24 मार्च 2009

आकांक्षा यादव की लघुकथा - काला आखर

बचपन से लिखी गयी कविताओं को काव्य-संग्रह रूप में छपवाने का मालती का बहुत मन था। इस विषय में उसने कई प्रकाशकों से संपर्क भी किया, किन्तु निराशा ही मिली। मालती कालेज में हिन्दी की प्रवक्ता के साथ-साथ अच्छी कवयित्री भी थी। काफी प्रयास के पश्चात एक प्रकाशक ने मालती के काव्य-संग्रह का प्रकाशन कर ही दिया। मालती के कार्यरत कालेज के प्रेक्षागार में ही इस काव्य-संग्रह के विमोचन की तैयारी भी प्रकाशक ने अपनी ओर से कर दी।
आज कालेज के अनेक सहकर्मी सुबह से मालती को उसके प्रथम काव्य-संग्रह के प्रकाशन और मंत्री जी द्वारा प्रस्तावित विमोचन की बधाई दे रहे थे। मालती का मन नहीं था कि इस काव्य-संग्रह का विमोचन मंत्री जी करें। इसकी बजाय वह विमोचन किसी वरिष्ठ साहित्यकार द्वारा चाहती थी, ताकि साहित्य जगत में उसके प्रवेश को गम्भीरता से लिया जाय और इस संग्रह के बारे में चर्चा हो सके। किन्तु प्रकाशक ने उसे समझाया कि इस काव्य-संग्रह का मंत्री जी द्वारा विमोचन होने पर पुस्तकों की बिक्री अधिक होगी। लाइब्रेरी तथा सरकारी संस्थानों में मंत्री जी किताबों को सीधे लगवा भी सकते हैं। आगे इससे फायदा ही फायदा होगा।

देर शाम तक मंत्री जी अपने व्यस्त समय में से कुछ समय निकाल कर कालेज के प्रेक्षागार में तीन घण्टे देरी से पहुँचे। मंत्री जी के पहुँचते ही हलचल आरम्भ हुई और मीडिया के लोगों ने लैश चमकाने शुरू कर दिये। संचालक महोदय मंत्री जी की तारीफों के पुल बांधते जाते, जिससे वे और भी प्रसन्न नजर आते। अन्ततः मंत्री जी ने मालती की पुस्तक का विमोचन किया। विमोचन के पश्चात मालती ने उपस्थित दर्शकों की तालियों के साथ अपनी प्रथम प्रकाशित काव्य-संग्रह की प्रतियाँ अन्य विशिष्टजनों को भी उत्साह के साथ भेंट की। अपने इस पहले काव्य- संग्रह के प्रकाशन से मालती बहुत खुश थी।

मंत्री जी ने पुस्तक का विमोचन करने के बाद उसे मेज पर ही रख दिया और उपस्थित जनों को सम्बोधित करते हुये लम्बा भाषण दे डाला। मालती सोच रही थी कि अब मंत्री जी उसे विमोचन की बधाईयाँ देंगे, पर मंत्री जी तो अपनी ही रौ में बहते हुए स्वयं का स्तुतिगान करने लगे। सम्बोधन के पश्चात मंत्री जी सबका अभिवादन स्वीकार करते हुये बाहर निकल गये। मंत्री जी और उनके स्टाफ ने विमोचित पुस्तक को साथ ले जाने की जहमत भी नहीं उठाई। मालती उस प्रेक्षागार में अब अकेली रह गयी थी। उसने चारों ओर देखा तो जिस जोश से उसने खद्दरधारी लोगों को पुस्तकें भेंट की थी, उनमें से तमाम पुस्तकें कुर्सियों पर पड़ी हुई थी और कई तो जमीन पर बिखरी हुई थी। वह एक बार उन पुस्तकों को देखती और दूसरे क्षण उसके कानों में प्रकाशक के शब्द गूँजते कि मंत्री जी द्वारा विमोचन होने पर पुस्तकों की बिक्री अधिक होगी।
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प्रवक्ता,
राजकीय बालिका इण्टर कालेज

नरवल, कानपुर (उ0प्र0) – 209401
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जीवन-परिचय
नाम- आकांक्षा यादव

जन्म - 30 जुलाई 1982, सैदपुर, गाजीपुर (उ0 प्र0)

शिक्षा- एम0 ए0 (संस्कृत)

विधा- कविता, लेख व लघु कथा

प्रकाशन- देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं मसलन- साहित्य अमृत, कादम्बिनी, युगतेवर, अहा जिन्दगी, इण्डिया न्यूज, रायसिना, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा, अमर उजाला, अमर उजाला कांपैक्ट, आज, गोलकोण्डा दर्पण, युद्धरत आम आदमी, अरावली उद्घोष, मूक वक्ता, सबके दावेदार, प्रगतिशील आकल्प, शोध दिशा, कुरूक्षेत्र संदेश, साहित्य क्रांति, साहित्य परिवार, साहित्य परिक्रमा, साहित्य जनमंच, सामान्यजन संदेश, राष्ट्रधर्म, सेवा चेतना, समकालीन अभिव्यक्ति, सरस्वती सुमन, शब्द, लोक गंगा, रचना कर्म, नवोदित स्वर, आकंठ, प्रयास, पथ की कलम, नागरिक उत्तर प्रदेश, गृहलक्ष्मी, गृहशोभा, मेरी संगिनी, वुमेन आन टाप, बाल साहित्य समीक्षा, वात्सल्य जगत, पंखुड़ी, लोकयज्ञ, कथाचक्र, नारायणीयम्, मयूराक्षी, चांस, गुतगू, मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद पत्रिका, हिन्दी प्रचार वाणी, गुर्जर राष्ट्रवीणा, साहित्यकार कल्याण परिषद, खरी कसौटी, विविधा, दहलीज, विश्व स्नेह समाज, जूनियर्स न्यूज, खबरी, कविता श्री, सीप, शिवम्, अदबी माला, कल्पान्त, अहल्या, सामथ्र्य, जर्जर कश्ती, प्रियंत टाइम्स, लोक मर्यादा, मारूति ज्योति, फुल टेंशन, बड़ा बाजार, सच का साया, सच्ची आकांक्षा, दि मारल, हेलो कानपुर, कमाल कानपुर इत्यादि में रचनाओं का प्रकाशन। विभिन्न प्रतिष्ठित काव्य संकलनों में कविताओं का प्रकाशन। विभिन्न वेब पत्रिकाओं- सृजनगाथा, अनुभूति, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, रचनाकार, हिन्दी नेस्ट, स्वर्गविभा, कथाव्यथा, युगमानस, कलायन इत्यादि पर रचनाओं का नियमित प्रकाशन।

सम्पादन- ’’क्रान्ति यज्ञ: 1857-1947 की गाथा’’ पुस्तक में सम्पादन सहयोग।

सम्मान-

साहित्य गौरव, काव्य मर्मज्ञ, साहित्य श्री, साहित्य मनीषी, शब्द माधुरी, भारत गौरव, साहित्य सेवा सम्मान,
देवभूमि साहित्य रत्न इत्यादि सम्मानों से अलंकृत। राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा "भारती ज्योति’’ एवं भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘‘

रुचियाँ- रचनात्मक अध्ययन व लेखन। नारी विमर्श, बाल विमर्श व सामाजिक समस्याओं सम्बन्धी विषय में विशेष रूचि।

सम्प्रति/सम्पर्क-

प्रवक्ता, राजकीय बालिका इण्टर कालेज, नरवल, कानपुर (उ0 प्र0)- 209401
kk_akanksha@yahoo.com
www.shabdshikhar.blogspot.com

7 टिप्‍पणियां:

शिवराज गूजर. ने कहा…

man ko chho gayee aapki lekhani. ek lekhak ki peeda ko aapane jis shiddat se pesh kiya hai, padakr man bhar aaya.

KK Yadav ने कहा…

यथार्थ को चित्रित करती एक सार्थक लघुकथा .....बधाई.

Ratnesh ने कहा…

Aj aisi hi soch ke chalte hindi sahitya ki durdasha ho rahi hai.jis khubsurati se kala akhar men akanksha ji ne samaj aur sahitya ko aina dikhaya hai, kabile-tarif hai.

Rashmi Singh ने कहा…

इस लघु-कथा के माध्यम से आकांक्षा यादव जी ने कड़वे सच को शब्द दिये हैं। लेखक, प्रकाशक और विमोचनकर्ता तीनों को ही कटघरे में खडा करके साहित्यिक बिरादरी को एक नया सन्देश दिया है.

Dr. Brajesh Swaroop ने कहा…

Really interesting..Congratulations to Akanksha ji.

बाजीगर ने कहा…

साहित्य में राजनीति के घालमेल पर बहुत सारगर्भित लघुकथा है. ऐसी लघुकथाएं कम ही पढने को मिलती हैं.आकांक्षा जी को साधुवाद.

डाकिया बाबू ने कहा…

शीर्षक स्वयं में बहुत कुछ कह जाता है....काला आखर.