के उत्तरोत्तर विकास की ओर अग्रसर हो रहीं हैं और इस दिशा में दक्षिण भारत के शत-प्रतिशत शिक्षित राज्य केरल ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। केरल शास्त्र साहित्य परिषद ने पर्यावरण से सम्बन्धित राज्य भर में 30 इकाइयों एवं 5 हजार से अधिक सदस्यों की मदद से पर्यावरण प्रदूषण एवं संरक्षण को लेकर नुक्कड़ नाटकों, पत्र-पत्रिकाओं का व्यापक प्रचार भाषणों, गीतों तथा सांस्कृतिक एवं लोक कलाओं का सहारा लेकर अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये हैं। गुजरात राज्य का ‘पर्यावरण शिक्षा केन्द्र, अहमदाबाद’ एक ऐसा गैर-सरकारी स्वयंसेवी संस्थान है जिसका कार्य क्षेत्र पर्यावरण शिक्षा के प्रति चेतना फैलाकर लोगों को जागरूक कर रहा है। और देश के उत्तरी क्षेत्र में समस्त पर्यावरण शिक्षा सम्बन्धी उत्तरदायित्वों का ईमानदारी पूर्वक निर्वहन कर रहा है। राजस्थान में सेवा केन्द्र उदयपुर ऐसा ही एक गैर-सरकारी संगठन है जो महिला विकास, समाज कल्याण एवं पर्यावरण साक्षरता की दिशा में अग्रणी भूमिका निभा रहा है और राज्य तथा केन्द्र सरकार को जोड़ने में इसकी महत्वपूर्ण कोशिश रहती है।
भारतीय एवं वैश्विक परिप्रेक्ष्य में स्वयंसेवी संस्थाओं की प्रासंगिकता
उ. प्र. के हिमालय क्षेत्र में पर्यावरण सम्बन्धी लोक शिक्षण का कार्य भी अति सराहनीय माना जाता है। विश्व विख्यात चिपको आन्दोलन को जन्म देने वाली संस्था दशौली ग्राम स्वराज्य मण्डल का गठन विकास से अनवरत संघर्ष की कहानी के तहत हुआ। पहाड़ों में बढ़ती बेरोजगारी और लगातार मैदानी इलाकों की ओर पलायन से चिंतित होकर चमोली (उ. प्र.) के कुछ युवकों ने साठ के दशक में एकत्र होकर एक श्रम सहकारी समिति का, वन ठेकेदारों तथा मजदूरों के शोषण पर रोक लगाने के लिए गठन किया। इसी के तहत 1964 ई. में दशौली ग्राम स्वराज्य संघ का गठन किया गया। इसका गठन-वनाधारित ग्राम उद्योग चलाने के लिए किया गया था। लेकिन सरकारी विभाग ने इसे कच्चा माल देने में बहुत आना-कानी की थी। धनी ठेकेदारों द्वारा सरकार की मिली भगत से वनों का बेहिसाब शोषण हुआ। इस पर व्यापक विमर्श हेतु चंडी प्रसाद भट्ट जो एक बस कम्पनी में क्लर्क थे लोगों के बीच जाकर वनों की लकड़ी की उपयोगिता एवं जड़ी बूटियों की कीमत बताकर जनजागरण शुरू किया। इस संघ ने अपने लोगों के साथ सहजीवन के प्रयोग छोड़ सहमरण के प्रयोग की तैयारी शुरू की। वन विभाग के कर्मचारियों ने जैसे ही हल काटने वाली अंगू की लकड़ी से छेड़छाड़ की एवं हल्की लकड़ी खेल के समान के लिए बेचना शुरू किया। फिर क्या था विश्नोई समाज की तरह पेड़ों का कटान रूकवाने के लिए लोग पेड़ों में लिपटने लगे और इस तरह से चिपको आन्दोलन अस्तित्व में आया। यही नहीं इसकी मातृ संस्था दशौली ग्राम स्वराज्य मण्डल ने जगह-जगह पर्यावरण विकास शिविर आयोजित करके समाज सेवकों, छात्रों और गांव के लोगों में पर्यावरण संरक्षण एवं वन संवर्धन का काम अपने हाथ में लेकर महत्वपूर्ण कार्य किये। कुमांऊ क्षेत्र की पर्यावरण पर अग्रणी संस्था ‘लोक चेतना मंच’ ने भी जनसमूह में जाकर अति महत्वपूर्ण कार्य किये।
उत्तराखण्ड संघर्षवाहिनी के माध्यम से उत्तराखण्ड में श्री सुन्दर लाल बहुगुणा ने पर्यावरण सम्बन्धी विचार तथा जागरूकता के लिए कई बार पद यात्राएं की हैं। इन पद यात्राओं के माध्यम से बहुगुणा साहब ने रास्तों, गाँवों एवं शहरों में लोगों को भाषणों के द्वारा जन जागृति उत्पन्न की। इसी तरह से ‘गंगोत्री ग्राम स्वराज्य संघ’, उत्तर काशी की भूमिका पर्यावरण के संरक्षण में इस हद तक प्रभावी रही कि आखिर सरकार को ठेकेदारी प्रथा को रोकना पड़ा। वन उत्पादों के उचित आंकलन हेतु उ. प्र. वन विकास निगम का गठन किया गया। जिसमें स्थानीय निवासियों के हितों की बात को वरीयता का आश्वासन किया गया था।
सैंरधी घाटी पन बिजली परियोजना के खिलाफ ‘केरल शास्त्र साहित्य परिषद’ द्वारा संचालित आन्दोलन, मिट्टी बचाओ अभियान, भूपाल पटनम व इंचपपल्ली बांधों के खिलाफ चले अभियानों का पर्यावरण के प्रति अच्छी समझ विकसित कर गया और इन आन्दोलनों के होने से एक ऐसा वातावरण बना कि अब पहले जैसी कोई गलती निकट भविष्य में नहीं हो सकती है। इसके साथ ही नीतियों के बनाते समय पारदर्शिता का होना अनिवार्य है।
केरल में कई समूह स्वयंसेवकों एवं वनवासियों के साथ पर्यावरणीय विकास के लिए प्रयासरत हैं। इन लोगों ने पर्यावरण को दृष्टिगत रखते हुए इस क्षेत्र को तीन भागों में बाँट रखा है। एक क्षेत्र उत्तर केरल के अलतपपडि वनवासी क्षेत्र में जमीन के इस्तेमाल की समस्या का है, द्वितीय कणि वनवासियों के वनों का और तीसरा सरकंडो के कारीगरों की आवश्यकताओं और समस्याओं का है। लोगों को पुस्तकों, प्रदर्शनियों और स्लाइडों के द्वारा समझाया जा रहा है कि वनवासी समुदायों, सरकंडा कारीगरों और आस-पास की खेती उत्पादकता को एक दूसरे से अलग कर देने के कारण ही वर्तमान संकट पैदा हो रहा है। अनेक स्वयंसेवी संस्थाएं पर्यावरण संरक्षण के लिए आगे आ रही हैं जो पर्यावरण के अनुकूल खेती की पद्धतियां विकसित करने की दृष्टि से देशी अनाज सब्जियां और पेड़ों की देशी किस्में इकट्ठी करने पर बल दे रही हैं।
कर्नाटक में चिपको आन्दोलन की तरह अप्पिकों संगठन पर्यावरण जागरूकता के लिए वही कार्य कर रहा है जो चिपको ने उत्तराखण्ड के लिए किया। इसकी स्थापना 1983 ई. में की गयी। 8 सितम्बर, 1983 को कर्नाटक के सिरसी जिले के सालकणी जंगल में वन विभाग के कर्मचारी पेड़ काट रहे थे। ‘युवक मंडली’ के लोगों को जब यह मालूम हुआ तो वे 160 स्त्री-पुरूष और बच्चे पेड़ों से चिपक गये और काटने वालों को हटने से मजबूर कर दिया। वास्तव में देखा जाये तो ‘अप्पिको ने सचमुच जनता के रोष को एक आकार दिया, उनकी निराशा को आशा में बदला क्योंकि उस समय लोग समझ नहीं पा रहे थे कि अपने पेड़ों को कैसे बचाएं, पर अप्पिको ने उनमें आशा का संचार कर दिया।’ श्री पंडुरंग हेगड़े अप्पिको के मूल प्रवर्तक हैं। अर्थात् अप्पिको का मूल उद्देश्य वन संरक्षण और संवर्धन में लोगों की शक्ति का उपयोग करना और वन संसाधनों का कम से कम उपयोग करना सिखाता है।
केरल में ‘शांति घाटी आन्दोलन’ जल विद्युत परियोजना की स्थापना के विरोध में जनचेतना आन्दोलन था क्योंकि इससे जैव विविधता को क्षति हो रही थी। इसलिए शासन ने वहाँ आरक्षित वन क्षेत्र घोषित कर पुनः उष्ण कटिबन्धीय वनों के क्षेत्र में जैव विविधता को समृद्ध बनाने हेतु संरक्षित किया है।
पर्यावरण के संरक्षण की दृष्टि से और मानव उपयोगिता के आधार पर नर्मदा बचाओ आन्दोलन भी गैर-सरकारी संगठनों में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है। इसमे मेघा पाटेकर अपने सहयोगी अरून्धती राय एवं बाबा आमटे के साथ, यह आन्दोलन जैव विविधता और आदिवासियों के संरक्षण हेतु संचालित कर रहे हैं। इसी तरह से पर्यावरण एवं पुनर्वास की समस्या को लेकर कुछ गैर-सरकारी संगठन टेहरी बाँध (उ. प्र.) नर्मदा सागर भगीरथी नदी और सरदार सरोवर (नर्मदा नदी पर) पर बनने वाले बाँधांे के सन्दर्भ में अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं। और सरकार को ये संगठन यह समझाने में सफल भी हुए हैं कि बाँध निर्माण के पूर्व अधिकृत एवं सक्षम पर्यावरण विशेषज्ञ समिति की तकनीकी राय ली जायेगी जिससे आम लोगों को अन्य पर्यावरणीय विकृतियों का सामना न करना पड़े। ये संस्थाएं अब अन्य बाँधों पर भी अपनी पैनी नजर रख रही हैं जिसमें बिहार मंे कोयल कारो बाँध तथा बस्तर (म. प्र.) में गोदावरी और इन्द्रावती नदियों पर ईयमपल्ली और भोपाल पट्नम बाँध साथ ही महाराष्ट्र की गंध चिरोली परियोजना के तहत लगभग 2 लाख एकड़ भूमि जलमग्न हो जाने का भय तथा 50 हजार लोगों का बेघर होना, महान पर्यावरण विद्बाबा साहब आम्टे समर्थित स्वयंसेवी संस्था का कार्य क्षेत्र बन गया है।
गैर-सरकारी संगठनों में वर्तमान में पर्यावरण को लेकर जो चिंता जताई जा रही है उसमें बम्बई बचाओ आन्दोलन प्रमुख है क्योंकि जिस तरह से बम्बई की जनसंख्या बढ़ रही है और इस बढ़ती जनसंख्या से शहर के लोगों को जो पर्यावरणीय समस्याएं आ सकती हैं उसको लेकर यह समिति महाराष्ट्र सरकार पर लगातार दबाव डालती रही है कि बम्बई शहर की आबादी 80 लाख से अधिक नहीं होनी चाहिए। बम्बई बचाओ समिति या आन्दोलन ने अपने सुझाव के माध्यम से यह कहा है कि सरकार छोटे-छोटे कस्बे बनाकर भी इस समस्या से बच सकती है।
पर्यावरण को लेकर सबसे अधिक दायित्व शिक्षा के माध्यम से पूरा किया जा सकता है और इस दिशा में शिक्षक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहे है। गैर-सरकारी संस्थाओं के माध्यम से शिक्षक-शिक्षा के माध्यम से इस दिशा में प्रयासरत हैं। शहरी स्कूलों और कालेजों में भी कई संगठन सक्रिय कार्य कर रहे हैं। अहमदाबाद की संस्था ‘विकसित’ ने कुछ हाईस्कूल और कालेजों के छात्रों को एकत्र करके उन्हें पर्यावरण के बारे में तथ्य एकत्रित करने और उनको विश्लेषण करने का काम सौंपा। छात्रों ने अहमदाबाद की साबरमती में फैले प्रदूषण का अध्ययन भी किया। बम्बई के सोसायटी फार क्लीन एनवायरमेण्ट ने भी अनेक स्कूलों के लिए एक कार्यक्रम बनाया है जिसमें व्याख्यान, यात्राएं और प्रत्यक्ष कार्य करने की योजनाएं हैं जो पर्यावरण को लेकर लोगों को जागरूक करने को निरन्तर प्रयासरत हैं। इसी तरह से दिल्ली में अनेक गैर-सरकारी संस्थाएं पर्यावरण की सुरक्षा तथा संरक्षण को लेकर कार्य कर रही हैं। उसमें ‘अंकुर’ एवं कल्प वृक्ष प्रमुख हैं। ‘अंकुर’ के माध्यम से स्कूलों में पर्यावरण सम्बन्धी पाठ्यक्रम शुरू कर दिए गये हैं। ‘कल्प वृक्ष - स्कूलों, कालेजों में ‘नेचर क्लब’ बनाकर जन जागरण का अलख जगाए हुए हैं। हिन्दू कालेज ‘नेचर क्लब’ और कल्प वृक्ष ने मिलकर सन् 1982 में नर्मदा नदी घाटी पर अपना अध्ययन किया था। इस संस्था के साझी रिपोर्ट पर देश का ध्यान नर्मदा घाटी में बन रहे भीमकाय बाँधों की समस्या की ओर खींचने में बड़ी मदद की थी।
सन् 1980 ई. में स्थापित ‘सेंटर फार साइंस एंड एनवायरमेंट’ पर्यावरण की शिक्षा को बढ़ावा देने वाली एक प्रमुख गैर-सरकारी संगठन है जो माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा संस्थानों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करती है। इस संस्था के द्वारा शिक्षकों को पर्यावरण शिक्षा प्रशिक्षण हेतु पर्यावरणिक शिक्षक कार्यशाला पारिस्थितिकी पद् चिन्ह् परियोजना पर्यावरण पर्यटन इसके प्रमुख बिन्दु हैं। जल बिहार एवं जंगल जो छात्र एवं शिक्षक दोनों के लिए आकर्षण का केन्द्र बनी हुयी हैं। संस्था अपनी पुस्तक के माध्यम से पर्यावरण पर्यटन को विशेष प्रोत्साहन प्रदान कर रही है। इसी तरह से ‘पर्यावरण अनुसंधान और शिक्षा केन्द्र’ नामक संस्था का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीय शैक्षिक संस्थानों की तरह ऐसा पाठ्यक्रम तैयार करती है जो पर्यावरण शिक्षा के व्यवहारिक पहलू पर अधिक ध्यान देती है। इस संस्था का प्रमुख आकर्षण ‘नर्सरी प्रोजेक्ट’ है जिसके माध्यम से विद्यालयों में छात्रों द्वारा छोटे नर्सरी (रोपण क्यारी) की स्थापना तथा उसकी देखभाल कराती है। इस संस्था का प्रमुख उद्देश्य छात्रों को जिम्मेदार तथा सक्षम नागरिक बनाना है ताकि वह पारिस्थितिकीय संतुलित विश्व के बारे में अपने वैचारिक स्तर पर स्वतंत्र सोच का निर्माण कर सकें।
वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अनुशंसित संस्था ‘पर्यावरण शिक्षा केन्द्र’ की स्थापना सन् 1984 ई. में की गई। इसके अन्र्तगत पाँच क्षेत्रीय शाखाएं स्थापित की (बंगलौर, अहमदाबाद, गुहावटी, पुणे, लखनऊ) गयीं। इस संस्था के माध्यम से बच्चों, युवाओं, नीति नियंताओं तथा आम लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा की जाती है। इसके द्वारा चलाए गए प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं - स्कूलों, कालेजों के माध्यम से राष्ट्रीय पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम की स्थापना कर देश के प्रत्येक जिलों में सौ इको क्लबों की स्थापना करना साथ ही यह संस्था पर्यावरण शिक्षा से सम्बन्धित विश्व संस्था ग्लोब को भी सहायता करती है। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि ग्लोब विश्व की पर्यावरण शिक्षा से सम्बन्धित शोध संस्था मानी जाती है जिसमें लगभग 5 हजार से अधिक स्कूल चलते हैं और इसमें भारत के लगभग सौ स्कूल शामिल हैं।
पर्यावरण संरक्षण हेतु डब्ल्यु डब्ल्यु एफ इंडिया प्रोजेक्ट शिक्षकों तथा छात्रों में जागरूकता पैदा कर रही है। इसके अपने प्रत्येक राज्यों में कार्यालय हैं और इसके प्रोजेक्ट भारत के अरूणांचल प्रदेश, कर्नाटक, पश्चिमी बंगाल, गोवा, हिमांचल प्रदेश, महाराष्ट्र तथा मध्य प्रदेश मंे चल रहे हैं। यह प्रोजेक्ट ग्रामीण व जनजातीय क्षेत्रों में विशेष रूप से संचालित हैं इसके प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार है - माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों में पर्यावरण की सुरक्षा हेतु शिक्षित करना। साथ ही नेचर क्लब आफ इण्डिया मूवमेंट को मजबूती प्रदान करना। यही नहीं इसके माध्यम से प्रोजेक्ट पाठ्यक्रमों के अलावा आस-पास के वातावरण से भी छात्रों को शिक्षित करने का दायित्व उठा रहा है। इस प्रोजेक्ट के तहत पर्यावरण शिक्षा को शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशालाओं के माध्यम से व्यावहारिक दुनिया यानी प्रकृति से साक्षात साक्षात्कार कराना है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि पर्यावरण से सम्बन्धित स्वयंसेवी संस्थाओं ने न केवल भारत में ही वरन् भारत की परिधि से बाहर जाकर भी काम किया है जो एक देश से दूसरे देशों तक अपने कार्यों को सम्पन्न कर रही हैं। ऐसी संस्थाओं का उपयोग राष्ट्रसंघ तथा विश्व स्तर की सरकारी एजेन्सियाँ बड़े विश्वास के साथ करती हैं सूखा, आकाल, बाढ़, महामारी का प्रकोप तथा प्राकृतिक दुर्घटनाओं के समय भोजन, बच्चों को दूध, दवाइयाँ, कपड़े और अन्य प्रकार की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जिम्मेदारी यह संस्थाएं उठा लेती हैं। कितना कठिन भी कार्य क्यों न हो ये स्वयंसेवी संस्थाएं अपने स्वयंसेवकों के साथ बड़ी ईमानदारी से उसका निर्वहन करते हुए सफलतापूर्वक कार्य निपटा देती हैं। पर्यावरण ही नहीं अन्य मामलों में भी निश्चय ही इन स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण एवं अग्रणी है।
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सम्पर्कः
वरिष्ठ प्रवक्ता: हिन्दी विभाग
दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय
उरई-जालौन (उ0प्र0)-285001
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लेखक परिचय –

युवा साहित्यकार के रूप में ख्याति प्राप्त डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव ने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद ’ की अवधारणा को स्थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया है। आपके दो सौ पचास से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की स्तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, राष्ट्रभाषा हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना कर चुके डा0 वीरेन्द्र ने विश्व की ज्वलंत समस्या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्तुत किया है। राष्ट्रभाषा महासंघ मुम्बई, राजमहल चैक कवर्धा द्वारा स्व0 श्री हरि ठाकुर स्मृति पुरस्कार, बाबा साहब डा0 भीमराव अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान 2006, साहित्य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्मान 2008 सहित अनेक सम्मानो से उन्हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्च शिक्षा अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियां (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।

1 टिप्पणी:

Sanjiv Kavi ने कहा…

बस्तर के जंगलों में नक्सलियों द्वारा निर्दोष पुलिस के जवानों के नरसंहार पर कवि की संवेदना व पीड़ा उभरकर सामने आई है |

बस्तर की कोयल रोई क्यों ?
अपने कोयल होने पर, अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर

सनसनाते पेड़
झुरझुराती टहनियां
सरसराते पत्ते
घने, कुंआरे जंगल,
पेड़, वृक्ष, पत्तियां
टहनियां सब जड़ हैं,
सब शांत हैं, बेहद शर्मसार है |

बारूद की गंध से, नक्सली आतंक से
पेड़ों की आपस में बातचीत बंद है,
पत्तियां की फुस-फुसाहट भी शायद,
तड़तड़ाहट से बंदूकों की
चिड़ियों की चहचहाट
कौओं की कांव कांव,
मुर्गों की बांग,
शेर की पदचाप,
बंदरों की उछलकूद
हिरणों की कुलांचे,
कोयल की कूह-कूह
मौन-मौन और सब मौन है
निर्मम, अनजान, अजनबी आहट,
और अनचाहे सन्नाटे से !

आदि बालाओ का प्रेम नृत्य,
महुए से पकती, मस्त जिंदगी
लांदा पकाती, आदिवासी औरतें,
पवित्र मासूम प्रेम का घोटुल,
जंगल का भोलापन
मुस्कान, चेहरे की हरितिमा,
कहां है सब

केवल बारूद की गंध,
पेड़ पत्ती टहनियाँ
सब बारूद के,
बारूद से, बारूद के लिए
भारी मशीनों की घड़घड़ाहट,
भारी, वजनी कदमों की चरमराहट।

फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

बस एक बेहद खामोश धमाका,
पेड़ों पर फलो की तरह
लटके मानव मांस के लोथड़े
पत्तियों की जगह पुलिस की वर्दियाँ
टहनियों पर चमकते तमगे और मेडल
सस्ती जिंदगी, अनजानों पर न्यौछावर
मानवीय संवेदनाएं, बारूदी घुएं पर
वर्दी, टोपी, राईफल सब पेड़ों पर फंसी
ड्राईंग रूम में लगे शौर्य चिन्हों की तरह
निःसंग, निःशब्द बेहद संजीदा
दर्द से लिपटी मौत,
ना दोस्त ना दुश्मन
बस देश-सेवा की लगन।

विदा प्यारे बस्तर के खामोश जंगल, अलिवदा
आज फिर बस्तर की कोयल रोई,
अपने अजीज मासूमों की शहादत पर,
बस्तर के जंगल के शर्मसार होने पर
अपने कोयल होने पर,
अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर
आज फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार, कवि संजीव ठाकुर की कलम से